Friday, 23 January 2015

'आप' के पास बचा क्या है?

दिल्ली की चुनावी सरगर्मी तेज हुई तो खतरनाक ठण्ड में भी जहाँ एक ओर नेता मतदाता को लुभाने के लिए चुनाव प्रचार में उतर रहे हैं तो दूसरी ओर मीडिया चैनलों पर भी ख़बरों का प्राइम स्लॉट कब्जाने की रणनीतियां बनने लगी है. इसके लिए कोई भी किसी भी हद तक जाने को तैयार है बात चाहे भाजपा द्वारा किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की हो या आम आदमी पार्टी नेता आशीष खेतान द्वारा अरविन्द केजरीवाल के क़त्ल की आशंका जताना. ऐसे दिलचस्प राजनैतिक माहौल में मैं स्वयं खुद को एक राजनैतिक ब्लॉग लिखने से रोक नहीं पाया जिसमे अरविन्द केजरीवाल और किरन बेदी की तुलना की गई थी (पढ़ें  'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?). किरन बेदी का पलड़ा भारी होने पर आम आदमी पार्टी के कुछ पुराने साथियों ने आन्दोलन के दिनों का हवाला देकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में लिखने की दुहाई दी. ऐसे में बड़ा स्वाभाविक सवाल सामने आया कि आखिर आम आदमी पार्टी के पास ऐसा क्या बचा है जिससे वह खुद को आन्दोलन से उपजी पार्टी कह सके. तभी अचानक शांति भूषण जी का वह बयान आया कि आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गई है और अरविन्द केजरीवाल पार्टी से इस्तीफ़ा दें. एक एक कर वह सभी मुद्दे सामने घूमने लगे जिनके लिए पार्टी की स्थापना की गई थी. उनकी मौजूदा स्थिति आपके सामने रखना चाहूँगा.


जनलोकपाल आन्दोलन से उपजी पार्टी होने के कारण स्वाभाविक है कि यह पार्टी का पहला और आधारभूत मुद्दा होना चाहिए था. इसके कारण कथित रूप से पार्टी ने एक गठबंधन से चलने वाली सरकार भी कुर्बान की. अब एक ओर जहाँ अरविन्द केजरीवाल खुलेआम टीवी इंटरव्यू में कहते दिखाई दे रहे हैं कि जन-लोकपाल के बजाय सस्ती बिजली/पानी के मुद्दे आम जनता के ज्यादा करीब हैं इसलिए पार्टी जन-लोकपाल के बजाय फिलहाल फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी जैसे मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर रही है. दूसरी ओर कुछ महीने पहले तक सरकार 'कुर्बान' करने का दावा करने वाले अरविन्द और अन्य नेता इस मामले पर कई कई बार माफ़ी मांग चुके हैं और इस बार किसी भी हाल में पांच साल पूरे करने का वादा कर रहे हैं.मतलब लोकपाल की आकांक्षी जनता के हाथ खाली?

जनता को अधिकार देने के पैरोकार अरविन्द केजरीवाल स्वराज के नाम से एक किताब भी लिख चुके हैं जिसमे महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की झलक दिखाई देती है. इस किताब के अनुसार जनता के प्रतिनिधि से लेकर जन-प्रतिनिधि द्वारा धन के इस्तेमाल के चुनाव तक का फैसला जनता स्वयं करेगी. इसी का प्रतिनिधित्व पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया था जब यह फैसला लिया गया कि पार्टी के आम कार्यकर्ता के द्वारा वोटिंग होने पर ही किसी व्यक्ति को एम्.एल.ए. का टिकट दिया जायगा. पिछले चुनाव में छिटपुट विवादों के बीच ऐसा किया भी गया लेकिन लोकसभा चुनाव में समय की कमी का हवाला देकर ऐसा करने से किनारा कर लिया गया. इस बार दिल्ली चुनाव में समय भी भरपूर था और माहौल भी पार्टी के पक्ष में था. लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने सभी टिकटों का फैसला खुद किया, बिना किसी कार्यकर्ता की सलाह के. (अंदरूनी कोटरी के लोगों की गिनती कार्यकर्ताओं में करना बेवकूफी होगी.) मतलब एक बार टिकट का बंटवारा पार्टी कार्यकर्ताओं की राय से करने के बाद अब बिना हाईकमान की पार्टी ने अदृश्य हाई-कमान बना लिया है.
इसी बिना हाई-कमान की पार्टी होने का दम भरने के लिए पार्टी जिला समिति सदस्यों, प्रदेश समिति सदस्यों और केन्द्रीय समिति सदस्यों को मिलाकर बनाई गई नॅशनल कौंसिल को पार्टी की केन्द्रीय समिति पर नकेल कसने और तमाम बड़े फैसले करने का अधिकार दिया गया था. इस सिस्टम से अनजान लोगों की जानकारी के लिए इस समिति की बैठक पार्टी संविधान के अनुसार साल में दो बार होनी थी और केन्द्रीय समिति को किसी भी बड़े फैसले से पहले इस समिति की सहमति लेनी जरूरी थी. पार्टी बनने के छः महीने बाद होने वाली बैठक को लगभग सवा साल तक लटका के रखने के बाद जनवरी 2014 में यह बैठक हुई तो इसमें तमाम अनाधिकृत लोगों को बुलाया गया और 'तथाकथित' बहुमत से एक प्रस्ताव पास कर दिया गया कि नैशनल कोंसिल की बैठक साल में एक बार होगी और तमाम बड़े-छोटे फैसले करने का अधिकार केन्द्रीय नेतृत्व की 'राजनैतिक परिषद्' को दे दिया गया जिसमे फिलहाल 9 सदस्य हैं. यानी एक समय पर लगभग हर जिले के कार्यकर्ता से सलाह करने का दावा करने वाला केन्द्रीय नेतृत्व केवल 9 लोगों की मनमर्जी पर उतर आया. इसी के प्रभाव के कारण कई पुराने कार्यकर्ता और नेता पार्टी छोड़कर चले गए. उस पर तुर्रा यह कि साल में एक बार नैशनल कोंसिल की मीटिंग करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ.
आर टी आई कार्यकर्ता के तौर पर पार्टी के मुख्य चेहरे अरविन्द केजरीवाल की पहचान को और पुख्ता करने के लिए पार्टी ने स्वयं सूचना के अधिकार के खुद पर लागू होने का दावा किया. इस पारदर्शिता के खेल में शुरुआती 'केवल ऑनलाइन डोनेशन' से पलटते हुए जहाँ पहले पार्टी ने चादर में चंदा इकठ्ठा करना शुरू किया वहीँ कार्यकर्ताओं को डोनेशन स्लिप भी दी जाने लगी. अब यह सफ़र डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन दिखाने तक पहुँच चुका है. इस के लिए सुबूत की मांग करने वाले ट्रांजेक्शन नंबर CCA13GAAQ263 से दो अलग अलग स्लिप देख सकते हैं. चंदे के हिसाब के अलावा भी अन्य मुद्दों पर कितनी आर.टी.आई. एप्लीकेशन पार्टी कार्यालय में बिना जवाब दिए पड़ी हैं यह कोई नहीं जानता. इनमे से कईयों को तो 1 साल तक हो चुका है. (जी! मैं खुद की लगाईं अर्जी की बात कर रहा हूँ.)
पार्टी में सूचना के अधिकार के साथ साथ लोकपाल के लागू होने की भी बात कही गई थी जिसमे जिला कार्यालय से लेकर प्रदेश और केन्द्रीय स्तर पर एक लोकपाल बेंच का गठन किया जाना अनिवार्य था जो सम्बंधित स्तर पर किसी प्रकार की अनियमितता होने पर कार्रवाई करता. आज इस लोकपाल की मौजूदा स्थिति यह है कि लोकपाल की बात छोडिये कई जिलों में तीन या चार तक जिला समितियां बना दी गई हैं. (जी! पहली समितियों को भंग किये बगैर) यही हालात प्रदेश स्तर पर भी हैं.
इसके अलावा पार्टी की स्थापना के वक्त पार्टी का कहना था कि दूसरी पार्टियाँ छात्र/महिला/व्यापारी/अल्पसंख्यक मोर्चा इत्यादि के नाम पर समाज में बंटवारे का खेल खेलती हैं और आम आदमी पार्टी ऐसा नहीं करेगी. आज पार्टी के इन सभी नामों से अलग अलग विंग मौजूद हैं तो पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल ने इसका यह कहकर बचाव किया कि दूसरी पार्टियां यह विंग समाज को तोड़ने के लिए बनाती हैं तो हमने यह समाज में एकता लाने के लिए बनाये हैं.
अंतिम बात जिसका दम अरविन्द केजरीवाल पिछले दिल्ली चुनाव में हर सभा में भरते दिखाई देते थे वह थी पार्टी का परिवारवाद और व्यक्तिवाद से दूर होने. ऐसे में पार्टी के व्यक्तिवादी होने पर तो शायद कुछ कहना जरूरी नहीं है क्योंकि पार्टी में अरविन्द की लगभग सुपरह्युमन जैसी स्थिति पार्टी के व्यक्तिवादी होने का सीधा सुबूत है. रही बात परिवारवाद की तो एक पार्टी नेता की हत्या के बाद उन्ही के भाई/भतीजों को टिकट देने की मिसालें पार्टी में कई बन चुकी हैं. नित नए तरीकों से अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता करती पार्टी कब परिवारवाद की शिकार हो जाए कौन जानता है? आखिर राजनीति में आने के पहले दिन मुलायम सिंह/प्रकाश सिंह बादल/करूणानिधि इत्यादि भी तो परिवार वाद के खिलाफ जंग लड़ते हुए अकेले इस मैदान में थे. तो थोडा इन्तजार कीजिये अभी समय लगेगा इस उलटबांसी को लेने में.
इस तरह जहाँ एक ओर आम आदमी पार्टी अपनी तमाम मूल-भूत अच्छाइयों को छोड़ चुकी है वहीँ कई बड़ी भूलें पार्टी नेतृत्व लगातार करता रहा है जैसे दिल्ली से वाराणसी की दौड़ लगाना, हिट एंड रन टाइप के खुलासे करना, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का गला घोटना. यहाँ यह बता देना बेहतर होगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान तमाम वादाखिलाफियों और गलतियों की चर्चा यहाँ नहीं की गई है जिनकी लिस्ट अधिक लम्बी है. इन तमाम कारणों के साथ साथ सेकुलरिज्म के आईने में पार्टी लगातार वोटों के लिए किसी भी हद तक जाने के संकेत लगातार देती रही है, 'बाटला हाउस एनकाउंटर' की दोबारा जांच की मांग करना इसका एक उदाहरण था.
पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता, जो अन्ना आन्दोलन में सड़कों पर उतरने वालों में एक थे, के शब्दों में 'अन्ना आन्दोलन के दौरान तिरंगा झंडा उठाकर फख्र महसूस होता था, पार्टी बनी तो पहले झंडा छूटा बाद में एक एक कर सभी मुद्दे छूटते गए, अब बची है तो खाली हाथों लगाईं जाने वाली दौड़ जिसमे इनाम सत्ता का है, वह भी पार्टी नेताओं के लिए'.
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर आम आदमी पार्टी में ऐसा बचा क्या है जिसके कारण अन्ना आन्दोलन में भाग ले चुका कोई भी व्यक्ति इसे तमाम राजनैतिक पार्टियों से अलग माने? शायद कुछ भी नही. राजनीति बदलने का वादा करने वाली पार्टी खुद राजनैतिक बदलाव का शिकार हुई तो ऐसे रसातल में जायगी किसने सोचा था? ऐसे में किरन बेदी जैसी लौह महिला को मुकाबले में उतारकर भाजपा ने जले पर नमक छिडकने वाला ही दांव चला है. फिर भी जनता के मन में क्या है कौन जानता है? लेकिन फिर भी कम से कम आन्दोलन से उपजी पार्टी होने का दम भरना तो अब अरविन्द केजरीवाल को छोड़ ही देना चाहिए.

Sunday, 18 January 2015

'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?

दिल्ली में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच जुबानी और जमीनी जंग तेज हो गई है. इसमें पिछले हफ्ते तक आम आदमी पार्टी कुछ बढ़त लेती हुई इसलिए दिख रही थी क्योंकि भाजपा के पास अरविन्द केजरीवाल के कद का कोई नेता दिल्ली में मौजूद नहीं था. ऐसे में नेत्रत्वविहीन भाजपा अरविन्द केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले कर रही थी, जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपना योगदान केजरीवाल को नक्सलियों के साथ काम करने की सलाह देकर किया. यह अलग बात है कि इस तरह की बयानबाजी का फायदा भाजपा के बजाय खुद अरविन्द केजरीवाल को ज्यादा हो रहा था. यह अरविन्द केजरीवाल को 16 मई के पहले के नरेंद्र मोदी की स्थिति में खड़ा कर रहा था जहाँ यूपीए के मंत्री और नेता नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे थे और दूसरी ओर नरेंद्र मोदी उन हमलों का जवाब देने के साथ साथ भारत के भविष्य का खाका भी देश की जनता के सामने रख रहे थे. लगभग यही काम अरविन्द केजरीवाल दिल्ली को महिला सुरक्षा, फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी के सपने दिखा कर रहे थे.
इस लड़ाई में बड़ा मोड़ तब आया जब अन्ना आन्दोलन में अरविन्द केजरीवाल के साथ काम कर चुकी किरन बेदी भाजपा में शामिल हुई और भाजपा अरविन्द केजरीवाल के मुक़ाबिल अपना चेहरा किरण बेदी को बताने लगी. ऐसे में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के द्वारा किरन बेदी के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करना स्वाभाविक था. एक और जहाँ इस से किरन बेदी के पुराने बयानात को सामने लाने की जंग छिड़ पड़ी वहीँ किरन बेदी ने अरविन्द केजरीवाल पर कोई टिपण्णी न करके यह बताने की कोशिश की कि अरविन्द केजरीवाल उनके कद के बराबर नहीं है. ऐसे में एक नई बहस यह छिड़ पड़ी कि क्या किरण बेदी के आने से भाजपा को कोई फायदा होगा या यह केवल मीडिया में चर्चा का विषय बनने से आगे नहीं बढ़ पायगा. इसके फायदे या नुक्सान समझने के लिए हमें उन सभी चीजों पर गौर करना होगा जो आम आदमी पार्टी के नेता किरन बेदी के बारे में कह रहे हैं या कह सकते हैं.

इसमें पहला और सबसे अहम सवाल यही आता है कि क्या किरण बेदी का भाजपा के पाले में जाना अन्ना टीम और अन्ना के साथ धोखा है? गौरतलब है कि अन्ना आन्दोलन को राजनीति में बदलने की गुहार लगाने वालों में किरन बेदी, अनुपम खेर, वी. के. सिंह इत्यादि तमाम लोग थे. इनमे से जनरल वी. के. सिंह आज भाजपा सरकार में मंत्री हैं तो अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर भाजपा से सांसद हैं. अब किरन बेदी भी भाजपा में आ गई हैं. लेकिन यह शायद उतना बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं बन पायेगा क्योंकि किरन बेदी के एक साल पहले तक अराजनैतिक रहने के बयान का हवाला देने पर भाजपा पलटवार में अरविन्द केजरीवाल के 2012 से पहले के बयानों को सामने रख सकती है. वैसे भी बात से पलटने को मुद्दा बनाने पर आम आदमी पार्टी अधिक नुक्सान में रहेगी. उनके सामने सवाल ज्यादा बड़े होंगे जैसे लोकपाल को भूल जाना (जिसकी आज कहीं चर्चा नहीं हैं), बच्चों की कसम खाने के बाद कांग्रेस के साथ सरकार बना लेना, गाड़ी-बंगला लेना, केन्द्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की तलाश में दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ देना, वाराणसी और अमेठी के दुःख दर्द में साथ निभाने का वादा करके चुनाव के बाद वहां आज तक वापस न जाना. राजनीति में अपनी बात से पलट जाने में आम आदमी पार्टी का इतिहास छोटा भले ही हो लेकिन दाग गहरे उन्ही के दामन पर हैं.
दूसरा मुद्दा 'आप' यह बना सकती है कि कुछ समय पहले तक नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाली किरन बेदी लगभग एक साल पहले अचानक उनके गुण गाने लगी. तो यह तो अरविन्द केजरीवाल ने भी किया है. याद करें लोकसभा चुनाव से पहले अरविन्द केजरीवाल गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी के 10 साल के विकास की पोल 3 दिन में खोलने का दावा कर रहे थे, लेकिन आज वे नरेंद्र मोदी पर कोई भी सीधा हमला करने से बच रहे हैं क्योंकि तब और अब के नरेंद्र मोदी के कद में जमीन आसमान का फर्क है.
इसके अलावा किरन बेदी द्वारा अपने से जूनियर अधिकारी को प्रोन्नत किये जाने के विरोध में पुलिस सेवा से इस्तीफ़ा देना उन्हें पद का लालची घोषित करने का एक मौका तो देता है लेकिन बात राजनीति की हो या सामाजिक और पुलिस सेवा की, बड़े पद का मतलब बड़ी जिम्मेदारी, अधिक अधिकार के साथ साथ बड़े लक्ष्यों को पूरा करना भी होता है. ऐसे में बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में सरकार द्वारा अडंगा अडाने के कारण अगर किरण बेदी ने इस्तीफ़ा दे दिता तो यह उनकी नीयत पर कहीं से भी सवाल नहीं उठाता. वैसे भी देखा जाए तो यही कोशिश खुद अरविन्द केजरीवाल लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली से इस्तीफ़ा देकर कर चुके हैं. और देखा जाए तो अब भी अरविन्द केजरीवाल स्वयं मुख्यमंत्री पद की दौड़ में है तो क्या यह पद की लालसा है या बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कोशिश?
एक अन्य आक्षेप किरन के ऊपर तानाशाही रवैया होने का लग सकता है जो उनके जनसंबोधनों और मीडिया बहसों में अक्सर परिलक्षित हो जाता है. (अब तक तो भाजपा के कार्यकर्ता भी इसका स्वाद चख चुके होंगे) इस तरह के आरोप स्वयं अरविन्द पर भी लग चुके हैं. उनेक कई साथी इस तरह के आरोप लगाकर उन्हें छोड़ चुके हैं (विनोद कुमार बिन्नी, शाजिया इल्मी, शमून काजमी, उनके अपने विधायक भी) तो कई साथी पार्टी में रहकर उन पर यह आरोप लगा चुके हैं (योगेन्द्र यादव का ख़त याद कीजिये और आम आदमी पार्टी के ऑफिस में चलती बतकहियों पर ध्यान दीजिये.)इसके अलावा भी आम आदमी पार्टी के प्रदेश और जिला समितियां सदस्य अक्सर आम आदमी पार्टी की केंद्रीय समिति के कुछ सदस्यों पर पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड बनाने का आरोप लगाते रहे हैं, जिनमे से मैं स्वयं एक हूँ.
यानी कुल मिलकर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की लड़ाई शुरू होने की दशा में अरविन्द के पास ऐसा कोई तीर नहीं होगा जिसका जवाब भाजपा के पास न हो बल्कि कई मामलों में अरविन्द किरन बेदी के सामने कमजोर पड़ते दिखाई पड़ते हैं. जैसे किरन के मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व के सामने अरविन्द का इनकम टैक्स अधिकारी के तौर पर फीका रिकॉर्ड और मुख्यमंत्री के तौर पर तमाम दाग (दागों का मतलब प्रशासनिक अक्षमता लिया जाए, जैसे समाधान न कर पाने की स्थिति में मैदान छोड़ देना, सोमनाथ भारती प्रकरण, धरना, असफल जनता दरबार इत्यादि). किरन की कड़क छवि अरविन्द के ढुलमुल रवैये के सामने उन्हें बड़ा साबित कर देती है. इसी ढुलमुल रवैये के कारण अरविन्द बार बार अपना स्टैंड भी बदलते रहे और उनके साथी भी लगातार बदलते रहे. (अन्ना आन्दोलन के गिने चुने कार्यकर्ता और सहयोगी आज उनके साथ हैं) किरन को इस छवि में और मजबूती सामान्य ज्ञान की उन किताबों से मिलती है जिसे भारत का आम नागरिक पढता रहा है और जिनमें किरन अपना नाम कई दशक पहले दर्ज करा चुकी हैं. यानी मनोवैज्ञानिक रूप से किरन बेदी अरविन्द केजरीवाल के ऊपर बढ़त बना चुकी हैं.
बात मुद्दों की करें तो भी अरविन्द केजरीवाल के हाथ किरन बेदी के आने के बाद लगभग खाली दिखाई देते हैं. किरन बेदी के आने से महिला सुरक्षा का मुद्दा उनके हाथ से फिसल चुका है. लोकपाल और राईट टू रिकाल वह खुद ही छोड़ चुके हैं. ऐसे में सस्ती बिजली और सस्ता पानी की योजना के दम पर वे कहाँ तक पहुँच पायेंगे जबकि सस्ती बिजली के वादे से ज्यादा आम जनता को 24 घंटे बिजली का वादा ज्यादा मजबूत लगता है. तो अरविन्द के हाथ मुद्दों से लगभग खाली होने के बाद उनके सामने रास्ता क्या बचता है? वही, जो पिछले हफ्ते तक भाजपा के पास था. यानी किरन बेदी की छवि को छोटा करना, लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर जहाँ आम आदमी पार्टी नेगेटिव कैम्पेन में उलझ कर रह जायेगी वहीँ किरन अन्ना आन्दोलन की सहयोगी होने के कारण बहुत सी ऐसी बातों को सामने ला सकती हैं जिससे अरविन्द के लिए स्थिति असहज हो जाएगी. यूँ तो इस तरह की बातों से अन्ना आन्दोलन के दिनों के लगभग सभी लोग परिचित हैं (स्वयं मैं भी) लेकिन कम से कम खुले मंच तक इन बातों का 1 प्रतिशत भी आज तक किसी ने नहीं रखा है.
तो क्या किरन बेदी को मैदान में उतार कर भाजपा ने चुनाव से पहले ही मोर्चा जीत लिया है? ये दिल्ली है जनाब! मामला इतना आसान नहीं है. समस्याएं किरन के सामने भी हैं. सड़क का नेता न होना, भाजपा कार्यकर्ताओं से जुड़ाव न होना, जुड़ाव के लिए किरन खुद को बदलने के लिए तैयार दिखती हों ऐसा भी नहीं है (नमूना आपने भाजपा में आने के अगले दिन देख लिया होगा जब किरन भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बीच में कार्यकर्ताओं को डपट रही थी, याद कीजिये वे शब्द "आपको एंटरटेनमेंट चाहिए? तो बाहर चले जाइए".) इसके अलावा मुख्यमंत्री पद के लिए आस लगाए बैठे भाजपा नेता क्या उन्हें स्वीकार कर पायेंगे? हालाँकि इसमें अमित शाह सर्कस के रिंग मास्टर की भूमिका निभा सकते हैं. तो देखते रहिये क्योंकि मुकाबला दिलचस्प होने वाला है."

Monday, 5 January 2015

सुनिए...... आपका दिमाग बात कर रहा है......

पिछले ब्लॉग कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यों है? को लगभग एक माह बीत चुका है. (यह ब्लॉग उसी दिए गए लिंक की अगली कड़ी मात्र है, इसलिए आपसे निवेदन है कि दिए गए लिंक को जरुर पढ़ें.) कई मित्रों ने ब्लॉग पर कमेंट में प्रतिक्रिया दी तो बहुत से साथियों ने फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज किये. तारीफ़ करना उनका सामजिक कर्त्तव्य था जिसे कई प्रतिक्रियाओं में निभाया भी गया लेकिन बेहतर प्रतिक्रयाएं वे थी जिनमे पिछले लेख की निर्मम आलोचना की गई या कई ऐसी अवधारणाओं पर सवाल उठाये गए जो पिछले ब्लॉग का आधार थीं. ऐसी प्रतिक्रियाएं दूसरों से आगे इस मायने में भी निकल जाती है क्योंकि इनसे आगे की विचारयात्रा का रास्ता खुलता है.
पिछले ब्लॉग पर आई प्रतिक्रियाओं को अगले कुछ लेखों में उठाने की कोशिश करूँगा.
एक दोस्त ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि यदि किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय ही उसकी शारीरिक और मानसिक संरचना/क्षमता तय हो जाती है साथ ही उसकी फिजिकल एनर्जी को तय करने वाले अधिकतर मानक निर्धारित हो जाते हैं तो यह भी साबित होता है कि उस व्यक्ति विशेष के मित्र/शत्रु और विभिन्न परिस्थितियों में उसकी प्रतिक्रिया और साथ ही उसके जीवन के अधिकांश पहलू भी लगभग पूर्वनिर्धारित होते हैं. तो क्या एक साधारण व्यक्ति अपनी पूरी जिन्दगी को अपने जन्म के समय हुई घटनाओं की प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं जीता? क्या इस का अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सब पूर्व निर्धारित है और इंसान केवल खिलौना मात्र है जिसके पास किसी भी प्रकार के बदलाव का कोई रास्ता नहीं है?
नहीं. जैसा कि मैंने पिछले ब्लॉग में लिखा था कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में होने वाले हार्मोनल स्त्राव से इस बात का निर्धारण होता है कि वह किस परिस्थिति में किस प्रकार से प्रतिक्रिया देगा? लेकिन साथ ही इस सिद्धांत की तह में जाने पर हम कह सकते हैं कि यदि हम हार्मोनल स्त्राव को नियंत्रित कर सकें तो प्रतिक्रिया बदली जा सकती है और प्रतिक्रिया बदलने पर बाकी बदलाव अवश्यम्भावी हैं क्योंकि इंसानी जीवन केवल क्रिया-प्रतिक्रिया का खेल मात्र है.
हार्मोनल स्त्राव को समझने के लिए दिमाग के काम करने के तंत्र को समझना जरूरी है. इंसानी दिमाग पूरे समय (सोते समय भी) शरीर से लगातार संकेत प्राप्त करता है और उसी के आधार पर शरीर को दिशा-निर्देश देता है. इन्ही दिशा निर्देशों से हमारे क्रियाकलाप/मनःस्थिति(साधारण शब्दों में इसे मूड कह सकते हैं) तय होते हैं.

उदाहरण के तौर पर मान लीजिये कि कोई व्यक्ति मैदान में दौड़ रहा है और दौड़ते दौड़ते वह पूरी तरह थक चुका है. अब वह जॉगिंग ख़त्म करके घर जाने की तैयारी में है. अगर आप उस से एक किलोमीटर और दौड़ने को कहेंगे तो क्या वह मानेगा? नहीं. क्योंकि उसका शरीर दिमाग को अपने थकने का सिग्नल भेज चुका है इसलिए दिमाग और दौड़ने से इनकार कर देगा. लेकिन यदि उसी मैदान में एक पागल कुत्ता आ जाए जो उस व्यक्ति को काटने के लिए उसकी ओर बढ़ रहा हो तब क्या वह व्यक्ति अपने बचाव के लिए भागेगा? हाँ, और शायद पहले से भी अधिक तेज. आखिर ऐसा क्या बदला? कौन कौन सी शारीरिक क्रियाएं इस बीच हुई है? शरीर ने दिमाग को अपने खतरे में होने का सिग्नल भेजा. दिमाग ने भी बदले में त्वरित कार्रवाई करते हुए ऐसे हार्मोन्स का स्त्राव बढ़ा दिया जिनसे वह व्यक्ति उत्तेजित हो और भाग सके. यह शरीर द्वारा अपने बचाव की साधारण प्रोटोकॉल है.
इसी तरह शरीर लगातार दिमाग को शरीर में मौजूद शुगर की मात्रा के बारे में संकेत देता है. जैसे ही शुगर एक निर्धारित स्तर से कम होने लगती है दिमाग का एक हिस्सा सक्रिय होता है और कुछ ख़ास तरह के हार्मोन्स का स्त्राव शरीर में शुरू हो जाता है जिनसे हमें भूख का एहसास होता है. हम भूख लगने का एहसास होने पर कुछ खाते हैं और शुगर लेवल सामान्य हो जाता है. यहाँ यह बता देना जरूरी है की शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका होती है जिसे चालू रखने के लिए शुगर एनर्जी का सबसे पहला स्त्रोत है.
अब प्रक्रिया को थोडा बदलकर देखें. अगर किसी तरह दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल में शुगर लेवल अधिक होने की जानकारी हो तो क्या दिमाग ऐसे हार्मोन्स का स्त्राव होने देगा जिनसे हमें भूख का एहसास होता है? नहीं. यानी अगर दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल बदले जा सकते हैं तो किसी भी इंसान की भावनाएं भी बदली जा सकती हैं. दरअसल इंसानी शरीर विभिन्न परिस्थितियों में एक ख़ास पैटर्न में बर्ताव करता है. जैसे उदास होने पर व्यक्ति धीरे धीरे चलेगा, कंधे झुके होंगे, सांस भी वह धीरे धीरे लेगा जबकि उत्तेजित/खुश होने पर उसकी चाल तेज होगी, कंधे और हाथ खुले होंगे, सांस भी तेज होगी.


तो क्या यह संभव है कि दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल्स बदले जा सकें? बिलकुल. अगर आप शारीरिक प्रक्रिया में बदलाव कर सकते हैं तो दिमाग को भेजे जाने वाले सिग्नल स्वयं बदल जाते हैं. उदाहरण के लिए मान लीजिये आप गुस्से में हैं ऐसे में सबकी सलाह होती है सांस धीरे धीरे लेना जिससे उत्तेजना कम हो जाए. यह केवल दिमाग को धोखा देने का ही एक रूप है. शरीर धीरे धीरे सांस लेगा जिससे दिमाग यह सिग्नल प्राप्त करेगा कि कोई खतरा नहीं है, सब ठीक है और वह शरीर को साधारण अवस्था में रखने वाले ह्र्मोंस का स्त्राव चालू रखेगा और आपकी उत्तेजना कम हो जायगी. जबकि विपरीत परिस्थिति में गुस्से और शारीरिक गति को बढाने वाले हार्मोन्स का स्त्राव होगा.
इसी तरह अगर कोई व्यक्ति उदास है तो वह अचानक अपनी चाल ढाल बदल दे (तेज चलना, ऊंचे कंधे, खुले हाथ, लगभग नाचने जैसी स्थिति) तो अचानक से उस व्यक्ति का मूड ठीक हो जाएगा. यह कोई टोटका नहीं केवल साधारण विज्ञान है. शरीर की क्रियाओं में बदलाव के साथ मानसिक स्थिति में बदलाव संभव है. तो अगली बार जब मन उदास हो थोडा नाचकर देखिये.
(पुनश्च:- बहुत से साथियों ने पिछले लेख पर  और बहुत सी प्रतिक्रियाएं दी थीं जिन पर इस ब्लॉग में बात नहीं रख पाया, उम्मीद है इसके लिए माफ़ी मिलेगी. पिछले लेख पर प्रतिक्रिया देने के लिए ख़ास तौर पर डा. राकेश पारिख, अनुज शर्मा, मिलन गुप्ता, ज्योति बुडाकोटी का खास तौर पर धन्यवाद. आप सभी का सहयोग आगे भी अपेक्षित होगा. खास तौर पर अनुज भाई, आपने जो बातें कही थी उन पर आगे लिखने की कोशिश रहेगी. इस बार माफ़ी.)

आपकी प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा.