Thursday, 19 February 2015

नारीमुक्ति : अधिकार केवल नक़ल का?


पिछले हफ्ते महिला-पुरुष समानता पर कुछ वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ एक ब्लॉग लिखा तो लगा जैसे बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया. कुछ दोस्तों ने दोस्ती निभाते हुए इसे अच्छा बताया तो कुछ साथी महिला अधिकारों का हनन बताते हुए व्हाट्सएप और इमेल पर टूट पड़े. इनमें से कुछ प्रतिक्रियाएं बहुत उग्र थीं तो कुछ संतुलित, लेकिन अधिकतर प्रतिक्रियाओं में एक बात समान थी कि मेरे ब्लॉग में जो तुलना की गई है वह महिला और पुरुषों के शारीरिक/हार्मोनल/मेडिकल संरचना पर आधारित है जबकि महिलाओं को अधिकार देने की बात सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखी जानी आवश्यक है. मैं उन सभी से पूरी तरह सहमत हूँ कि मेरा पूरा ब्लॉग केवल शारीरिक संरचना को तुलना का आधार बनाते हुए लिखा गया था लेकिन जैसा कि मैं पहले एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ कि किसी भी इंसान की शारीरिक संरचना का प्रभाव उसके क्रियाकलापों और आचार व्यवहार पर पड़ता है तो महिलाओं के लिए यह लागू नहीं होगा यह मानना असंभव है. पिछला ब्लॉग केवल एक कड़ी की शुरुआत भर था जिसमे महिला और पुरुषों के अलग अलग होने की बात को मेडिकल तथ्यों के आधार पर साबित करने की कोशिश की गई थी. अब इसकी अगली कड़ी में महिला अधिकारों के पैमाने पर हमारे सामजिक परिवेश को कसने की कोशिश करते हैं.

महिला अधिकारों की बात करने से पहले शायद यह तय करना ज्यादा जरूरी है कि महिला आधिकारों की परिभाषा क्या है? यह मैं केवल इसलिए कह रहा हूँ कि महिला अधिकारों के नाम पर एक छलावे जैसा खेल हमारे समाज में लगातार चल रहा है. यह खेल पिछले पच्चीस साल में और ज्यादा तेज हुआ है जबसे भूमंडलीकरण के साथ पश्चिम की अर्थनीति ने भारत में प्रवेश किया. यह अर्थनीति कुछ कमियों के साथ भारत के लाइसेंसी राज से कहीं ज्यादा बेहतर और तर्कसंगत है, लेकिन इस पर चर्चा कभी बाद में. इस बात से शायद ज्यादातर लोग सहमत होंगे कि किसी भी समाज की सोच को चलाने और बदलने में अर्थनीति का योगदान उस से कहीं ज्यादा होता है जितना हम समझते हैं.

पश्चिम की अर्थनीति के साथ भारत के सामजिक/पारिवारिक ताने बाने में कुछ बड़े बदलाव हुए. जिनमें से एक बड़ा बदलाव यह था कि महिलाओं को उनकी मौलिक योग्यताओं से इतर अन्य मामलों में भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला जिसका पूरा पूरा फायदा भारतीय महिलाओं ने उठाया हो ऐसा कहना मुश्किल है. इस असफलता के पीछे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं को इन मौकों के साथ साथ एक छलावे में भी घेरा गया और वह छलावा था पुरुषों से बराबरी का. समय बदला और साथ साथ भारत के व्यवसाय करने का तरीका भी. पहले जिन जगहों पर केवल पुरुष काम करते थे अब उन्हीं जगहों पर महिलायें भी काम करती हैं, और यह सब महिला पुरुष बराबरी के नाम पर हो रहा है. बिना यह समझे कि क्या महिलाओं की कोई अलग योग्यता है या नहीं? क्या केवल पुरुषों के संग खड़े होकर हर काम करना भर ही उनकी योग्यता का सुबूत है. पुरुषों के काम करके खुद को बेहतर साबित करना क्या परोक्ष रूप से यह क़ुबूल कर लेना नहीं है कि पुरुष जो काम करते हैं वह बेहतर है और बेहतरी का मापदंड केवल उसी काम को दोहराना है. महिला पुरुष बराबरी के लिए महिलाओं का घर से कदम बाहर निकालना एक शुभ संकेत है लेकिन यह केवल पुरुषों की नक़ल करने के लिए हो, तो यह उनके लिए दुर्भाग्य भी बन जाता है.
इसे थोड़ा ऐसे समझिये कि क्या होगा अगर आप तेज दौड़ने वाले घोड़े से उम्मीद करें कि वह किसी बैल की तरह अधिक बोझ खींच कर दिखाए. या शेर की दहाड़ की तुलना किसी चिड़िया के चहचहाने से की जाए. इन सभी की अपनी अलग योग्यताएं, खूबसूरतियाँ और खूबियाँ हैं और तुलना करना किसी के साथ भी अन्याय होगा. तो फिर यह अन्याय लगातार महिलाओं के साथ क्यों किया जाता रहा है और वह भी नारी मुक्ति के नाम पर. महिलाओं के अपने कुछ गुण हैं जिनमे वे पुरुषों से बेहतर काम कर सकती हैं. उदाहरण के तौर पर इनमे से एक गुण उनका पुरुषों के मुकाबले अधिक रचनात्मक होना है. घर की दहलीज के अन्दर इस गुण का इस्तेमाल घर की साज सज्जा और अन्य कामों में किया जाता था तो घर के बाहर इस से मिलता जुलता काम इंटीरियर डिजाइनिंग या फैशन डिजाइनिंग हो सकता है. लेकिन अगर इस गुण को नजर अंदाज करके महिलाओं की सेना में भागीदारी को आधार बनाया जाए तो आखिर कितनी महिलायें इस के साथ न्याय कर पाएंगी? और यह हो रहा है. नतीजा देखिये. भारत की थल सेना में महिलायें हैं लेकिन बॉर्डर और अन्य संवेदनशील जगहों पर उन्हें नियुक्ति नहीं दी जाती, पुरुषों के मुकाबले में उनका कार्यकाल कम होता है. अगर बॉर्डर पर नियुक्ति नहीं होनी है तो महिलायें सेना में कर क्या रहीं है? क्या यह महिला अधिकारों के नाम पर यह सेना में सफ़ेद हाथी पालने जैसा नहीं है? तो क्या सेना में महिलाओं की कोई जगह नहीं है? है. आर्मी की एक शाखा है AMC (आर्मी मेडिकल कोर). यह शाखा सेना के जवानों/अधिकारियों को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती है. इस शाखा में भरपूर महिलायें हैं और उनकी क्षमताओं का दोहन भी इस शाखा में सही तरीके से हो पा रहा है. लेकिन इसके अलावा सेना की बाकी शाखाओं में महिलायें केवल सजावट का सामान बनकर रह गई हैं और वह भी नारी मुक्ति के नाम पर. और विडम्बना देखिये इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में जब इन महिलाओं को पहली बार परेड में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो सेना के पास इन्हें रुकवाने के लिए कोई ठिकाना भी नहीं था. मजबूरन 250 महिला अधिकारी दिल्ली के विभिन्न होटलों में रुकीं. क्या यह वाकई महिला स्वतंत्रता है? क्या हम इस से बेहतर कोई और तरीका नहीं निकाल सकते इनकी क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए? एक बात और, एक तरफ जहाँ सेना में महिलाओं के होने से कुछ फायदा नहीं मिल पाता वहीँ पुलिस में महिलाओं की कमी है. और यह महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में बाधा बन रहा है. लेकिन शायद ही कोई सरकार सेना में महिला भर्ती बंद कर पाए. कारण? वही महिला अधिकारों की बात करने वाले लोग. नतीजा? एक तरफ महिला सुरक्षा में हमारी कमजोरी तो दूसरी तरफ महिलाओं की क्षमताओं का बेवजह नष्ट होना.

अब जरा दुसरे पक्ष पर बात करते हैं महिला अधिकारों को एक जामा पहनाया गया है जिसमें उच्छ्रंखलता को ही महिला स्वतंत्रता मान लिया गया. इसी सोच के वशीभूत देर रात तक महिलाओं का बाहर रहना उनके अधिकारों से जोड़ दिया गया. यक़ीनन भारत जैसे विकासशील देश का एक बड़ा तबका आज भी महिलाओं को उपभोग की वस्तु के तौर पर देखता है और आश्चर्यजनक रूप से इसमें निम्न आय/शिक्षा वर्ग वाले लोगों के साथ साथ उच्च आय/शिक्षा वर्ग के लोग भी हैं. यकीन नहीं आता तो आप अधिकतर विज्ञापन/फिल्मों को देखिये. आखिर एक पुरुष अंडरवियर/शेविंग-क्रीम के विज्ञापन में महिलायें क्या कर रही हैं? जी. सही जवाब. वे इसे खूबसूरत बना रही हैं क्योंकि वे सजावट का सामान हैं. यह भी महिलाओं के साथ धोखा ही है और यह धोखा महिला अधिकारों के नाम पर हुआ है. पुरुषों से बराबरी का यही भ्रम महिलाओं के हाथ में जाम और उँगलियों में सिगरेट भी पकड़ा रहा है. थोडा और आगे जायेंगे तो यह अधिकार फ्री सेक्स के आसपास दम तोड़ने लगता है. 

कमियां गिनना आसान है इसलिए आप कह सकते हैं कि वही रास्ता मैंने अपना लिया है लेकिन आप गौर से देखेंगे तो यह कमियां एक पैटर्न में हैं. यहाँ महिला अधिकारों के नाम पर महिलाओं को बाजार (विज्ञापन/फ़िल्में ट=इत्यादि) में खड़ा कर दिया गया है या दोयम दर्जे का पुरुष बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है (सेना/पुरुष केन्द्रित व्यवसाय). इसमें महिला की अपनी पहचान कहाँ है? मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी भी गाँव में डेयरी या बुनकर व्यवसाय में लगी महिला को शाहर के किसी नाईट क्लब या बोर्ड रूम में बैठी महिला से अधिक बदलाव का वाहक मानता हूँ. 

ऐसा नहीं है कि महिला अधिकारों के इस खेल में केवल महिलायें ही शिकार बनी हैं. इसका शिकार पुरुष भी बने हैं. यह सब मानते हैं कि घर के रख रखाव और बच्चों के साथ पुरुषों के मुकाबले महिलायें अधिक सहज महसूस करती हैं और वे इसमें दक्ष भी हैं. इसमें कुछ वैज्ञानिक कारण हैं तो कुछ सामाजिक अभ्यास. ये दोनों कारण मिलकर इस तरह के कामों में महिलाओं को अधिक सक्षम बनाते हैं लेकिन पिछले कुछ समय में इस सक्षमता को महिलाओं की सामाजिक मजबूरी कहकर सामने रखा गया तो पुरुषों को यह जिम्मेदारी उठाने के नैतिक और सामाजिक दबाव में घेरा गया. नतीजा? दो अलग अलग जगहों पर दो ऐसे लोगों की तैनाती ऐसे काम में हो गई जिसमें वे सहज ही नहीं हैं. 

अंत में, महिला अधिकारों के छलावे से बाहर निकालें. महिलाओं का घर से बाहर निकलना शुभ है मगर इसका मतलब पुरुषों की नक़ल करना भर न मानें. बहुत से ऐसे काम हैं जहाँ महिलायें पुरुषों से बेहतर काम कर सकती हैं. वहां संभावनाएं भी हैं और मौके भी, बस नजर पैदा करें. और सबसे महत्वपूर्ण बात महिलाओं की आजादी का मतलब पुरुषों से मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी आजादी के अर्थ उन्हें स्वयं ढूँढने होंगे. पुरुषों को साथी माने, प्रतिद्वंदी नहीं. और हो सके तो नारीवाद के नाम पर नारी-अधिकारों को बेचने वालों के हंगामे से बचें. महिला अधिकार जंग का परिणाम नहीं सफ़र की परिणति होने दें.

महिला अधिकारों के नाम पर यह चलावा केवल सामजिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य में हो रहा हो ऐसा नहीं है. यह खेल कानूनी अधिकारों में भी चल रहा है जिस पर अगले लेख में बात करेंगे....

Sunday, 15 February 2015

महिला-पुरुष समानता : कितना भ्रम? कितना सच?

हमारे आस-पास बहुत सी ऐसी बातें और धारणाएं हैं जिन पर हम अक्सर बिना सोच विचार किये यकीन कर लेते हैं. इस तथाकथित यकीन के पीछे भी अलग अलग कारण हो सकते हैं. कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन पर हम आँख मूँद कर इसलिए यकीन कर लेते हैं क्योंकि उन्हें हम बचपन से सुनते आये हैं (जैसा कि हमारे पुरखे सुनते आये थे.) तो कुछ बातों के विरोध में हम इसलिए नहीं बोलते क्योंकि हम सामाजिक रूप से अलग विचारधारा के साथ खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाते. जैसे हम अक्सर यह कहते या सुनते हैं कि महिला और पुरुष एक समान होते हैं. महिला और पुरुष समानता का यह विचार इतना खूबसूरत है कि कई राजनैतिक पार्टियां इस के आसपास अपना एजेंडा बना लेती हैं तो कई राजनेता इस कथन के सहारे भौगौलिक दूरियों को मिटाने का यत्न करते हैं. जैसा कि अमेरिका के राष्ट्रपति जोर्ज बुश ने किया जब वे 2001 में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव जीते. उनके धन्यवाद भाषण के वे शब्द आज भी याद किये जाते हैं. उन्होंने कहा था "हम भले ही किसी भी जाति से हों, किसी भी प्रदेश से हों, महिला हों या पुरुष हों, एक बात हम सबमे एक समान हैं और इसे वैज्ञानिक भी मानते हैं, और वह बात है कि शारीरिक संरचना के आधार पर हम सब 99.9% एक समान हैं." लेकिन शायद ही कभी हमने इस कथन के पीछे झाँक कर देखा हो. क्या वाकई महिला और पुरुष एक समान हैं? क्या उनमें कोई अंतर नहीं? क्या कोई ऐसा काम नहीं जिसे केवल महिलायें या पुरुष कर पाते हो? 

चलिए शुरुआत वहां से करते हैं जहाँ से जीवन की शुरुआत होती है यानी वह पल जब माँ के गर्भ में हम सब के जीवन की शुरुआत होती है, यानी दो शुक्राणुओं का मिलना.



यह बात शायद सब जानते हैं कि इन दो शुक्राणुओं के मिलने से शरीर के अन्दर पहली कोशिका का जन्म होता है और यही एक कोशिका बाद में दो में विभाजित होती है और दो से चार में, चार से आठ में. विभाजन का यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि एक शिशु का पूरा शरीर तैयार नहीं हो जाता. एक पूरे शरीर के तैयार होने के वक्त इसमें लगभग दस हजार करोड़ कोशिकाएं तैयार हो चुकी होती हैं और ये सभी कोशिकाएं उसी एक मूल कोशिका के विभाजन से बनी होती हैं जो पहले दो शुक्राणुओं के मिलन से बनी थी. इन सभी कोशिकाओं में एक बात समान होती है और वह है गुणसूत्रों के वे 23 जोड़े, जो पहले शुक्राणु के मिलन के वक्त बनते है. अब जरा देखते हैं कि एक लड़की और एक लड़के के पैदा होने की क्रिया में क्या अंतर होता है? 

यह बात सब जानते होंगे (बचपन में पढ़े जीव विज्ञान की बदौलत) कि एक लड़के या लड़की के पैदा होने में इन 23 जोड़े गुणसूत्रों के 22 जोड़े एक समान होते हैं. इन 22 जोड़ों में दोनों क्रोमोजोम XX होते हैं. लिंग निर्धारण में अहम् भूमिका 23 वें जोड़े की होती है, जहाँ महिला में यह 23वा जोड़ा बड़ी खूबसूरती से मिलते जुलते XX क्रोमोजोम्स का जोड़ा रहता है जबकि पुरुषों में यह एक बेमेल जोड़ा यानी XY होता है. इसमें Y क्रोमोजोम आकार में छोटा होता है. 


XX गुणसूत्रों का जोड़ा 

XY गुणसूत्रों का जोड़ा

यही 23 गुणसूत्रों के जोड़े किसी भी इंसान के शरीर हर कोशिका में पाए जाते हैं और इनमें इंसान की आनुवंशिक जानकारी एकत्रित होती हैं जिसे हम साधारण भाषा में डीएनए कहते हैं. यानी पुरुष और महिलाओं के डीएनए में मूलभूत रूप से असमानता है. डीएनए की इस असमानता के बावजूद दो पुरुष या दो महिलाओं के मामले में यह लगभग 99.9% तक समान रहता है. जबकि एक पुरुष और एक महिला में यह केवल 98.5% सामान रहता है. इस तरह केवल लिंग परिवर्तन के साथ .1% का यह अंतर अचानक बढ़कर 1.5% तक पहुँच जाता है यानि 15 गुना ज्यादा. महिलाओं के साथ पुरुषों के डीएनए की समानता का यह अनुपात अगर आपको अधिक लगता है तो कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों पर निगाह डालने की जरुरत है जो एक पुरुष और एक नर चिम्पांजी के डीएनए को ९८ प्रतिशत से अधिक समान बताते हैं. महिला और पुरुषों के बीच डीएनए की यह असमानता क्या किसी और तरह से भी सामने आती है? 

कुछ और बातें हैं जिनसे इस बात को बल मिलता है कि यह असमानता आगे भी बनी रहती है. अगर हम बात बीमारियों की करें तो कुछ ख़ास बीमारियाँ पुरुषों में ज्यादा होती हैं तो कुछ ख़ास बीमारियाँ महिलाओं में ज्यादा होती हैं. उदाहरण के तौर पर ऑटिज्म यानि मानसिक रूप से कमजोर होने की बीमारी महिलाओं में मुकाबले पुरुषों में अधिक पाई जाती है. आंकड़े बताते हैं कि पागलपन या ऑटिज्म के मामले में एक महिला के मुकाबले कम से कम पांच पुरुष पीड़ित हैं. वहीँ आर्थराइटिस यानी जोड़ों में दर्द और अन्य समस्याओं की बात करें तो एक पुरुष के मुकाबले 2 से 3 महिलायें इस रोग से पीड़ित हैं. इसी तरह ल्युपस नामक बीमारी, जिसमें शरीर के किसी भी ख़ास अंग को नुकसान पहुँचने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है. आंकड़े बताते हैं कि ल्युपस के हर एक पुरुष मरीज के साथ कम से कम 6 महिलाएं ल्युपस की शिकार हैं. यहाँ ऐसी किसी बीमारी का जिक्र नहीं किया गया है जो महिला और पुरुषों में शारीरिक भिन्नता के आधार पर पैदा हो होती हो. अन्यथा आंकड़े यह भी कहते हैं कि स्तन कैंसर केवल महिलाओं में होता है. खैर यह केवल मजाक था, आगे बढ़ते हैं. 

बीमारियों को और ध्यान से देखें तो यह अंतर केवल महिला और पुरुषों के बीच बीमारी का शिकार होने तक नहीं है बल्कि कुछ बीमारियाँ पुरुषों को छोटी उम्र में नुक्सान पहुंचाती हैं तो महिलाओं को बड़ी उम्र में. जैसे डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी (Dilated Cardiomyopathy) दिल से सम्बंधित एक बीमारी है जिसमें दिल की बाहरी दीवारें पतली हो जाती हैं और बाद में दिल का आकार बढ़ने लगता है. इस बीमारी का अध्ययन बताता है कि इस बीमारी के होने पर अधिक उम्र में ज्यादा नुक्सान की संभावना है परन्तु बढती उम्र में नुक्सान की यह संभावना महिलाओं में कम और पुरुषों में कहीं ज्यादा है. यानी इस बीमारी के होने पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के बचने की संभावना अधिक है, जैसा कि ग्राफ में बताया गया है. 



बीमारियों के स्तर की यह समानता व्यवहार में भी सामने आती है. उदाहरण के लिए आप विभिन्न दुर्घटनाओं के यूट्यूब पर मौजूद वीडियो देख सकते हैं. पुरुष ड्राइवर होने पर अधिकाँश मामलों में गाड़ी जोर से आती है और टक्कर के बाद रुक जाती है. महिलाओं के केस में यह एक्सीडेंट कम स्पीड पर होता है लेकिन एक बार टक्कर लग जाने पर महिलायें ब्रेक की बजाय एक्सीलीटर पर पैर दबा देती है और गाड़ी ज्यादा तेज चलती है. दुर्घटना होने पर ब्रेक की बजाय स्पीड पैदल दबाने की यह घटना बताती है कि पुरुष और महिलाएं एक सी परिस्थिति में अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हैं. तो फिर समानता है कहाँ? कहीं नहीं. जी! 

पुरुष और महिलायें समान नहीं है, अलग अलग हैं. दोनों का सम्मान जरूरी है. लेकिन दोनों को एक समान बनाने की यह अंधी दौड़ महिलाओं को ज्यादा नुक्सान पहुंचा रही है. बात चाहे विभिन्न व्यवसायों में उतरने की हो या व्यसनों में, पुरुषों से बराबरी की इस दौड़ में महिलायें केवल दोयम दर्जे के पुरुष के रूप में सामने आ रही हैं. तो इस भ्रम को अपने मन से निकालिए. महिला पुरुष बराबर नहीं हैं, बराबर नहीं हो सकते. दोनों अलग हैं और बराबर सम्मान के अधिकारी हैं. पहले दोनों को अलग अलग समझना शुरू करें, तुलना खुद-ब-खुद बंद हो जायगी और बेहतरी का भ्रम भी दिमाग से निकल जायगा. (अंतिम वाक्य महिलाओं और पुरुषों पर समान रूप से लागू होता है.)

बाकी बातें अगली बार.....

Sunday, 8 February 2015

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला ख़त.....


प्रिय अरविन्द केजरीवाल,

सबसे पहले आपको बधाई हो कि दिल्ली के चुनाव में आपकी पार्टी ने उम्मीद से बेहतर तरीके से भाजपा और अन्य पार्टियों का मुकाबला किया. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बने यह आकांक्षा रखने वालों में मैं स्वयं भी था, हालांकि आपकी पार्टी से तमाम मुद्दों पर असहमति का अपना अधिकार अब भी मैं सुरक्षित रखना चाहता हूँ. इसके बावजूद लोकतंत्र में असहमति की आवाज बने रहने का पक्षधर होने के नाते आग के लिए पानी के डर के तौर पर उभरी आपकी पार्टी के लिए शुभेच्छा रखता हूँ. आप यह भी कह सकते हैं कि इस पार्टी से सहानुभूति होने का एक कारण अन्ना आन्दोलन से जुड़े रहना भी है और वैकल्पिक राजनीति का सपना देखने की जुर्रत भी.

अब जबकि दिल्ली में मतदान हो गया है और उम्मीदों आकांक्षाओं की लहर पर सवार आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के पूर्वानुमान हर एक्जिट पोल में हर चैनल लगा रहा है, ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का उत्साह उफान पर है जो स्वाभाविक है. उम्मीदों का असलियत में परिवर्तित होना और कार्यकर्ताओं द्वारा जमीन पर की गई मेहनत का नतीजों में झलकना यक़ीनन ख़ुशी का मौका होता है लेकिन यह मौका आत्मनिरीक्षण और भविष्य के लिए आउटलाइन बनाने का भी होता है. यह मौका होता है उन गलतियों को ढूँढने का जो पहले हुई, ऐसी व्यवस्था बनाने का कि वे गलतियां फिर न हों. ख़ुशी की लहर में उड़ना आसान है लेकिन जमीन पर बने रहना साबित करता है कि आप इस ख़ुशी के काबिल हैं, इसलिए यह मौका शायद ज्यादा महत्वपूर्ण है आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों के लिए, ताकि लोग उस भरोसे को कायम रख सकें जो उन्होंने आंदोलन से राजनैतिक पार्टी बने इस दल में दिखाया है.

इसके अलावा भी यह मौका होता है उन कार्यकर्ताओं/शुभचिंतकों की बात सुनने का जो अपनी असहमतियां/नाराजगियां पीछे धकेल कर पार्टी के लिए काम कर रहे थे, और आम आदमी पार्टी के लिए यह मौका इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पार्टी की मूलभूत विचारधारा में स्वराज भी है जिसमें हर जमीनी कार्यकर्ता पार्टी में अरविन्द केजरीवाल के बराबर अहमियत रखता है. मैं यह कहने की धृष्टता कर रहा हूँ कि आपके लिए यह मौका है स्वराज को स्थापित करने का जिससे आम आदमी पार्टी अब तक चूकती रही है. पार्टी कार्यकर्ता तो नहीं लेकिन पार्टी शुभचिंतक के तौर पर मैं भी कुछ बातें आपके सामने रखना चाहूँगा, बिना यह चाहे कि आप इन्हें ज्यों का त्यों मान लें. हाँ, यह जरूर कहूँगा कि आप इन पर विचार करें और अगर इनमें से कोई भी विचार दिल्ली और देश की जनता की बेहतरी के लिए उपयुक्त हो तो इस्तेमाल करें.

1. यह चुनाव हर किसी भी चुनाव की तरह पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई था, ऐसे में जीत की उत्कृष्ट आकांक्षा होना आसानी से समझ में आता है. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आपने दिल्ली के मतदाताओं को लुभाने के लिए एक लोकलुभावन घोषणापत्र तैयार किया जिसमे फ्री और सस्ती सुविधाएं मुख्य वादा था. आज के सन्दर्भ में महंगाई और भ्रष्टाचार की मार झेल रही जनता को यह त्वरित राहत देने वाला फैसला समझ में भी आता है लेकिन लंबे समय में ऐसी कोई अर्थव्यवस्था टिक पायेगी जिसमें नागरिक को उपभोक्ता की बजाय फ्री का मेहमान समझ जाए, इसमें मुझे संदेह है. हम इस तरह की फ्री सुविधाओं को देने के परिणाम इस से पहले बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में हम देख चुके हैं, इसलिए मेरी आपसे विनती है कि लंबे समय में कोशिश फ्री सुवोढायें देने की बजाय रोजगार पैदा करने की हो ताकि झुग्गी में रहने वाला व्यक्ति भी बिजली पानी और इंटरनेट जैसी सुविधाएं इस्तेमाल कर सके लेकिन भुगतान करके. वैसे भी फ्री सुविधा के बजाय भुगतान करके ली सुविधा जहाँ आत्मविश्वास की पोषक होती है वहीँ यह अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छी नीति है जहाँ अर्थ के हस्ततान्तरण की गति से ही विकास प्रभावित होता है.

2. दिल्ली चुनाव में आपको मिलने वाले अभूतपूर्व समर्थन के पीछे आपकी, आपके साथी नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं की दिन रात की मेहनत के साथ भाजपा के द्वारा आप के खिलाफ चलाये गए नकारात्मक चुनाव प्रचार और सत्ता में आने के बाद भाजपा में आये अहंकार की भी अहम भूमिका थी. उम्मीद है आप इन दोनों से दूर रहेंगे. सत्ता पक्ष के गलत कामों को जनता के सामने लाना विपक्ष की जिम्मेदारी होता है और आप बिना विपक्ष में रहे भी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे हैं इसके लिए साधुवाद. परंतु अब जब आप सत्ता में होंगे, जनता आपकी राजनीति का सकारात्मक पक्ष देखना चाहेगी. केंद्र में मोदी सरकार है, उसकी गलतियां उजागर करना भी जरुरी है परंतु आप पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे बाद में कुछ और. केंद्र की गलतियां नजर अंदाज करने की सलाह देने की धृष्टता मैं नहीं कर सकता क्योंकि यह भाजपा के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, देश के लिए नहीं. मेरा सुझाव केवल इतना है कि यह जिम्मेदारी ऐसे नेताओं को दें जो दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ें जैसे योगेन्द्र यादव, संजय सिंह, आनंद कुमार, प्रशांत भूषन, कुमार विश्वास इत्यादि. हमेशा कैमरों के सामने रहने का लोभ त्यागना पार्टी और देश के लिए लंबे समय में कारगर होगा. यक़ीनन 2019 के राष्ट्रीय चुनाव के मद्देनजर देश की राजनीति में बड़े बदलाव होंगे और उसमे आपकी अहम भूमिका हो सकती है लेकिन याद रखें 2019 में अभी 4 साल हैं और आप इन 4 सालों में दिल्ली को एक उदाहरण के तौर पर देश के सामने रख सकते हैं. 

3. पार्टी के मुख्य मुद्दों में से एक मुद्दा स्वराज भी है यह आपको याद दिलाने की शायद जरूरत नहीं है परंतु अभी तक पार्टी इस मुद्दे पर काम करने में लगभग असफल ही रही है. इसका उदाहरण आम आदमी पार्टी का 10 प्रदेशों में उपस्थित संगठन है जिनसे संवाद करने में पार्टी नेतृत्व पूरी तरह नाकाम रहा है. इसका प्रमुख कारण हर काम अरविन्द केजरीवाल के द्वारा या उनके रास्ते होने की परम्परा पार्टी में आ जाना है. उम्मीद है आप इसे बदलेंगे. पार्टी के मूल दृष्टिपत्र को एक बार फिर पढ़ने की जरूरत है तो उसे पढ़ें. आपको याद होगा उसमे लिखा था कि पार्टी के उम्मीदवारों का चयन पार्टी कार्यकर्ता करेंगे और आपने पिछले चुनाव में ऐसा किया और अपेक्षित सफलता भी मिली. लोकसभा चुनाव में यह पूरी प्रक्रिया समय की कमी को सामने रखते हुए नजर अंदाज कर दी गई और इस बार दिल्ली चुनाव में समय होते हुए भी टिकट पार्टी कार्यकर्ताओं की वोटिंग के बिना दिए गए, उम्मीद है आप पार्टी में स्वराज स्थापना की ओर काम करेंगे. इसका एक बड़ा फायदा देश भर में पार्टी को फ़ैलाने के दौरान दिखाई देगा जब किसी अन्य प्रदेश में चुनाव लड़ना आपके चेहरे के बिना भी संभव होगा. यक़ीनन ऐसा करने में आपको अपने हिस्से का मंच किसी दुसरे व्यक्ति से बांटना होगा लेकिन विचारधारा के लिए यह बेहतर है. यकीन मानिये पार्टी में प्रदेश स्तर पर आपको कई अरविन्द केजरीवाल मिल जायेंगे, जिनमे से कई को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, देर बस उन को लाइम लाईट में लाने की है. उम्मीद है आप पार्टी को चंद चेहरों और दिल्ली से आगे ले जाकर सामूहिक नेतृत्व को विकसित करने में सहयोग देंगे और ऐसा करने के लिए आपको केवल इतना करना है कि आप दिल्ली की जनता पर ध्यान दें.

4. दिल्ली चुनाव में टिकट वितरण और चुनाव लड़ने के दौरान बेहतरीन प्रबंधन की एक मिसाल आम आदमी पार्टी ने पेश की है लेकिन इस बेहतरीन मिसाल में कोई दाग या बेहतरी की और सम्भावना नहीं थी ऐसा सोचना खुद को धोखा देना होगा. यक़ीनन आप जीत रहे हैं लेकिन केवल नतीजे अंतिम सत्य नहीं, नैतिकता और सच के साथ खड़ा रहना वैकल्पिक राजनीति का बड़ा सच है. दिल्ली चुनाव के दौरान हुई गलतियों को आप दोहराएंगे नहीं ऐसा मैं उम्मीद करता हूँ, इन गलतियों में वो दो टिकट भी हैं जो अंतिम समय पर काटने पड़े और बाकी बचे 10 टिकट भी, जिनका प्रशांत भूषन जी ने विरोध किया परंतु जो पार्टी की छवि को नुकसान के मद्देनजर नहीं काटे गए. इन दस लोगों में पार्टी की सामूहिक शर्म नरेश बालियान भी हैं और हरियाणा से लगती दिल्ली की वे सीटें भी जहाँ पार्टी मानकों की बजाय जीतने की क्षमता के आधार लोगों को टिकट दिया गया. हो सकता है इनमे से कुछ लोग जीतकर भी आ जाएँ, और यह मेरी कामना भी है, ऐसे में आप इन्हें पार्टी विचारधारा से जोड़ने में कितने कामयाब होते हैं यह आपके लिए असली चुनौती होगी. उम्मीद है आप इस ओर ध्यान देंगे. 

5. दिल्ली चुनाव जीतने में आपकी ईमानदार छवि का बड़ा योगदान रहा है. आप आंदोलन से आये हैं और अब आपकी जिम्मेदारी प्रशासन चलना है. पिछले कार्यकाल में आप एक आंदोलनकारी रहकर प्रशासन चलाने की मिसाल पेश करने की कोशिश में न तो आंदोलन ही कर पाये न ही प्रशासन की कोई बेहतरीन मिसाल दे पाये. यहाँ मैं यह साफ़ कर दूं कि आपका पिछला कार्यकाल कई बेहतरीन फैसलों के कारण यादगार है और मैं उन फैसलों को लागू होते दोबारा देखना चाहूँगा लेकिन बहुत से अनचाहे विवाद और अव्यवस्था के कारक मुद्दों से बचा जा सकता था. उम्मीद है आप इस बार अन्दोलनकर्ता से प्रशासक का सफर अच्छे से तय करके जनता के भले के लिए कार्य करेंगे. यह समय आन्दोलन की रूमानियत से बाहर आने का है.

6. अब जब आप सत्ता में हैं तो आपकी पार्टी के कार्यकर्ता जो अब तक आपके साथ अडिग खड़े थे उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही आपके बजाय जनता के लिए ज्यादा होगी क्योंकि हर गली नुक्कड़ चौराहों पर आपकी सरकार द्वारा किये गए कार्यों का जवाब उन्हें देना होगा. जमीनी कार्यकर्ता किसी भी पार्टी का वह व्यक्ति होता है जिसे नेता के कार्यों का श्रेय तो नहीं मिलता लेकिन उसके कामों का अपयश अपने ऊपर झेलना होता है. ऐसे में संभव है कि पार्टी के अंदर से आपके कुछ फैसलों के विरोध में आवाज उठे. यह एक मजबूत लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी भी है. उनकी बात को सुनिए, क्योंकि जिस तरह आप लोकतंत्र में असहमति की आवाज उठाकर वैकल्पिक राजनीति का रास्ता साफ़ कर रहे हैं ऐसे ही आपकी पार्टी में भी असहमति की आवाज का होना जरूरी है, यह लोकतंत्र का गहना है. यकीन मानिये वे भाजपा के एजेंट नहीं हैं, जैसा कि इस से पहले बहुत से असहमति की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं को कहा गया. वह वही व्यक्ति है जिसने अन्ना आन्दोलन के दौरान सड़कों को नापा था तो निर्भया काण्ड में पुलिस के डंडे भी खाए थे. समय आने पर वह आपके खिलाफ भी आवाज उठाएगा क्योंकि वह आपके साथ नहीं है, वह सच के साथ है. उसका आवाज उठाना शुभ है, इसे रास्ता भटकने से बचने के लिए अलार्म की तरह मानें.

7. अन्ना आन्दोलन की शुरुआत दिल्ली में हुई, 25 जुलाई को आपका अनशन भी जंतर मंतर पर ही हुआ, बिजली पानी आन्दोलन से लेकर पहला और दूसरा चुनाव भी दिल्ली में ही केन्द्रित रहा. ऐसे में दिल्ली ऑफिस में रहने वाले कार्यकर्ताओं का पार्टी के फैसलों में सहभागी होना कहीं से भी गलत नहीं है. लेकिन यह समस्या तब बन जाता है जब दिल्ली के किसी कार्यकर्ता के गिरफ्तार होने पर पार्टी थाने का घेराव कर दे और सोशल मीडिया पर भी इसे राष्ट्रीय समस्या की तरह प्रचारित किया जाए. दूसरी भ्रष्टाचार के किसी मुद्दे को लेकर उत्तराखंड, मध्य प्रदेश या राजस्थान का कोई कार्यकर्ता अनशन पर बैठा हो और पार्टी नेतृत्व से एक समर्थन भरा बयान जारी करवाना भी विश्व युद्ध लड़ने जैसा हो जाए. आपकी पार्टी को यहाँ तक पहुन्चाने में दिल्ली के साथ साथ लगभग सभी प्रदेशों के कार्यकर्ताओं का योगदान है, इसे भूलें नहीं. इसे भूना इसलिए भी नुक्सानदायक हो सकता है क्योंकि यह कार्यकर्ता आपसे कोई व्यक्तिगत फायदा नहीं, मुद्दों पर समर्थन चाहता है जैसा कि वह आपको देता रहा है. दिल्ली ऑफिस की कोटरी के नियंत्रण से बाहर निकलें.

उम्मीद है आप इन मामलों पर ध्यान देंगे. मैं प्रशासन या अन्य बड़े मामलों में आपको कोई भी राय देने से चेष्टापूर्वक बच रहा हूँ क्योंकि बड़े मामलों पर राय देने वाले बहुत से लोग आपकी सरकार बनने के बाद आपके पास होंगे लेकिन अगर आप इन छोटे छोटे मामलों पर कुछ बेहतरी लाने वाला काम कर पाए तो यकीन मानिये वैकल्पिक राजनीती का सपना सच होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. मैं यह पत्र आपको भेजने के साथ-साथ सोशल मीडिया और अपने ब्लॉग पर भी डाल रहा हूँ ताकि सभी कार्यकर्ता इस पर राय दे सकें. हो सकता है उपरोक्त किसी भी मामले पर मेरी व्यक्तिगत राय गलत हो, ऐसे में मैं यह भूल सुधारने के लिए प्रस्तुत हूँ.  दिल्ली वासियों की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिए शुभकामनाएं.

- अन्ना आन्दोलन के आईने में वैकल्पिक राजनीति का सपना देखने वाला एक आम नागरिक

Friday, 23 January 2015

'आप' के पास बचा क्या है?

दिल्ली की चुनावी सरगर्मी तेज हुई तो खतरनाक ठण्ड में भी जहाँ एक ओर नेता मतदाता को लुभाने के लिए चुनाव प्रचार में उतर रहे हैं तो दूसरी ओर मीडिया चैनलों पर भी ख़बरों का प्राइम स्लॉट कब्जाने की रणनीतियां बनने लगी है. इसके लिए कोई भी किसी भी हद तक जाने को तैयार है बात चाहे भाजपा द्वारा किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की हो या आम आदमी पार्टी नेता आशीष खेतान द्वारा अरविन्द केजरीवाल के क़त्ल की आशंका जताना. ऐसे दिलचस्प राजनैतिक माहौल में मैं स्वयं खुद को एक राजनैतिक ब्लॉग लिखने से रोक नहीं पाया जिसमे अरविन्द केजरीवाल और किरन बेदी की तुलना की गई थी (पढ़ें  'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?). किरन बेदी का पलड़ा भारी होने पर आम आदमी पार्टी के कुछ पुराने साथियों ने आन्दोलन के दिनों का हवाला देकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में लिखने की दुहाई दी. ऐसे में बड़ा स्वाभाविक सवाल सामने आया कि आखिर आम आदमी पार्टी के पास ऐसा क्या बचा है जिससे वह खुद को आन्दोलन से उपजी पार्टी कह सके. तभी अचानक शांति भूषण जी का वह बयान आया कि आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गई है और अरविन्द केजरीवाल पार्टी से इस्तीफ़ा दें. एक एक कर वह सभी मुद्दे सामने घूमने लगे जिनके लिए पार्टी की स्थापना की गई थी. उनकी मौजूदा स्थिति आपके सामने रखना चाहूँगा.


जनलोकपाल आन्दोलन से उपजी पार्टी होने के कारण स्वाभाविक है कि यह पार्टी का पहला और आधारभूत मुद्दा होना चाहिए था. इसके कारण कथित रूप से पार्टी ने एक गठबंधन से चलने वाली सरकार भी कुर्बान की. अब एक ओर जहाँ अरविन्द केजरीवाल खुलेआम टीवी इंटरव्यू में कहते दिखाई दे रहे हैं कि जन-लोकपाल के बजाय सस्ती बिजली/पानी के मुद्दे आम जनता के ज्यादा करीब हैं इसलिए पार्टी जन-लोकपाल के बजाय फिलहाल फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी जैसे मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर रही है. दूसरी ओर कुछ महीने पहले तक सरकार 'कुर्बान' करने का दावा करने वाले अरविन्द और अन्य नेता इस मामले पर कई कई बार माफ़ी मांग चुके हैं और इस बार किसी भी हाल में पांच साल पूरे करने का वादा कर रहे हैं.मतलब लोकपाल की आकांक्षी जनता के हाथ खाली?

जनता को अधिकार देने के पैरोकार अरविन्द केजरीवाल स्वराज के नाम से एक किताब भी लिख चुके हैं जिसमे महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की झलक दिखाई देती है. इस किताब के अनुसार जनता के प्रतिनिधि से लेकर जन-प्रतिनिधि द्वारा धन के इस्तेमाल के चुनाव तक का फैसला जनता स्वयं करेगी. इसी का प्रतिनिधित्व पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया था जब यह फैसला लिया गया कि पार्टी के आम कार्यकर्ता के द्वारा वोटिंग होने पर ही किसी व्यक्ति को एम्.एल.ए. का टिकट दिया जायगा. पिछले चुनाव में छिटपुट विवादों के बीच ऐसा किया भी गया लेकिन लोकसभा चुनाव में समय की कमी का हवाला देकर ऐसा करने से किनारा कर लिया गया. इस बार दिल्ली चुनाव में समय भी भरपूर था और माहौल भी पार्टी के पक्ष में था. लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने सभी टिकटों का फैसला खुद किया, बिना किसी कार्यकर्ता की सलाह के. (अंदरूनी कोटरी के लोगों की गिनती कार्यकर्ताओं में करना बेवकूफी होगी.) मतलब एक बार टिकट का बंटवारा पार्टी कार्यकर्ताओं की राय से करने के बाद अब बिना हाईकमान की पार्टी ने अदृश्य हाई-कमान बना लिया है.
इसी बिना हाई-कमान की पार्टी होने का दम भरने के लिए पार्टी जिला समिति सदस्यों, प्रदेश समिति सदस्यों और केन्द्रीय समिति सदस्यों को मिलाकर बनाई गई नॅशनल कौंसिल को पार्टी की केन्द्रीय समिति पर नकेल कसने और तमाम बड़े फैसले करने का अधिकार दिया गया था. इस सिस्टम से अनजान लोगों की जानकारी के लिए इस समिति की बैठक पार्टी संविधान के अनुसार साल में दो बार होनी थी और केन्द्रीय समिति को किसी भी बड़े फैसले से पहले इस समिति की सहमति लेनी जरूरी थी. पार्टी बनने के छः महीने बाद होने वाली बैठक को लगभग सवा साल तक लटका के रखने के बाद जनवरी 2014 में यह बैठक हुई तो इसमें तमाम अनाधिकृत लोगों को बुलाया गया और 'तथाकथित' बहुमत से एक प्रस्ताव पास कर दिया गया कि नैशनल कोंसिल की बैठक साल में एक बार होगी और तमाम बड़े-छोटे फैसले करने का अधिकार केन्द्रीय नेतृत्व की 'राजनैतिक परिषद्' को दे दिया गया जिसमे फिलहाल 9 सदस्य हैं. यानी एक समय पर लगभग हर जिले के कार्यकर्ता से सलाह करने का दावा करने वाला केन्द्रीय नेतृत्व केवल 9 लोगों की मनमर्जी पर उतर आया. इसी के प्रभाव के कारण कई पुराने कार्यकर्ता और नेता पार्टी छोड़कर चले गए. उस पर तुर्रा यह कि साल में एक बार नैशनल कोंसिल की मीटिंग करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ.
आर टी आई कार्यकर्ता के तौर पर पार्टी के मुख्य चेहरे अरविन्द केजरीवाल की पहचान को और पुख्ता करने के लिए पार्टी ने स्वयं सूचना के अधिकार के खुद पर लागू होने का दावा किया. इस पारदर्शिता के खेल में शुरुआती 'केवल ऑनलाइन डोनेशन' से पलटते हुए जहाँ पहले पार्टी ने चादर में चंदा इकठ्ठा करना शुरू किया वहीँ कार्यकर्ताओं को डोनेशन स्लिप भी दी जाने लगी. अब यह सफ़र डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन दिखाने तक पहुँच चुका है. इस के लिए सुबूत की मांग करने वाले ट्रांजेक्शन नंबर CCA13GAAQ263 से दो अलग अलग स्लिप देख सकते हैं. चंदे के हिसाब के अलावा भी अन्य मुद्दों पर कितनी आर.टी.आई. एप्लीकेशन पार्टी कार्यालय में बिना जवाब दिए पड़ी हैं यह कोई नहीं जानता. इनमे से कईयों को तो 1 साल तक हो चुका है. (जी! मैं खुद की लगाईं अर्जी की बात कर रहा हूँ.)
पार्टी में सूचना के अधिकार के साथ साथ लोकपाल के लागू होने की भी बात कही गई थी जिसमे जिला कार्यालय से लेकर प्रदेश और केन्द्रीय स्तर पर एक लोकपाल बेंच का गठन किया जाना अनिवार्य था जो सम्बंधित स्तर पर किसी प्रकार की अनियमितता होने पर कार्रवाई करता. आज इस लोकपाल की मौजूदा स्थिति यह है कि लोकपाल की बात छोडिये कई जिलों में तीन या चार तक जिला समितियां बना दी गई हैं. (जी! पहली समितियों को भंग किये बगैर) यही हालात प्रदेश स्तर पर भी हैं.
इसके अलावा पार्टी की स्थापना के वक्त पार्टी का कहना था कि दूसरी पार्टियाँ छात्र/महिला/व्यापारी/अल्पसंख्यक मोर्चा इत्यादि के नाम पर समाज में बंटवारे का खेल खेलती हैं और आम आदमी पार्टी ऐसा नहीं करेगी. आज पार्टी के इन सभी नामों से अलग अलग विंग मौजूद हैं तो पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल ने इसका यह कहकर बचाव किया कि दूसरी पार्टियां यह विंग समाज को तोड़ने के लिए बनाती हैं तो हमने यह समाज में एकता लाने के लिए बनाये हैं.
अंतिम बात जिसका दम अरविन्द केजरीवाल पिछले दिल्ली चुनाव में हर सभा में भरते दिखाई देते थे वह थी पार्टी का परिवारवाद और व्यक्तिवाद से दूर होने. ऐसे में पार्टी के व्यक्तिवादी होने पर तो शायद कुछ कहना जरूरी नहीं है क्योंकि पार्टी में अरविन्द की लगभग सुपरह्युमन जैसी स्थिति पार्टी के व्यक्तिवादी होने का सीधा सुबूत है. रही बात परिवारवाद की तो एक पार्टी नेता की हत्या के बाद उन्ही के भाई/भतीजों को टिकट देने की मिसालें पार्टी में कई बन चुकी हैं. नित नए तरीकों से अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता करती पार्टी कब परिवारवाद की शिकार हो जाए कौन जानता है? आखिर राजनीति में आने के पहले दिन मुलायम सिंह/प्रकाश सिंह बादल/करूणानिधि इत्यादि भी तो परिवार वाद के खिलाफ जंग लड़ते हुए अकेले इस मैदान में थे. तो थोडा इन्तजार कीजिये अभी समय लगेगा इस उलटबांसी को लेने में.
इस तरह जहाँ एक ओर आम आदमी पार्टी अपनी तमाम मूल-भूत अच्छाइयों को छोड़ चुकी है वहीँ कई बड़ी भूलें पार्टी नेतृत्व लगातार करता रहा है जैसे दिल्ली से वाराणसी की दौड़ लगाना, हिट एंड रन टाइप के खुलासे करना, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का गला घोटना. यहाँ यह बता देना बेहतर होगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान तमाम वादाखिलाफियों और गलतियों की चर्चा यहाँ नहीं की गई है जिनकी लिस्ट अधिक लम्बी है. इन तमाम कारणों के साथ साथ सेकुलरिज्म के आईने में पार्टी लगातार वोटों के लिए किसी भी हद तक जाने के संकेत लगातार देती रही है, 'बाटला हाउस एनकाउंटर' की दोबारा जांच की मांग करना इसका एक उदाहरण था.
पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता, जो अन्ना आन्दोलन में सड़कों पर उतरने वालों में एक थे, के शब्दों में 'अन्ना आन्दोलन के दौरान तिरंगा झंडा उठाकर फख्र महसूस होता था, पार्टी बनी तो पहले झंडा छूटा बाद में एक एक कर सभी मुद्दे छूटते गए, अब बची है तो खाली हाथों लगाईं जाने वाली दौड़ जिसमे इनाम सत्ता का है, वह भी पार्टी नेताओं के लिए'.
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर आम आदमी पार्टी में ऐसा बचा क्या है जिसके कारण अन्ना आन्दोलन में भाग ले चुका कोई भी व्यक्ति इसे तमाम राजनैतिक पार्टियों से अलग माने? शायद कुछ भी नही. राजनीति बदलने का वादा करने वाली पार्टी खुद राजनैतिक बदलाव का शिकार हुई तो ऐसे रसातल में जायगी किसने सोचा था? ऐसे में किरन बेदी जैसी लौह महिला को मुकाबले में उतारकर भाजपा ने जले पर नमक छिडकने वाला ही दांव चला है. फिर भी जनता के मन में क्या है कौन जानता है? लेकिन फिर भी कम से कम आन्दोलन से उपजी पार्टी होने का दम भरना तो अब अरविन्द केजरीवाल को छोड़ ही देना चाहिए.

Sunday, 18 January 2015

'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?

दिल्ली में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच जुबानी और जमीनी जंग तेज हो गई है. इसमें पिछले हफ्ते तक आम आदमी पार्टी कुछ बढ़त लेती हुई इसलिए दिख रही थी क्योंकि भाजपा के पास अरविन्द केजरीवाल के कद का कोई नेता दिल्ली में मौजूद नहीं था. ऐसे में नेत्रत्वविहीन भाजपा अरविन्द केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले कर रही थी, जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपना योगदान केजरीवाल को नक्सलियों के साथ काम करने की सलाह देकर किया. यह अलग बात है कि इस तरह की बयानबाजी का फायदा भाजपा के बजाय खुद अरविन्द केजरीवाल को ज्यादा हो रहा था. यह अरविन्द केजरीवाल को 16 मई के पहले के नरेंद्र मोदी की स्थिति में खड़ा कर रहा था जहाँ यूपीए के मंत्री और नेता नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे थे और दूसरी ओर नरेंद्र मोदी उन हमलों का जवाब देने के साथ साथ भारत के भविष्य का खाका भी देश की जनता के सामने रख रहे थे. लगभग यही काम अरविन्द केजरीवाल दिल्ली को महिला सुरक्षा, फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी के सपने दिखा कर रहे थे.
इस लड़ाई में बड़ा मोड़ तब आया जब अन्ना आन्दोलन में अरविन्द केजरीवाल के साथ काम कर चुकी किरन बेदी भाजपा में शामिल हुई और भाजपा अरविन्द केजरीवाल के मुक़ाबिल अपना चेहरा किरण बेदी को बताने लगी. ऐसे में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के द्वारा किरन बेदी के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करना स्वाभाविक था. एक और जहाँ इस से किरन बेदी के पुराने बयानात को सामने लाने की जंग छिड़ पड़ी वहीँ किरन बेदी ने अरविन्द केजरीवाल पर कोई टिपण्णी न करके यह बताने की कोशिश की कि अरविन्द केजरीवाल उनके कद के बराबर नहीं है. ऐसे में एक नई बहस यह छिड़ पड़ी कि क्या किरण बेदी के आने से भाजपा को कोई फायदा होगा या यह केवल मीडिया में चर्चा का विषय बनने से आगे नहीं बढ़ पायगा. इसके फायदे या नुक्सान समझने के लिए हमें उन सभी चीजों पर गौर करना होगा जो आम आदमी पार्टी के नेता किरन बेदी के बारे में कह रहे हैं या कह सकते हैं.

इसमें पहला और सबसे अहम सवाल यही आता है कि क्या किरण बेदी का भाजपा के पाले में जाना अन्ना टीम और अन्ना के साथ धोखा है? गौरतलब है कि अन्ना आन्दोलन को राजनीति में बदलने की गुहार लगाने वालों में किरन बेदी, अनुपम खेर, वी. के. सिंह इत्यादि तमाम लोग थे. इनमे से जनरल वी. के. सिंह आज भाजपा सरकार में मंत्री हैं तो अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर भाजपा से सांसद हैं. अब किरन बेदी भी भाजपा में आ गई हैं. लेकिन यह शायद उतना बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं बन पायेगा क्योंकि किरन बेदी के एक साल पहले तक अराजनैतिक रहने के बयान का हवाला देने पर भाजपा पलटवार में अरविन्द केजरीवाल के 2012 से पहले के बयानों को सामने रख सकती है. वैसे भी बात से पलटने को मुद्दा बनाने पर आम आदमी पार्टी अधिक नुक्सान में रहेगी. उनके सामने सवाल ज्यादा बड़े होंगे जैसे लोकपाल को भूल जाना (जिसकी आज कहीं चर्चा नहीं हैं), बच्चों की कसम खाने के बाद कांग्रेस के साथ सरकार बना लेना, गाड़ी-बंगला लेना, केन्द्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की तलाश में दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ देना, वाराणसी और अमेठी के दुःख दर्द में साथ निभाने का वादा करके चुनाव के बाद वहां आज तक वापस न जाना. राजनीति में अपनी बात से पलट जाने में आम आदमी पार्टी का इतिहास छोटा भले ही हो लेकिन दाग गहरे उन्ही के दामन पर हैं.
दूसरा मुद्दा 'आप' यह बना सकती है कि कुछ समय पहले तक नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाली किरन बेदी लगभग एक साल पहले अचानक उनके गुण गाने लगी. तो यह तो अरविन्द केजरीवाल ने भी किया है. याद करें लोकसभा चुनाव से पहले अरविन्द केजरीवाल गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी के 10 साल के विकास की पोल 3 दिन में खोलने का दावा कर रहे थे, लेकिन आज वे नरेंद्र मोदी पर कोई भी सीधा हमला करने से बच रहे हैं क्योंकि तब और अब के नरेंद्र मोदी के कद में जमीन आसमान का फर्क है.
इसके अलावा किरन बेदी द्वारा अपने से जूनियर अधिकारी को प्रोन्नत किये जाने के विरोध में पुलिस सेवा से इस्तीफ़ा देना उन्हें पद का लालची घोषित करने का एक मौका तो देता है लेकिन बात राजनीति की हो या सामाजिक और पुलिस सेवा की, बड़े पद का मतलब बड़ी जिम्मेदारी, अधिक अधिकार के साथ साथ बड़े लक्ष्यों को पूरा करना भी होता है. ऐसे में बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में सरकार द्वारा अडंगा अडाने के कारण अगर किरण बेदी ने इस्तीफ़ा दे दिता तो यह उनकी नीयत पर कहीं से भी सवाल नहीं उठाता. वैसे भी देखा जाए तो यही कोशिश खुद अरविन्द केजरीवाल लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली से इस्तीफ़ा देकर कर चुके हैं. और देखा जाए तो अब भी अरविन्द केजरीवाल स्वयं मुख्यमंत्री पद की दौड़ में है तो क्या यह पद की लालसा है या बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कोशिश?
एक अन्य आक्षेप किरन के ऊपर तानाशाही रवैया होने का लग सकता है जो उनके जनसंबोधनों और मीडिया बहसों में अक्सर परिलक्षित हो जाता है. (अब तक तो भाजपा के कार्यकर्ता भी इसका स्वाद चख चुके होंगे) इस तरह के आरोप स्वयं अरविन्द पर भी लग चुके हैं. उनेक कई साथी इस तरह के आरोप लगाकर उन्हें छोड़ चुके हैं (विनोद कुमार बिन्नी, शाजिया इल्मी, शमून काजमी, उनके अपने विधायक भी) तो कई साथी पार्टी में रहकर उन पर यह आरोप लगा चुके हैं (योगेन्द्र यादव का ख़त याद कीजिये और आम आदमी पार्टी के ऑफिस में चलती बतकहियों पर ध्यान दीजिये.)इसके अलावा भी आम आदमी पार्टी के प्रदेश और जिला समितियां सदस्य अक्सर आम आदमी पार्टी की केंद्रीय समिति के कुछ सदस्यों पर पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड बनाने का आरोप लगाते रहे हैं, जिनमे से मैं स्वयं एक हूँ.
यानी कुल मिलकर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की लड़ाई शुरू होने की दशा में अरविन्द के पास ऐसा कोई तीर नहीं होगा जिसका जवाब भाजपा के पास न हो बल्कि कई मामलों में अरविन्द किरन बेदी के सामने कमजोर पड़ते दिखाई पड़ते हैं. जैसे किरन के मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व के सामने अरविन्द का इनकम टैक्स अधिकारी के तौर पर फीका रिकॉर्ड और मुख्यमंत्री के तौर पर तमाम दाग (दागों का मतलब प्रशासनिक अक्षमता लिया जाए, जैसे समाधान न कर पाने की स्थिति में मैदान छोड़ देना, सोमनाथ भारती प्रकरण, धरना, असफल जनता दरबार इत्यादि). किरन की कड़क छवि अरविन्द के ढुलमुल रवैये के सामने उन्हें बड़ा साबित कर देती है. इसी ढुलमुल रवैये के कारण अरविन्द बार बार अपना स्टैंड भी बदलते रहे और उनके साथी भी लगातार बदलते रहे. (अन्ना आन्दोलन के गिने चुने कार्यकर्ता और सहयोगी आज उनके साथ हैं) किरन को इस छवि में और मजबूती सामान्य ज्ञान की उन किताबों से मिलती है जिसे भारत का आम नागरिक पढता रहा है और जिनमें किरन अपना नाम कई दशक पहले दर्ज करा चुकी हैं. यानी मनोवैज्ञानिक रूप से किरन बेदी अरविन्द केजरीवाल के ऊपर बढ़त बना चुकी हैं.
बात मुद्दों की करें तो भी अरविन्द केजरीवाल के हाथ किरन बेदी के आने के बाद लगभग खाली दिखाई देते हैं. किरन बेदी के आने से महिला सुरक्षा का मुद्दा उनके हाथ से फिसल चुका है. लोकपाल और राईट टू रिकाल वह खुद ही छोड़ चुके हैं. ऐसे में सस्ती बिजली और सस्ता पानी की योजना के दम पर वे कहाँ तक पहुँच पायेंगे जबकि सस्ती बिजली के वादे से ज्यादा आम जनता को 24 घंटे बिजली का वादा ज्यादा मजबूत लगता है. तो अरविन्द के हाथ मुद्दों से लगभग खाली होने के बाद उनके सामने रास्ता क्या बचता है? वही, जो पिछले हफ्ते तक भाजपा के पास था. यानी किरन बेदी की छवि को छोटा करना, लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर जहाँ आम आदमी पार्टी नेगेटिव कैम्पेन में उलझ कर रह जायेगी वहीँ किरन अन्ना आन्दोलन की सहयोगी होने के कारण बहुत सी ऐसी बातों को सामने ला सकती हैं जिससे अरविन्द के लिए स्थिति असहज हो जाएगी. यूँ तो इस तरह की बातों से अन्ना आन्दोलन के दिनों के लगभग सभी लोग परिचित हैं (स्वयं मैं भी) लेकिन कम से कम खुले मंच तक इन बातों का 1 प्रतिशत भी आज तक किसी ने नहीं रखा है.
तो क्या किरन बेदी को मैदान में उतार कर भाजपा ने चुनाव से पहले ही मोर्चा जीत लिया है? ये दिल्ली है जनाब! मामला इतना आसान नहीं है. समस्याएं किरन के सामने भी हैं. सड़क का नेता न होना, भाजपा कार्यकर्ताओं से जुड़ाव न होना, जुड़ाव के लिए किरन खुद को बदलने के लिए तैयार दिखती हों ऐसा भी नहीं है (नमूना आपने भाजपा में आने के अगले दिन देख लिया होगा जब किरन भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बीच में कार्यकर्ताओं को डपट रही थी, याद कीजिये वे शब्द "आपको एंटरटेनमेंट चाहिए? तो बाहर चले जाइए".) इसके अलावा मुख्यमंत्री पद के लिए आस लगाए बैठे भाजपा नेता क्या उन्हें स्वीकार कर पायेंगे? हालाँकि इसमें अमित शाह सर्कस के रिंग मास्टर की भूमिका निभा सकते हैं. तो देखते रहिये क्योंकि मुकाबला दिलचस्प होने वाला है."

Monday, 5 January 2015

सुनिए...... आपका दिमाग बात कर रहा है......

पिछले ब्लॉग कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यों है? को लगभग एक माह बीत चुका है. (यह ब्लॉग उसी दिए गए लिंक की अगली कड़ी मात्र है, इसलिए आपसे निवेदन है कि दिए गए लिंक को जरुर पढ़ें.) कई मित्रों ने ब्लॉग पर कमेंट में प्रतिक्रिया दी तो बहुत से साथियों ने फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज किये. तारीफ़ करना उनका सामजिक कर्त्तव्य था जिसे कई प्रतिक्रियाओं में निभाया भी गया लेकिन बेहतर प्रतिक्रयाएं वे थी जिनमे पिछले लेख की निर्मम आलोचना की गई या कई ऐसी अवधारणाओं पर सवाल उठाये गए जो पिछले ब्लॉग का आधार थीं. ऐसी प्रतिक्रियाएं दूसरों से आगे इस मायने में भी निकल जाती है क्योंकि इनसे आगे की विचारयात्रा का रास्ता खुलता है.
पिछले ब्लॉग पर आई प्रतिक्रियाओं को अगले कुछ लेखों में उठाने की कोशिश करूँगा.
एक दोस्त ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि यदि किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय ही उसकी शारीरिक और मानसिक संरचना/क्षमता तय हो जाती है साथ ही उसकी फिजिकल एनर्जी को तय करने वाले अधिकतर मानक निर्धारित हो जाते हैं तो यह भी साबित होता है कि उस व्यक्ति विशेष के मित्र/शत्रु और विभिन्न परिस्थितियों में उसकी प्रतिक्रिया और साथ ही उसके जीवन के अधिकांश पहलू भी लगभग पूर्वनिर्धारित होते हैं. तो क्या एक साधारण व्यक्ति अपनी पूरी जिन्दगी को अपने जन्म के समय हुई घटनाओं की प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं जीता? क्या इस का अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सब पूर्व निर्धारित है और इंसान केवल खिलौना मात्र है जिसके पास किसी भी प्रकार के बदलाव का कोई रास्ता नहीं है?
नहीं. जैसा कि मैंने पिछले ब्लॉग में लिखा था कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में होने वाले हार्मोनल स्त्राव से इस बात का निर्धारण होता है कि वह किस परिस्थिति में किस प्रकार से प्रतिक्रिया देगा? लेकिन साथ ही इस सिद्धांत की तह में जाने पर हम कह सकते हैं कि यदि हम हार्मोनल स्त्राव को नियंत्रित कर सकें तो प्रतिक्रिया बदली जा सकती है और प्रतिक्रिया बदलने पर बाकी बदलाव अवश्यम्भावी हैं क्योंकि इंसानी जीवन केवल क्रिया-प्रतिक्रिया का खेल मात्र है.
हार्मोनल स्त्राव को समझने के लिए दिमाग के काम करने के तंत्र को समझना जरूरी है. इंसानी दिमाग पूरे समय (सोते समय भी) शरीर से लगातार संकेत प्राप्त करता है और उसी के आधार पर शरीर को दिशा-निर्देश देता है. इन्ही दिशा निर्देशों से हमारे क्रियाकलाप/मनःस्थिति(साधारण शब्दों में इसे मूड कह सकते हैं) तय होते हैं.

उदाहरण के तौर पर मान लीजिये कि कोई व्यक्ति मैदान में दौड़ रहा है और दौड़ते दौड़ते वह पूरी तरह थक चुका है. अब वह जॉगिंग ख़त्म करके घर जाने की तैयारी में है. अगर आप उस से एक किलोमीटर और दौड़ने को कहेंगे तो क्या वह मानेगा? नहीं. क्योंकि उसका शरीर दिमाग को अपने थकने का सिग्नल भेज चुका है इसलिए दिमाग और दौड़ने से इनकार कर देगा. लेकिन यदि उसी मैदान में एक पागल कुत्ता आ जाए जो उस व्यक्ति को काटने के लिए उसकी ओर बढ़ रहा हो तब क्या वह व्यक्ति अपने बचाव के लिए भागेगा? हाँ, और शायद पहले से भी अधिक तेज. आखिर ऐसा क्या बदला? कौन कौन सी शारीरिक क्रियाएं इस बीच हुई है? शरीर ने दिमाग को अपने खतरे में होने का सिग्नल भेजा. दिमाग ने भी बदले में त्वरित कार्रवाई करते हुए ऐसे हार्मोन्स का स्त्राव बढ़ा दिया जिनसे वह व्यक्ति उत्तेजित हो और भाग सके. यह शरीर द्वारा अपने बचाव की साधारण प्रोटोकॉल है.
इसी तरह शरीर लगातार दिमाग को शरीर में मौजूद शुगर की मात्रा के बारे में संकेत देता है. जैसे ही शुगर एक निर्धारित स्तर से कम होने लगती है दिमाग का एक हिस्सा सक्रिय होता है और कुछ ख़ास तरह के हार्मोन्स का स्त्राव शरीर में शुरू हो जाता है जिनसे हमें भूख का एहसास होता है. हम भूख लगने का एहसास होने पर कुछ खाते हैं और शुगर लेवल सामान्य हो जाता है. यहाँ यह बता देना जरूरी है की शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका होती है जिसे चालू रखने के लिए शुगर एनर्जी का सबसे पहला स्त्रोत है.
अब प्रक्रिया को थोडा बदलकर देखें. अगर किसी तरह दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल में शुगर लेवल अधिक होने की जानकारी हो तो क्या दिमाग ऐसे हार्मोन्स का स्त्राव होने देगा जिनसे हमें भूख का एहसास होता है? नहीं. यानी अगर दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल बदले जा सकते हैं तो किसी भी इंसान की भावनाएं भी बदली जा सकती हैं. दरअसल इंसानी शरीर विभिन्न परिस्थितियों में एक ख़ास पैटर्न में बर्ताव करता है. जैसे उदास होने पर व्यक्ति धीरे धीरे चलेगा, कंधे झुके होंगे, सांस भी वह धीरे धीरे लेगा जबकि उत्तेजित/खुश होने पर उसकी चाल तेज होगी, कंधे और हाथ खुले होंगे, सांस भी तेज होगी.


तो क्या यह संभव है कि दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल्स बदले जा सकें? बिलकुल. अगर आप शारीरिक प्रक्रिया में बदलाव कर सकते हैं तो दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल स्वयं बदल जाते हैं. उदाहरण के लिए मान लीजिये आप गुस्से में हैं ऐसे में सबकी सलाह होती है सांस धीरे धीरे लेना जिससे उत्तेजना कम हो जाए. यह केवल दिमाग को धोखा देने का ही एक रूप है. शरीर धीरे धीरे सांस लेगा जिससे दिमाग यह सिग्नल प्राप्त करेगा कि कोई खतरा नहीं है, सब ठीक है और वह शरीर को साधारण अवस्था में रखने वाले ह्र्मोंस का स्त्राव चालू रखेगा और आपकी उत्तेजना कम हो जायगी. जबकि विपरीत परिस्थिति में गुस्से और शारीरिक गति को बढाने वाले हार्मोन्स का स्त्राव होगा.
इसी तरह अगर कोई व्यक्ति उदास है तो वह अचानक अपनी चाल ढाल बदल दे (तेज चलना, ऊंचे कंधे, खुले हाथ, लगभग नाचने जैसी स्थिति) तो अचानक से उस व्यक्ति का मूड ठीक हो जाएगा. यह कोई टोटका नहीं केवल साधारण विज्ञान है. शरीर की क्रियाओं में बदलाव के साथ मानसिक स्थिति में बदलाव संभव है. तो अगली बार जब मन उदास हो थोडा नाचकर देखिये.
(पुनश्च:- बहुत से साथियों ने पिछले लेख पर  और बहुत सी प्रतिक्रियाएं दी थीं जिन पर इस ब्लॉग में बात नहीं रख पाया, उम्मीद है इसके लिए माफ़ी मिलेगी. पिछले लेख पर प्रतिक्रिया देने के लिए ख़ास तौर पर डा. राकेश पारिख, अनुज शर्मा, मिलन गुप्ता, ज्योति बुडाकोटी का खास तौर पर धन्यवाद. आप सभी का सहयोग आगे भी अपेक्षित होगा. खास तौर पर अनुज भाई, आपने जो बातें कही थी उन पर आगे लिखने की कोशिश रहेगी. इस बार माफ़ी.)

आपकी प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा.

Tuesday, 9 December 2014

कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है?

उम्मीद है सीए/इंजीनयर/डॉक्टर/लेखक/अध्यापक/साधारण व्यक्ति होने के नाते आपको मेडिकल साइंसअध्यात्ममनोविज्ञानफिजिक्स और केमिस्ट्री की अच्छी जानकारी जरूर होगी. (just kidding)

बात मेडिकल साइंस की करें तो सर्वविदित है कि शरीर में पैदा होने वाले सभी भाव,विचाररोग शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल स्त्राव से नियंत्रित होते हैं. हर व्यक्ति का व्यवहार उसके शरीर के अंदर के हार्मोन्स पर निर्भर करता है जिसे बाबा राजकुमार हिरानी जी ने केमिकल लोचा कहकर परिभाषित किया है (मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. अध्याय दूसरा श्लोक तीसरा). इस तरह इंसानी स्वभाव को समझते-समझते मेडिकल साइंसफिजिक्स और केमेस्ट्री में बदल जाती है क्योंकि जिस हार्मोन से इंसान का स्वभाव और व्यवहार नियंत्रित हो रहा है वह कम से कम दो रसायनों की एक निर्धारित वातावरण में तय नियमों के तहत हुई अन्तरक्रिया का उपोत्पाद है. इसका मतलब अगर हमारा नियंत्रण रसायनों और परिस्थितियों पर हो तो अधिकतर परिस्थितियों में इंसानी स्वभाव को नियंत्रित करना संभव है. लेकिन यह बात कहनी जितनी आसान है करनी उतनी ही मुश्किल है और यहीं से मेडिकल साइंस आध्यात्म और कॉस्मिक/प्लूटोनिक एनर्जी के सामने घुटने टेकती नजर आती है.

ज्योतिष/आध्यात्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय विभिन्न ग्रहों की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभावउसकी शारीरिक एवं मानसिक संरचना और क्षमता पर पड़ता हैइसी आधार पर कुंडली बनाई जाती है. (कुंडली विज्ञान कितना सही इस पर एक अलग बहस हो सकती है लेकिन आप चाहे तो विभिन्न क्षेत्रों में विख्यात/कुख्यात व्यक्तियों की कुंडली देख सकते हैं जो उनके कार्यक्षेत्र और उनकी प्रतिभा के आधार पर लगभग एक सी ही दिखाई देंगी,आप चाहें तो इसे भी संयोग मात्र कहकर ख़ारिज कर सकते हैं)



यानी व्यक्ति के विभिन्न परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने का क्रम उसके जन्म के समय से ही तय हो जाता है. इस तरह देखा जाए तो व्यक्ति के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाएँ पूर्व-निर्धारित होती हैं अर्थात व्यक्ति का स्वभावविचारप्रतिक्रियाएं उसके नियंत्रण से लगभग बाहर होती हैं. अगर यह सब पूर्व नियंत्रित है तो किसी व्यक्ति की मित्रताशत्रुता किन और कैसे लोगों से होगी यह भी एक साधारण व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर की चीज है. इस सारे घटनाक्रम में एक शक्ति काम करती है जिसे हम साधारण भाषा में फिजिकल एनर्जी कह सकते हैं. दो एक सी फिजिकल एनर्जी के लोग एक दुसरे को अधिक पसंद करते हैं और विपरीत एनर्जी के कम. यह बात साधु संतों से लेकर तथाकथित अंडरवर्ल्ड के लोगों पर समान रूप से लागू होती है.

अब शायद यह समझना आसान होगा कि क्यों कोई व्यक्ति हमे अचानक बिना किसी कारण अच्छा या बुरा लगता है. क्यों कोई हमे बिना कारण पसंद करता है तो कोई बिना कारण हमसे नाराज हो सकता है. निश्चित रूप से बाहरी परिस्थितियों का भी एक हद तक इसमें योगदान रहता है परंतु यह किसी भी रासायनिक क्रिया में एक उत्प्रेरक की सीमा से अधिक नहीं बढ़ पाता क्योंकि सामान परिस्थितियों में दो अलग अलग व्यक्तियों को अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है.

अगला सवाल यह आता है कि क्या यह फिजिकल एनर्जी तभी काम करती है जब दो व्यक्ति एक दूसरे के आमने सामने एक निश्चित दूरी पर होंइसका जवाब आज के तकनीकी दौर में और भी आसान हो जाता है, जब हम किसी से फोन पर बात करते हैं या किसी का फेसबुक/ट्विटर प्रोफाइल देखते हैं क्या हम अचानक किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित या विकर्षित महसूस नहीं करते?



हाँ, और यह स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की फिजिकल एनर्जी से उसकी आवाज भी प्रभावित होती है इसीलिए केवल फोन पर बात करने भर से पसंदगी या नपसन्दगी का एक भाव आ जाता है. यही बात सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भी लागू होती है जहाँ हर व्यक्ति अपनी रूचि और आदतों के अनुसार ही अपना प्रोफाइल बनाता है और हम अपनी रुचियों के आधार पर उसे पसंद या नापंसंद करते हैं. इस पूरी क्रिया में फिजिकल एनर्जी का अपना महत्त्व है.

क्या इस नियम का कोई अपवाद नहींऐसा नहीं है. हर नियम/अवधारणा की तरह इसके भी अपवाद हैं और अन्य नियमों के मुकाबले इसके अपवाद ढूँढने आसान हैं क्योंकि इसके अपवाद केवल मानव की दृढ इच्छाशक्ति और उसकी निरंतरता के आधार पर बनते हैं. बहुत से लोगों को आपने देखा होगा जो खुद को पूरी तरह बदलने में कामयाब रहे हैं. यह मुमकिन है. बस जरूरत अंदर उठते भावों के विपरीत क्रिया करने की है जिसके लिए दृढ इच्छाशक्ति की जरूरत है और लगातार अभ्यास से इसे स्थायी आदत बनाना मुमकिन भी है. भारतीय समाज में संयुक्त परिवारों की सफलता या असफलता इसी अपवाद की सफलता पर निर्भर करती है जहाँ स्व-रूचि को तिलांजलि देते हुए परिवार के हित में अपने मनोभावों की अनदेखी करनी पड़ती है.
इसका एक और उदाहरण आप किसी बच्चे और बड़े से बात करते हुए भी देख सकते हैं. बच्चे की बातचीत में उसके भाव साफ़ चमकते हैं. स्कूल का काम पूरा करने की बात हो या खेलने की बच्चा अपनी भावनाओं के आधार पर ही जवाब देता है'पढ़ने का मन नहीं है' 'अभी थोडा और खेलने का मन है' (यक़ीनन जवाब इसके उलट भी हो सकता है पर भावनाएं उसमे भी शामिल होंगी) जबकि वयस्क व्यक्ति से बात करते हुए 'काम करने का मन हैबजाय आपके द्वारा 'आज यह काम करना पड़ेगासुनने की सम्भावना अधिक है. दोनों वाक्यों में फर्क इच्छा और बाध्यता का है. वयस्कता के साथ स्वेच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता मौजूदा सामजिक ताने बाने में किसी भी व्यक्ति को घेर लेती है. इसे एक शायर ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया है

जैसे जैसे हम बड़े होते गए,
झूठ कहने में खरे होते गए.

भावनाओं से बाध्यता की यह यात्रा ही आज के तथाकथित रूप से सफल व्यक्तियों की अंदरूनी बेचैनी का रहस्य है. स्व का रूपांतरण किये बिना अपने क्रियाकलापों को बदलना किसी भी व्यक्ति को कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक स्तर पर द्विविभाजित कर जाता है. इस समस्या के एक हद से अधिक बढ़ जाने पर यह स्प्लिट-पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जाता है जो लगभग पागलपन की स्थिति है लेकिन एक सीमा तक यह स्प्लिट पर्सनैलिटी डिसऑडर पूरे समाज में देखा जा सकता है.



कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अगर हर व्यक्ति को अपने मन के भावों के आधार पर कृत्य करने की छूट मिल जाए तो यह समाज में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो जायेगी. मैं उनसे सहमत हूँ और समाज में अराजकता का विरोधी भी हूँ लेकिन मौजूदा समय में सामाजिक/आर्थिक रूप से सफल होने का दबाव एक सीमा से अधिक है और यही अधिकतर युवाओं के उनके केंद्र से विचलित होने का कारण है. आने वाले समाय में इसके दुष्परिणामों को बढ़ते मानसिक रोगियों और शारीरिक रूप से कमजोर समाज के रूप में देखा जा सकता है.(यक़ीनन हम भी अपने पूर्वजों के मुकाबले शरीरिक रूप से दुर्बल हैं.)

तो ऐसे में रास्ता क्या हैक्या अपनी स्वाभाविक आदतों के विपरीत व्यवहार करने के मानसिक दबाव में जीता समाज स्वयं से किसी स्तर पर जुड़ाव भी महसूस कर सकता है? क्या कोई तरीका है जिस से दोहरे मानसिक स्तर पर जीने की बाध्यता में भी कोई साधारण इंसान अपने अंदर कहीं गहरे में शांति महसूस कर सकता हैक्या सामजिक बंधनों के इस मायाजाल से मुक्ति का कोई रास्ता है?



इस विषय पर बाकी चर्चा अगले लेख में.......
आपके सवाल और विचार आमंत्रित हैं. यह आगे की विचार यात्रा को दिशा देने में सहायक होंगे.......