Tuesday, 9 December 2014

कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है?

उम्मीद है सीए/इंजीनयर/डॉक्टर/लेखक/अध्यापक/साधारण व्यक्ति होने के नाते आपको मेडिकल साइंसअध्यात्ममनोविज्ञानफिजिक्स और केमिस्ट्री की अच्छी जानकारी जरूर होगी. (just kidding)

बात मेडिकल साइंस की करें तो सर्वविदित है कि शरीर में पैदा होने वाले सभी भाव,विचाररोग शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल स्त्राव से नियंत्रित होते हैं. हर व्यक्ति का व्यवहार उसके शरीर के अंदर के हार्मोन्स पर निर्भर करता है जिसे बाबा राजकुमार हिरानी जी ने केमिकल लोचा कहकर परिभाषित किया है (मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. अध्याय दूसरा श्लोक तीसरा). इस तरह इंसानी स्वभाव को समझते-समझते मेडिकल साइंसफिजिक्स और केमेस्ट्री में बदल जाती है क्योंकि जिस हार्मोन से इंसान का स्वभाव और व्यवहार नियंत्रित हो रहा है वह कम से कम दो रसायनों की एक निर्धारित वातावरण में तय नियमों के तहत हुई अन्तरक्रिया का उपोत्पाद है. इसका मतलब अगर हमारा नियंत्रण रसायनों और परिस्थितियों पर हो तो अधिकतर परिस्थितियों में इंसानी स्वभाव को नियंत्रित करना संभव है. लेकिन यह बात कहनी जितनी आसान है करनी उतनी ही मुश्किल है और यहीं से मेडिकल साइंस आध्यात्म और कॉस्मिक/प्लूटोनिक एनर्जी के सामने घुटने टेकती नजर आती है.

ज्योतिष/आध्यात्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय विभिन्न ग्रहों की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभावउसकी शारीरिक एवं मानसिक संरचना और क्षमता पर पड़ता हैइसी आधार पर कुंडली बनाई जाती है. (कुंडली विज्ञान कितना सही इस पर एक अलग बहस हो सकती है लेकिन आप चाहे तो विभिन्न क्षेत्रों में विख्यात/कुख्यात व्यक्तियों की कुंडली देख सकते हैं जो उनके कार्यक्षेत्र और उनकी प्रतिभा के आधार पर लगभग एक सी ही दिखाई देंगी,आप चाहें तो इसे भी संयोग मात्र कहकर ख़ारिज कर सकते हैं)



यानी व्यक्ति के विभिन्न परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने का क्रम उसके जन्म के समय से ही तय हो जाता है. इस तरह देखा जाए तो व्यक्ति के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाएँ पूर्व-निर्धारित होती हैं अर्थात व्यक्ति का स्वभावविचारप्रतिक्रियाएं उसके नियंत्रण से लगभग बाहर होती हैं. अगर यह सब पूर्व नियंत्रित है तो किसी व्यक्ति की मित्रताशत्रुता किन और कैसे लोगों से होगी यह भी एक साधारण व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर की चीज है. इस सारे घटनाक्रम में एक शक्ति काम करती है जिसे हम साधारण भाषा में फिजिकल एनर्जी कह सकते हैं. दो एक सी फिजिकल एनर्जी के लोग एक दुसरे को अधिक पसंद करते हैं और विपरीत एनर्जी के कम. यह बात साधु संतों से लेकर तथाकथित अंडरवर्ल्ड के लोगों पर समान रूप से लागू होती है.

अब शायद यह समझना आसान होगा कि क्यों कोई व्यक्ति हमे अचानक बिना किसी कारण अच्छा या बुरा लगता है. क्यों कोई हमे बिना कारण पसंद करता है तो कोई बिना कारण हमसे नाराज हो सकता है. निश्चित रूप से बाहरी परिस्थितियों का भी एक हद तक इसमें योगदान रहता है परंतु यह किसी भी रासायनिक क्रिया में एक उत्प्रेरक की सीमा से अधिक नहीं बढ़ पाता क्योंकि सामान परिस्थितियों में दो अलग अलग व्यक्तियों को अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है.

अगला सवाल यह आता है कि क्या यह फिजिकल एनर्जी तभी काम करती है जब दो व्यक्ति एक दूसरे के आमने सामने एक निश्चित दूरी पर होंइसका जवाब आज के तकनीकी दौर में और भी आसान हो जाता है, जब हम किसी से फोन पर बात करते हैं या किसी का फेसबुक/ट्विटर प्रोफाइल देखते हैं क्या हम अचानक किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित या विकर्षित महसूस नहीं करते?



हाँ, और यह स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की फिजिकल एनर्जी से उसकी आवाज भी प्रभावित होती है इसीलिए केवल फोन पर बात करने भर से पसंदगी या नपसन्दगी का एक भाव आ जाता है. यही बात सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भी लागू होती है जहाँ हर व्यक्ति अपनी रूचि और आदतों के अनुसार ही अपना प्रोफाइल बनाता है और हम अपनी रुचियों के आधार पर उसे पसंद या नापंसंद करते हैं. इस पूरी क्रिया में फिजिकल एनर्जी का अपना महत्त्व है.

क्या इस नियम का कोई अपवाद नहींऐसा नहीं है. हर नियम/अवधारणा की तरह इसके भी अपवाद हैं और अन्य नियमों के मुकाबले इसके अपवाद ढूँढने आसान हैं क्योंकि इसके अपवाद केवल मानव की दृढ इच्छाशक्ति और उसकी निरंतरता के आधार पर बनते हैं. बहुत से लोगों को आपने देखा होगा जो खुद को पूरी तरह बदलने में कामयाब रहे हैं. यह मुमकिन है. बस जरूरत अंदर उठते भावों के विपरीत क्रिया करने की है जिसके लिए दृढ इच्छाशक्ति की जरूरत है और लगातार अभ्यास से इसे स्थायी आदत बनाना मुमकिन भी है. भारतीय समाज में संयुक्त परिवारों की सफलता या असफलता इसी अपवाद की सफलता पर निर्भर करती है जहाँ स्व-रूचि को तिलांजलि देते हुए परिवार के हित में अपने मनोभावों की अनदेखी करनी पड़ती है.
इसका एक और उदाहरण आप किसी बच्चे और बड़े से बात करते हुए भी देख सकते हैं. बच्चे की बातचीत में उसके भाव साफ़ चमकते हैं. स्कूल का काम पूरा करने की बात हो या खेलने की बच्चा अपनी भावनाओं के आधार पर ही जवाब देता है'पढ़ने का मन नहीं है' 'अभी थोडा और खेलने का मन है' (यक़ीनन जवाब इसके उलट भी हो सकता है पर भावनाएं उसमे भी शामिल होंगी) जबकि वयस्क व्यक्ति से बात करते हुए 'काम करने का मन हैबजाय आपके द्वारा 'आज यह काम करना पड़ेगासुनने की सम्भावना अधिक है. दोनों वाक्यों में फर्क इच्छा और बाध्यता का है. वयस्कता के साथ स्वेच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता मौजूदा सामजिक ताने बाने में किसी भी व्यक्ति को घेर लेती है. इसे एक शायर ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया है

जैसे जैसे हम बड़े होते गए,
झूठ कहने में खरे होते गए.

भावनाओं से बाध्यता की यह यात्रा ही आज के तथाकथित रूप से सफल व्यक्तियों की अंदरूनी बेचैनी का रहस्य है. स्व का रूपांतरण किये बिना अपने क्रियाकलापों को बदलना किसी भी व्यक्ति को कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक स्तर पर द्विविभाजित कर जाता है. इस समस्या के एक हद से अधिक बढ़ जाने पर यह स्प्लिट-पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जाता है जो लगभग पागलपन की स्थिति है लेकिन एक सीमा तक यह स्प्लिट पर्सनैलिटी डिसऑडर पूरे समाज में देखा जा सकता है.



कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अगर हर व्यक्ति को अपने मन के भावों के आधार पर कृत्य करने की छूट मिल जाए तो यह समाज में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो जायेगी. मैं उनसे सहमत हूँ और समाज में अराजकता का विरोधी भी हूँ लेकिन मौजूदा समय में सामाजिक/आर्थिक रूप से सफल होने का दबाव एक सीमा से अधिक है और यही अधिकतर युवाओं के उनके केंद्र से विचलित होने का कारण है. आने वाले समाय में इसके दुष्परिणामों को बढ़ते मानसिक रोगियों और शारीरिक रूप से कमजोर समाज के रूप में देखा जा सकता है.(यक़ीनन हम भी अपने पूर्वजों के मुकाबले शरीरिक रूप से दुर्बल हैं.)

तो ऐसे में रास्ता क्या हैक्या अपनी स्वाभाविक आदतों के विपरीत व्यवहार करने के मानसिक दबाव में जीता समाज स्वयं से किसी स्तर पर जुड़ाव भी महसूस कर सकता है? क्या कोई तरीका है जिस से दोहरे मानसिक स्तर पर जीने की बाध्यता में भी कोई साधारण इंसान अपने अंदर कहीं गहरे में शांति महसूस कर सकता हैक्या सामजिक बंधनों के इस मायाजाल से मुक्ति का कोई रास्ता है?



इस विषय पर बाकी चर्चा अगले लेख में.......
आपके सवाल और विचार आमंत्रित हैं. यह आगे की विचार यात्रा को दिशा देने में सहायक होंगे....... 


Tuesday, 7 October 2014

आखिर हम चाहते क्या हैं? गंगा या जमुना?

हरिद्वार गंगा किनारे बैठा हूँ, जलस्तर इतना ही है कि नहाने का अरमान पाले आये भक्त केवल पैर धोकर वापस चले जाएँ क्योंकि पानी घुटनों से ऊपर जाने को तैयार नहीं। जल का आवरण उतरा तो गंगा के अन्दर श्रद्धा के नाम पर जमा किया हुआ कूड़ा साफ़ दिख रहा है। जगह जगह पोलिथिन, थर्मोकोल के प्लेट और कप, कपडे, फूल, दीपक और पूजा सामग्री बिखरी पड़ी है। पानी में गन्दगी का मंजर इतना भयानक है कि वही श्रद्धालु नहाने की औपचारिकता निभा रहे हैं जो कम से कम 200 किमी दूर से आये हैं।
हर की पौड़ी से करीब 100 मीटर दूरी पर (गंगा के किनारे ही) मल त्याग करने एक महानुभाव से सामना होता है, शर्म के मारे पूछ नहीं पाता कि इतनी श्रद्धा कहाँ से लाते हो भाई! शायद  सवाल इसलिए भी नहीं पूछ पाता क्योंकि जानता हूँ कि इसी शहर के 150 से अधिक नाले इसी गंगा में पड़ते हैं और कई समाजसेवक इन नालों को बंद करने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक से जीत चुके हैं पर प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना लगातार कर रहा है। जब जनता की चुनी सरकार और पढ़े लिखे लोगों से भरा प्रशासन इसी गंगा में रोज हजारों टन मल बहा देता है तो इस व्यक्ति को किस मुंह से रोकूँ?
गंगा घाट पर गंगा सभा के कार्यकर्ता आर्थिक मदद मांगते दिखाई देते हैं तो उनसे पूछता हूँ कि आखिर इस घाट की सफाई क्यों नहीं हुई? जवाब मिलता है "केवल गंगा सभा क्या करेगी भाई साब? पिछले पांच दिन से सभी जगह छुट्टियाँ थी तो लोग छुट्टियाँ मनाने यहाँ आये और नजारा आपके सामने है। जगह जगह गन्दगी फैला कर लोग तो चले गए हमें इसे समेटने में कम से कम एक हफ्ता लगेगा।" तो गंगा अब पिकनिक स्पॉट है? यह जानकारी नई है। कुछ दूर बियर की खाली पड़ी बोतलें इस नई जानकारी को और पुख्ता करती हैं।
इतने में आवाज आती है 'कान की सफाई करा लो, कान की सफाई'।
मेरे पास बैठे सज्जन पूछते हैं-'कितने में?'
'बीस रुपये में'
'बीस रुपये तो बहुत ज्यादा है भाई!'
'गंगा पर आये हो साहब, सब गन्दगी साफ़ करके जाओ, दोबारा जाने कब आओ। करवा लो, पंद्रह में कर दूंगा'
भाई साहब मान जाते हैं और गंगा मैया को अपनी गन्दगी दान करने के लिए बैठ जाते हैं।
पिकनिक और गन्दगी छोड़कर जाना, जैसे यही गंगा की उपयोगिता है। गंगा की सफाई को लेकर वोट कर सकते हैं, जिम्मेदारी लेना अपने बस की बात नहीं।
आदतन सोचते सोचते राजनीति की ओर निकल जाता हूँ, ऐसे देश में स्वच्छ भारत की बात करने वाले प्रधानमंत्री महाशय पागल तो नहीं? वो भी तब जब वे इसमें जनता की भागीदारी को अहम् मान रहे हों। क्या वाकई यह मुमकिन है? अमेरिका, जापान, स्विट्जरलैंड आदि मुल्कों को उनकी सफाई के लिए पसंद करने वाले हम क्या अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार है? शायद नहीं।
दूसरी ओर वे लोग हैं जो जगह जगह की गन्दगी की तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर शेयर करके प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करने लगते हैं। रवैया कुछ ऐसा होता है जैसे प्रधानमंत्री ने इस अभियान की शुरुआत नहीं बल्कि समाप्ति की घोषणा की हो और इसमें शामिल हथियार (झाड़ू) का आविष्कार उन्होंने ही किया हो। यही लोग जनता को इस सफाई अभियान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कहने से डरते हैं, क्योंकि यह उनके राजनैतिक हितों के लिए  ठीक नहीं। खैर! दिल तो यही कहता है कि देश में सफाई के साहसिक अभियान की शुरुआत करने वाला यह व्यक्ति नाकामयाब न  हो और हम अपनी कुछ जिम्मेदारी निभा पायें।
दूर कहीं भजन चल रहा है 'गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे, मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे।' सवाल अचानक आता है कि गंगा के पानी से सजना की जिंदगानी को जोड़ने वाला आम व्यक्ति क्या वाकई सजना की अकाल मृत्यु के लिए इतना उतावला है? तभी उम्मीद की एक किरण एक बच्चे के रूप में सामने आ जाती है जो घुटनों घुटनों पानी तक नहाते हुए अचानक ठिठक जाता है जब उसके सामने शिव की गत्ते की प्रतिमा तैरते हुए आ जाती है जो शायद किसी भक्त ने गंगा के हवाले की होगी। लड़का तस्वीर को किनारे पर लाकर अपनी माँ को पकड़ाता है और कहता है 'लोग गंगा को भी यमुना समझ लेते हैं।'
भविष्य हमारे अपने हाथ में है, हमें एक और यमुना चाहिए या हम अभी भी गंगा को गंगा बनाये रखने को तत्पर हैं।

Wednesday, 27 August 2014

दंगे वहीँ क्यों होते हैं जहाँ......


जब इस लेख को लिखने बैठा तो लगा इसे दो तरह से लिखा जा सकता है "दंगे वहीँ क्यों होते हैं जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक होती है" और "दंगे वहीँ क्यों होते हैं जहाँ राजनीति अधिक और पत्रकारिता कम होती है". पहले तरीके से लिखने बैठता हूँ तो तमाम वे जगह याद आ जाती हैं जहाँ वाकई मुस्लिम आबादी अधिक थी और दंगे हुए. दूसरे तरीके से लिखने बैठूं तो तमाम वे कारण याद आते हैं जिनके कारण इन सब जगहों पर दंगे हुए. ताजा उदाहरण के तौर पर सहारनपुर को लें तो तस्वीर साफ़ भी होने लगती है और भविष्य धुंधला भी नजर आता है. सहारनपुर दंगा पूरी तरह से एक विवादित जमीन पर कोर्ट का फैसला एक समुदाय के हक़ में आने के बाद एक दलाल (माफ़ कीजिये कोई और बेहतर शब्द नहीं मिला) को दलाली न मिल पाने के बाद पूरे मामले को धार्मिक रंग दिए जाने की उसकी सफलता और स्थिति को न समझ पाने और न ही नियंत्रण में कर पाने की प्रशासन की नाकामी की दास्तान है. दंगों के बारे में यह समझ लेना जरुरी है कि दंगे 'होते' नहीं 'करवाए' जाते हैं. इन्हें कराने वालों के कुछ उद्देश्य होते हैं जो सामान्यतया आर्थिक, राजनीतिक और चुनावी जरूरतों से जुड़े होते हैं. इसीलिए कभी कभी सामान्य स्थानीय विवाद भी इतना भयावह रूप ले लेते हैं.
क्या था सहारनपुर दंगे के पीछे का सच?
मामला केवल एक विवादित जमीन (माप 329 वर्ग मीटर) को लेकर सिख और मुस्लिम समुदाय के बीच कोर्ट में चलते विवाद का था. जहाँ एक ओर मुस्लिम समुदाय का कहना था कि 1947 से पहले इस भूमि पर मस्जिद थी जिसे ढा दिया गया और उसके बाद इस पर गुरुद्वारे की इमारत बननी शुरू हुई, वहीँ दूसरी ओर सिख समुदाय इस जमीन के 1922 से लेकर अब तक के दस्तावेजों के आधार पर कह रहा था कि इस जमीन को मकान के तौर पर तीन बार बेचा जा चुका है और यहाँ किसी मस्जिद का कोई उल्लेख नहीं है. इस जमीन की सिख समुदाय ने बाकायदा रजिस्ट्री करवा कर प्रशासन से गुरुद्वारा बनाने की अनुमति लेने के बाद ही गुरुद्वारा बनाया गया. कोर्ट ने सिख समुदाय के तर्कों को सही माना और सिख समुदाय के पक्ष में फैसला दिया. कोर्ट द्वारा दी गई अवधि में मुस्लिम समुदाय की ओर से भी इस फैसले को चुनौती नहीं दी गई. इसके बाद दंगों के मास्टरमाइंड मुहर्रम अली उर्फ़ पप्पू के दबाव के कारण गुरुद्वारा सिंह सभा द्वारा लम्बे समय तक निर्माण कार्य को रोके रखा गया. परदे के पीछे हुई वार्ताओं में पप्पू अली को 7 लाख रुपये चुप रहने के एवज में देने का वादा हुआ, जिसमे से तीन लाख दे दिए गए. इसके बाद गत 21 जुलाई को जब सिंह सभा ने निर्माण शुरू किया तो पप्पू को बाकी 4 लाख का भुगतान भी कर दिया गया. यह कोर्ट में केस जीत चुके समुदाय की ओर से शहर में अमन और शान्ति बहाल रखने के लिए राजनैतिक गुंडे को दी गई फिरौती थी. 7 लाख मिलने के बाद पप्पू के मन में लालच आया और वह वादी अब्दुल वहाब को साथ लेकर 25 लाख की मांग करने लगा, तब गुरुद्वारा सिंह सभा ने 1 लाख और दिए. इतने पर भी पप्पू अली के शांत न होने पर गुरुद्वारा सिंह सभा ने सारी बात सहारनपुर के कुतुबशेर थाना इन्स्पेक्टर कुलदीप कुमार को बताकर मदद मांगी. कुलदीप कुमार ने पुलिसिया धौंस दिखाते हुए निर्माण कार्य रुकवा दिया और 2 लाख मिलने पर ही निर्माण कार्य चलने दिया. इसके बाद बाजी हाथ से निकलते देख पप्पू ने मामले को सांप्रदायिक रंग देते हुए पूरी प्लानिंग के साथ 25 जुलाई की रात गुरूद्वारे पर पथराव कराया और सिख समुदाय की दुकानों और मकानों को जलाया गया. इसके बाद ही दंगे का वह स्वरूप दिखाई दिया जिसे साम्प्रदयिक कहा जाता है.
सवाल यह है कि अगर मामला पूरी तरह अवैध वसूली का था तो दंगे को सांप्रदायिक होने देने का दोषी कौन है? बात उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की हो या भारत के किसी और प्रांत की, दोषी मुख्य रूप से तीन दिखाई देते हैं:- राजनेता, पीड़ित होने की ग्रंथि से ग्रस्त स्वयं मुस्लिम समुदाय और मीडिया.
उत्तर प्रदेश में ताजा दौर में ऐसी घटनाएं दो जगह हुई. पहला मुरादाबाद जिले का गाँव कांठ, जहाँ एक मंदिर से पुलिस द्वारा रमजान के दौरान लाउडस्पीकर उतारने के मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया और दूसरा सहारनपुर. दोनों जगहों के राजनैतिक समीकरणों को देखेंगे तो कुछ बातें एक सी दिखाई देंगी. दोनों जगह उपचुनाव होने वाले हैं. दोनों ही जगह का मतदाता पैटर्न ऐसा है कि मुस्लिम समुदाय के वोटों के ध्रुवीकरण से फैसला पलट सकता है. दोनों ही जगह मुस्लिम समुदाय सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के पाले में वोट देता आया है. ऐसे में सहारनपुर में दंगों के मास्टरमाइंड मुहर्रम अली पप्पू की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ खिंचवाई गई तस्वीरें बहुत कुछ बयां करती हैं. पप्पू को मिलने वाला राजनैतिक संरक्षण दंगों के बढ़ते जाने के पीछे की कहानी साफ़ करता है. कहने वाले यह भी कहते हैं कि अगर मामला इस तरह सामने न आता तो उस क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का विधायक उम्मीदवार पप्पू को बनना तय था. यहाँ पर उस सवाल का जवाब भी मिलता है कि दंगे वहीँ क्यों होते हैं जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है. ऐसी जगहों पर हुए दंगे राजनैतिक रूप से उन पार्टियों के हक़ में जाते हैं जो खुद को मुस्लिमों का रहनुमा साबित करने पर दिन रात एक करती हैं. "आप असुरक्षित हैं, आपको सुरक्षा चाहिए तो हमारी सरकार बनवाइए" का विज्ञापन मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण में काम आता है. अन्यथा कोई कारण नहीं कि दंगे उन्हीं क्षेत्रों में ज्यादा हैं जहाँ मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 25 से 40 प्रतिशत के बीच है. इन इलाकों में दंगों के बाद वोट की फसल का एक मुश्त कटना और एक झोली में गिरना दंगों का मुख्य कारण है. किसी भी दंगे के बाद दोषी को पहचानने में सस्ते जासूसी उपन्यासों में क़त्ल के बाद उठने वाले साधारण से सवाल से मदद मिल सकती है "इस क़त्ल से फायदा किसे है?"
एक राजनैतिक गुंडे के पीछे लगकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली भीड़ नासमझ और भोले लोगों का जमावड़ा नहीं हो सकती. हालांकि भीड़ के कृत्य के पीछे कोई सोची समझी साजिश है यह मानने वालों से भी मैं सहमत नहीं हूँ. अशिक्षा, बेरोजगारी, पीड़ित होने का एक हद तक झूठा भाव पप्पू जैसे शातिर दिमाग लोगों के लिए उपयुक्त अवसर पैदा करता है. इसके लिए जहाँ एक ओर सरकारें जिम्मेदार हैं जो मुस्लिम समुदाय को एक साजिश के तहत शिक्षा और जागरूकता से दूर रखती हैं. अन्यथा मदरसों को करोडो की सरकारी सहायता देने वाली सरकारें क्या मदरसों में उपयुक्त और एक सामान पाठ्यक्रम तक लागू नहीं करवा सकती जैसा कि अन्य विद्यालयों में हो रहा है. यह एक छोटा, शुरूआती मगर महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है जिससे वैचारिक रूप से अलग थलग पड़ा हुआ मुस्लिम समुदाय देश की बहुसंख्यक तबके के साथ एक धरातल पर आये. वैचारिक समानता कई समस्याओं का अंत हो सकती है. इस वैचारिक असमानता के लिए केंद्र, राज्य और अब तक की सभी सरकारें दोषी हैं, क्योंकि पिछले तीस साल में गठबंधन राजनीति के कारण लगभग हर पार्टी सत्ता का स्वाद चख चुकी है मगर यह केवल सत्ता का स्वाद चखने तक ही सीमित रहा, सुधार की कोई गुंजाइश अभी भी दिखाई नहीं देती. दूसरी ओर अशिक्षा, बेरोजगारी और वोट बैंक की राजनीति से निकलने के लिए कोई बड़ी कोशिश मुस्लिम समुदाय की ओर से दिखाई देती हो ऐसा भी नहीं है. मुस्लिम युवाओं को समझना होगा कि खुद को पीड़ित के तौर पर दिखाते रहने से कहीं बेहतर है कि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाए क्योंकि बेहतर भविष्य का सफ़र यहीं से शुरू होगा.
अंत में सबसे बड़े दोषी के तौर पर मीडिया सामने आता है जो 24 घंटे और सबसे पहले खबर देने के जोश में खबरों की जांच पड़ताल करने की बजाय केवल सनसनी पैदा करने वाले टीआरपी के लालची लोगों का समूह बनता जा रहा है. मीडिया का दोष इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह समाज के शक्तिसंपन्न, बुद्धिजीवी और तमाम बाजारू दबावों से परे खड़े लोगों का एक समूह है जिसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह हर बार यह समूह खुद लगाता है. सहारनपुर दंगे में भी यही हुआ. मीडिया ने मामले की असली पड़ताल करने की बजाय मुस्लिम समुदाय को पीड़ित के तौर पर दिखाना शुरू कर दिया. यही कई अन्य मामलों में भी दिखाई देता है जहाँ साधारण टकराव, बहस, अंतर्विरोध की घटना को सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है. क्या वाकई मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबर चलाने तक ही सीमित है या उस खबर के प्रभाव को देखना भी उसकी जिम्मेदारी होनी चाहिए? अगर वाकई केवल खबर चलाना ही मीडिया की जिम्मेदारी है तो ईद के दिन ईराक के आतंकवादी संगठन ISIS के समर्थन में कश्मीर में होने वाला प्रदर्शन या कुछ कट्टरपंथियों के दबाव में हिंदुओं की धार्मिक यात्रा पर कश्मीर सरकार के द्वारा लगने वाला प्रतिबन्ध भी खबर बन जाना चाहिए, ख़ास तौर पर इस तथ्य के प्रकाश में कि कश्मीर में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. मीडिया में रेगुलेटरी अथॉरिटी की जरूरत अब शिद्दत से महसूस की जा रही है. सेल्फ-रेगुलेटरी जैसे ढकोसले को मानने की कोई इच्छा आम दर्शकों और पाठकों में दिखाई नहीं देती. मीडिया से जुड़े लोगों को समझना होगा कि पत्रकारिता एक ऐसी कला है जिसमे वर्तमान की घटनाओं से अलग अलग रंगों को चुनते हुए भविष्य की बेहतरीन तस्वीर तैयार की जाती है. केवल हरे रंग से रंगे भविष्य के टुकड़े को कोई तस्वीर कह पायेगा इसमें मुझे शक है. एक समुदाय को पीड़ित के तौर पर दिखाना सनसनी तो पैदा करता है पत्रकारिता नहीं.

इन तमाम घटनाओं, व्याख्याओं-विश्लेषणों के बीच उस खतरे को भी समझना जरूरी है जो हमारे समाज को बाँट रहा है. राजनीति और मीडिया में व्याप्त तथाकथित सेकुलरवाद लगातार देश को साम्प्रदायिकता की ओर धकेल रहा है. सेकुलरिज्म और आहत भावनाओं की राजनीति के बीच यह भी समझना जरूरी है कि अति किसी भी भावना की बुरी होती है और यह छद्म-धर्मनिरपेक्षता कहीं उस बहुसंख्यक तबके को सांप्रदायिक न बना दे जो लगातार चोर न होते हुए भी चोर कहा जाता है. खतरा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पहले जो दंगे शहरों और नगरों की परिघटना माने जाते थे वहीँ अब ये गाँव तक भी अपनी पहुँच बनाने में कामयाब रहे हैं, जहाँ आपसी सौहार्द को तोडना अधिक मुश्किल होता है लेकिन एक बार टूटने पर कटुता लम्बे समय तक बनी रहती है, जो राजनीतिक रूप से अधिक फायदेमंद है. देश न भगवा से बनेगा और न हरे से. तिरंगे में दोनों रंगों का अपना महत्त्व है इसे समझना होगा अन्यथा जैसा कि शुरुआत में ही कहा जा चुका है कि भविष्य धुंधला नजर आता है क्योंकि कोई भी राजनैतिक, सामाजिक, व्यावसायिक (पढ़ें मीडिया) ताकत इसे रोकने में कोई दिलचस्पी लेती नहीं दिख रही.

(सिर्फ न्यूज में ७ अगस्त २०१४ को प्रकाशित)

Monday, 14 July 2014

असली हीरो कौन? अन्ना, अरविन्द, आर.एस.एस., भाजपा या नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी?

यह हमेशा से होता आया है कि किसी भी मशीन का सॉफ्टवेयर उसके हार्डवेयर को संचालित करता रहा है और सॉफ्टवेयर के दोषों से हार्डवेयर अपनी तमाम ताकत के बावजूद पार नहीं पा सका। इंसान में इंसानी दिमाग सॉफ्टवेयर की भूमिका में होता है। हम किसी भी घटना, व्यक्ति या प्रसंग का विश्लेषण अपनी मानवीय कमजोरियों के साथ ही करते हैं और अक्सर कमजोर विश्लेषण ही हमारे कमजोर भविष्य को जन्म देते हैं।
यह भारतीय लोकतंत्र के साथ भी होता रहा है। आज नरेन्द्र मोदी भाजपा के सर्वोच्च नेता और भारत के प्रधानमंत्री के रूप में हमारे सामने हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सफ़र में अहम् भूमिका निभाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। भारत का भविष्य मोदी सरकार, भाजपा और RSS के क्रियाकलापों पर निर्भर करता है। पर क्या यह पूरा सच है? क्या वाकई ये तीनों ही भारतीय लोकतंत्र के इस ऐतिहासिक जनादेश के नायक है? या कुछ और भी है जिसे इसका श्रेय जाना चाहिए लेकिन संकुचित दृष्टि से इतिहास लिखने के अभ्यस्त हम लोग ऐसा करने से डर रहे हैं? क्या यह डर इसलिए है कि वह व्यक्ति या वह दौर अभी गुजरा नहीं है और भविष्य अनिश्चित है, अगर हमने आज उसे श्रेय दिया तो कल वह बड़ा खतरा बनकर सामने न आ जाय?
याद कीजिये 2004 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद के लगभग 11 साल। एक ओर जहाँ यूपीए लगातार बेहतर 2009 तक बेहतर प्रदर्शन करती रही, वहीँ दूसरी और विपक्ष लगातार या तो मैदान से नदारद रहा या अपने ही पाले में गोल करता रहा। यह वही समय था जब छह साल सत्ता सुख भोग चुके भाजपा नेता सड़क से नाता तोड़ कर एसी कमरों में बैठे इस बात का इन्तजार कर रहे थे कि जनता एक दिन यूपीए से नाराज होगी और उनकी बारी आएगी। यहाँ तक कि 2009 के बाद जब यूपीए ने गलतियाँ करनी शुरू की तब भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा आपसी संघर्ष में ही उलझी रही, यक़ीनन जनता से कोई रिश्ता इस पार्टी का नहीं था और इस रिश्ते को बनाने की कोई कोशिश भी नहीं हो रही थी।
ऐसे में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस के सामने पहली मुश्किल 2011 की शुरुआत में आई थी जब रालेगनसिद्धि का एक बुजुर्ग दिल्ली के जंतर मंतर पर आकर सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठा था। मुद्दा था भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत कानून। न्यूज चैनल्स ने इसे खूब उछाला और चार दिन में ही मामले की गंभीरता को परखते हुए यूपीए सरकार ने कानून के लिए बनी ड्राफ्टिंग कमेटी में सिविल सोसायटी के पांच लोगों को रखा। यह एक शुरूआती और बड़ी जीत थी और इस जीत में किरण बेदी, स्वामी रामदेव, प्रशांत भूषण, स्वामी अग्निवेश इत्यादि सभी लोगों ने अपनी अपनी भूमिका निभाई मगर इस जीत का आर्किटेक्ट एक नौजवान आरटीआई कार्यकर्ता था जिसका नाम अरविन्द केजरीवाल था। अरविन्द की ताकत केवल तीन चीजें थी - जनता के बीच रहकर उनके जैसा बनकर सत्ता को ललकारना, अपने आन्दोलन से बड़े बड़े नामों को जोड़ते रहना और उनकी एक आन्दोलनकारी के रूप में फैसले लेने की अद्भुत क्षमता जिसके सामने सरकार नतमस्तक नजर आई।
इसके बाद भी विपक्ष सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने में नाकामयाब रहा जिसका बड़ा कारण लगभग सभी पार्टियों में व्याप्त भ्रष्टाचार था। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, डीएमके, एआईडीएमके, एनसीपी सभी पार्टियां इस हमाम में नंगी भी थी और साझेदार भी।
अप्रैल 2011 के बाद अगस्त 2011 में जब आन्दोलन हुआ तो अन्ना देश भर में जाना पहचाना नाम थे और जनाक्रोश भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ था। इस जनाक्रोश को अन्ना में अपना हीरो नजर आ रहा था, भाजपा में नहीं। उस दौर में जनता सड़क से कानून बनाने की कोशिश कर रही थी यह विपक्ष की नाकामी का नतीजा भी था और विपक्ष से जनता की नाउम्मीदी का सुबूत भी। सरकार ने यह कानून बनाने का भरोसा भी जनता को दिया और बाद में धोखा भी।
अन्ना आन्दोलन सफल रहा या असफल यह चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन यूपीए सरकार के खिलाफ जनता में गुस्सा भरने का काम इस आन्दोलन ने किया इसमें कोई शक नहीं। इस गुस्से की आग में घी का काम सरकार के मंत्रियों के लगातार उजागर होते घोटालों और उनके लगातार बढ़ते अहंकार ने किया। अन्ना आन्दोलन में कई बार टूट भी हुई और यह अपना रास्ता बदलकर पार्टी भी बन गया। अरविन्द यहाँ भी वही करते रहे जो उन्होंने अन्ना आन्दोलन में किया - जनता से जुड़ना (मिशन बुनियाद), नए नए लोगों को पार्टी से जोड़ना (योगेन्द्र यादव, मेधा पाटेकर और बहुत से बड़े नाम) और चौंकाने वाले निर्णय लेते रहना (केवल दिल्ली में चुनाव लड़ना, टोपी और झाड़ू को पार्टी की पहचान बनाना)।
2012 की शुरुआत में जब आम आदमी पार्टी ने पांच राज्यों में से केवल दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो देश जैसे दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ दिल्ली का माहौल दूसरी तरफ पूरे देश का। फिर भी इन दोनों में एक चीज समान थी जनता में कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टियों के खिलाफ लगातार बढ़ता गुस्सा और कांग्रेस के खिलाफ इस लड़ाई में भाजपा के प्रति अविश्वास। दिल्ली और पूरे देश के माहौल में अंतर यह था कि दिल्ली को विकल्प मिल गया था जबकि देश को अभी भी विकल्प की तलाश थी।
कांग्रेस के खिलाफ विकल्प बनना अरविन्द केजरीवाल के लिए आसान नहीं था इसके लिए उन्हें एक तरफ दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ बिजली पानी आन्दोलन करना पड़ा दूसरी तरफ इस लड़ाई को आम आदमी बनाम कांग्रेस बनाने के लिए उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाये और सुबूतों के साथ इनका खुलासा भी किया। 2012 के मध्य तक हालात यह थे कि एक ओर एक साल से भी कम पुरानी पार्टी जहाँ खुद को 120 साल पुराणी पार्टी का प्रतिद्वंदी साबित करने में कामयाब हो रही थी वहीँ देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता बिजली पानी के मुद्दों पर घडियाली आंसू बहा रहे थे। इसके बाद माहौल में बदलाव आना शुरू हुआ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वरदहस्त प्राप्त नरेन्द्र मोदी गुजरात मुख्यमंत्री के तौर पर आशाओं भरा रिपोर्ट कार्ड लेकर दिल्ली आये और गुटबाजी में फंसी भाजपा को आर.एस.एस. के डंडे के डर से नरेन्द्र मोदी के पीछे खड़ा होना पड़ा।
लेकिन तब भी दिल्ली के लोग अपना हीरो भाजपा के किसी नेता की बजाय अरविन्द केजरीवाल में देख रहे थे, इसे समझते हुए भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार विजय गोयल की जगह डा. हर्षवर्धन को बनाया और आम आदमी पार्टी की तर्ज पर हर विधानसभा सीट के लिए अलग घोषणा पत्र भी बनाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी अरविन्द केजरीवाल की पार्टी लगातार जनता और भाजपा दोनों को चौंकती रही। भाजपा हर बार चौंकने के बाद आम आदमी पार्टी की नक़ल करने की कोशिश करती तो आम जनता अरविन्द केजरीवाल के और करीब हो जाती। चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए भी चौंकाने वाले थे और शायद आम आदमी पार्टी के लिए भी। इसीलिए इसके बाद आम आदमी पार्टी के नेता जहाँ लगातार विवादों भरे फैसले लेते रहे वहीँ भाजपा नरेन्द्र मोदी के पीछे लामबंद और एकजुट होकर लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई।
लोकसभा चुनाव से कहीं पहले अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को जनता के सामने खलनायक साबित कर चुके थे मगर दिल्ली चुनाव के बाद हुई अपनी भूलों के कारण खुद को विकल्प के तौर पर पेश नहीं कर पाए। यह करने में नरेन्द्र मोदी कामयाब रहे और आज वे प्रधानमंत्री हैं। लेकिन फिर जनजागरण का श्रेय अन्ना आन्दोलन, अन्ना टीम और ख़ास तौर पर अरविन्द केजरीवाल को जाता है। यह शायद इतिहास में दर्ज न हो पाए क्योंकि इतिहास विजेताओं के नजरिये से लिखा जाता है और विजेता इस वक्त भाजपा है।

Friday, 4 July 2014

मोदी सरकार, कितनी असरदार?




हम भारतीय मूल रूप से चर्चा, आलोचना, समाज सुधार इत्यादि बातों में समय बिताना पसंद भी करते हैं और यह करते हुए गौरवान्वित भी महसूस करते हैं, बशर्ते यह आलोचना और सुधरने की प्रक्रिया व्यक्तिगत रूप से हमारे ऊपर लागू न होती हो. चौबीसों घंटे के मीडिया चैनल इस मानवीय कमजोरी की आग में ईंधन का सतत प्रवाह करने को संकल्पबद्ध है, भले ही यह आग उनकी अपनी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह ही क्यों न लगाती हो. इस प्रश्न चिन्ह के सैकड़ों पुख्ता सबूत और प्रकरण आपको जरा सी मेहनत से मिल जायेंगे, ताजा उदाहरण बदायूं केस है जहाँ मीडिया ने इस मामले में न केवल अखिलेश सरकार को कठघरे में खड़ा किया बल्कि उत्तर प्रदेश को बलात्कार प्रदेश बताने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन जब बात सीबीआई जांच तक आई तो मामला ऑनर किलिंग की थ्योरी पर जाकर सिमटने लगा. (मैं यहाँ न तो अखिलेश सरकार की तारीफ कर रहा हूँ न ही ऑनर किलिंग को रेप से बेहतर स्थिति बताने की कोशिश है, मुद्दा मीडिया द्वारा बिना जांच किये उतावलेपन में अधपकी खबरें चलाना है जिसमे सरकार या उसके नुमाइंदे निशाने पर हों.) ज़रा पीछे मुडकर देखें तो पूरे बयान में से एक छोटा सा हिस्सा प्रसारित कर 'टंच माल' को राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बना देना (जहाँ दिग्विजय सिंह कांग्रेस सांसद मीनाक्षी नटराजन की तारीफ करते हुए उन्हें सौ प्रतिशत खरा इन्सान कह रहे थे), मनोहर पर्रीकर के ताजा बयान पर उठे विवाद समेत सैकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे जिनकी चर्चा तो घंटों, दिनों महीनों और शायद सदियों तक भी संभव है, लेकिन समाधान की गुंजाइश केवल मीडिया और हमारे अपने अन्दर से है. 

मीडिया और समाज की इसी कमजोरी का शिकार कुछ दिनों पहले तक जनभावनाओं और जनाकान्क्षाओं का प्रतीक बनी मोदी सरकार भी बन रही है. सरकार बने अभी जुम्मा जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए हैं कि सवाल उन मामलों को लेकर उठने लगे हैं जिनका समाधान कई दशकों में जाकर होता है. मीडिया के एक मित्र से बात हुई तो उनकी तरफ से तर्क यह गढ़ा गया कि मुद्दों को एक समय-सीमा में हल करने का दबाव ही लोकतंत्र में सरकारों को काम पर लगाए रखता है. लेकिन जब सवाल यह किया गया कि चौतरफा आलोचना के दबाव में अगर सरकार का आधा वक्त सफाइयां देने और अपना पक्ष रखने में ही गुजरने लगे तो काम कब होगा, वे महानुभाव खामोश हो गए. खैर! हम यहाँ बात एक एक मुद्दे पर करेंगे जिनको लेकर पिछले कुछ दिनों में मोदी सरकार आलोचना के केंद्र में रही.

महंगाई का मुद्दा चिरजीवंत और चिरनूतन है. सरकार कोई भी हो, देश और काल कोई भी हो, सार्वजनिक चर्चा के अवसर उपलब्ध हैं तो महंगाई हमेशा एक मुद्दा रही है. महंगाई के मानक और इसके घटक अनंत है लेकिन फिर भी लोकतंत्र के ज्ञात इतिहास में कोई ऐसी सरकार याद नहीं आती जिसने महंगाई को कम करने में सफलता पाई हो. (यहाँ महंगाई का अर्थ वही है जो हम में से अधिकतर लोग आसानी से समझते हैं, मूल्यवृद्धि) आलू प्याज के दाम बढे और सरकार निशाने पर, जबकि यह हर साल होता है. इन्ही एक दो महीनों में इन खाद्य पदार्थों के दाम अक्सर बढ़ते रहे हैं. इसके पीछे कारण मौसमी प्रभाव, जमाखोरी, सरकार के स्तर पर कमजोर खाद्यान भंडारण और वितरण प्रबंधन शामिल है. लेकिन अचानक होने वाली यह मूल्यवृद्धि कोई नई बात नहीं है. इस बार केवल एक बात नई थी, सरकार की अतिसक्रियता. जैसे ही सरकार को मानसून की कमजोरी और संभावित मगर अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि की भनक लगी, प्रधानमंत्री कार्यालय हरकत में आया और सम्बन्धी मंत्रियों और अधिकारियों की एक बैठक बुलाकर सूखे और खाद्यान्न संकट से निपटने के उपाय मांगे गए. प्रस्ताव पहुंचे और अगले दो घंटे में उन पर अमल शुरू हो गया. यही नहीं, उसके पंद्रह दिन बाद एक दूसरी बैठक भी बुलाई गई जिसमे अब तक हुए उपायों और कामों पर चर्चा और समीक्षा की गई. इतनी सक्रियता, वह भी उच्च स्तर पर, मगर मीडिया के कैमरों से कहीं दूर. अभी तो सरकारी अधिकारी भी इस कार्यशैली की आदत नहीं दाल पा रहे हैं कि महीनों में होने वाले निर्णय घंटों में होने लगें. प्याज संकट गहाराता इसके पहले ही वित्त मंत्री अरुण जेटली भी सक्रिय हुए और सम्बंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगाने सम्बन्धी नियमों में तत्काल संशोधन कर दिया गया. हालांकि केवल इतना पर्याप्त नहीं है खाद्य पदार्थों की महंगाई रोकने के लिए कृषि नीति, भंडारण नीति, वितरण नीति में संशोधन के साथ राज्यों का सहयोग भी चाहिए लेकिन फिर भी असर दिखने लगा है आप भी आलू-प्याज खरीदने जायेंगे तो महसूस करेंगे. पहले जहाँ आलू प्याज के बढ़ते दामों की चर्चा कई कई हफ़्तों तक चलती थी, वहीँ इस बार यह मुद्दा मीडिया चैनलों पर केवल कुछ दिन का मेहमान बनकर रह गया.

यही हालात रेल किरायों और पेट्रोल डीजल में मूल्य वृद्धि के सन्दर्भ में है. एक ओर तो हम बुलेट ट्रेन चलाने के सपने  देखते हैं दूसरी ओर रेल किराए के नाम पर रेलवे को कुछ देना नहीं चाहते. याद रखें, बुलेट ट्रेन बुरादे पर नहीं चल सकती. भारतीय रेल को महंगा कहने वालों को सीएमके रिपोर्ट २०१२ पढनी चाहिए जिसके अनुसार रेल किराए के मामले में भारत केवल छः देशों से ऊपर है और यूरोप देशों में तो भारत के मुकाबले २० गुना अधिक तक किराया वसूला जा रहा है, यही उनकी ओर से प्रदान की जाने वाली बेहतरीन सेवा के लिए समुचित संसाधन भी उपलब्ध कराता है. रेलवे को योजनाओं के लिए धन चाहिए. पेट्रोल डीजल मूल्य वृद्धि पर भी लगभग यही तर्क मैं दोबारा नहीं रखना चाहूँगा लेकिन इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इराक वार इत्यादि बहुत से बातें मोदी सरकार के बस में भी नहीं हैं.

यहाँ यह भी समझना होगा कि सामान्य वस्तुओं में मूल्य वृद्धि एक साधारण आर्थिक क्रिया है जो लगातार चलती रहती है. किसी भी सरकार की कुशलता को नापने का पैमाना उसका मूल्य वृद्धि पर नियंत्रण कर पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि सरकार की कुशलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था में नौकरी के कितने अवसर (सरकारी और गैर-सरकारी दोनों) उपलब्ध करा पाती है? मूल्यवृद्धि रोकने को पैमाना बनाना बिलकुल ऐसा ही होगा जैसे हम किसी चालक की योग्यता इस बात से पता करें कि वह वाहन को कितनी देर तक एक जगह पर रोक कर रख सकता है. यह एक हल्का उदाहरण है मगर बात केवल प्रतीक की है. साथ ही यह भी ध्यान रखें कि अर्थव्यवस्था का कायापलट कोई एक दिन या कुछ महीनों में होने वाला काम नहीं है, इसके लिए हमें धैर्य रखना होगा.

सरकारी खजाने के खाली होने के तर्क के विरोध में खड़े लोग यह कह सकते हैं कि खजाना ही भरना है तो देश के प्राकृतिक संसाधनों और पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि के मुख्य कारक बने चौपहिया वाहनों पर टैक्स (एक्साइज और रोड) बढ़ाकर इस खजाने की पूर्ति की जा सकती है यह गरीब लोगों के हित में भी होगा और पर्यावरण के हित में भी, क्योंकि इससे कम वाहन बिकेंगे. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि किसी भी देश में कार्पोरेट क्षेत्र को झटका देने वाला यह फैसला असंभव सा है और इसे असंभव बनाता है सत्ता का चरित्र जिसका शिकार हर सरकार बनती है और मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है.

आखिर में केवल यही कहना चाहूँगा कि किसी भी देश की हुकुमत दृश्य और नियंत्रित ताकतों से ज्यादा अदृश्य और अनियंत्रित ताकतों पर निर्भर करती है और यह सिद्धांत भारत पर भी लागू होता है. अच्छे दिनों के इन्तजार में तीन दशक बाद स्पष्ट जनादेश देने वाले लोगों को शायद अभी कुछ और बुरे दिन देखने पड़ें. कमजोर मानसून (फलस्वरूप कमजोर खेती, जल संकट, बिजली संकट), अधपका बजट, खाड़ी संकट और तिस पर चौबीसों घंटे की बेपाया आलोचना का दबाव ऐसा कर सकता है. याद रखें, दिल्ली सदन में बैठे सर्वोच्च व्यक्ति के हाथों में जादू की छड़ी नहीं है (यह जुमला यूपीए-2 से उठाया लग सकता है) और सरकार या उसका मुखिया कोई भी हो वह न तो बारिश करवा सकता है न ही इराक की लड़ाई को रोक सकता है. इसलिए इन्तजार रखें, भरोसा बनाये रखें क्योंकि अभी कम से कम एक साल बाद ही आज लिए गए फैसलों का असर दिखेगा और कुछ का असर दिखने में तो शायद इससे कहीं अधिक वक्त लग जाए.