दिल्ली की चुनावी सरगर्मी तेज हुई तो खतरनाक ठण्ड में भी जहाँ एक ओर नेता मतदाता को लुभाने के लिए चुनाव प्रचार में उतर रहे हैं तो दूसरी ओर मीडिया चैनलों पर भी ख़बरों का प्राइम स्लॉट कब्जाने की रणनीतियां बनने लगी है. इसके लिए कोई भी किसी भी हद तक जाने को तैयार है बात चाहे भाजपा द्वारा किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की हो या आम आदमी पार्टी नेता आशीष खेतान द्वारा अरविन्द केजरीवाल के क़त्ल की आशंका जताना. ऐसे दिलचस्प राजनैतिक माहौल में मैं स्वयं खुद को एक राजनैतिक ब्लॉग लिखने से रोक नहीं पाया जिसमे अरविन्द केजरीवाल और किरन बेदी की तुलना की गई थी (पढ़ें 'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?). किरन बेदी का पलड़ा भारी होने पर आम आदमी पार्टी के कुछ पुराने साथियों ने आन्दोलन के दिनों का हवाला देकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में लिखने की दुहाई दी. ऐसे में बड़ा स्वाभाविक सवाल सामने आया कि आखिर आम आदमी पार्टी के पास ऐसा क्या बचा है जिससे वह खुद को आन्दोलन से उपजी पार्टी कह सके. तभी अचानक शांति भूषण जी का वह बयान आया कि आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गई है और अरविन्द केजरीवाल पार्टी से इस्तीफ़ा दें. एक एक कर वह सभी मुद्दे सामने घूमने लगे जिनके लिए पार्टी की स्थापना की गई थी. उनकी मौजूदा स्थिति आपके सामने रखना चाहूँगा.
जनलोकपाल आन्दोलन से उपजी पार्टी होने के कारण स्वाभाविक है कि यह पार्टी का पहला और आधारभूत मुद्दा होना चाहिए था. इसके कारण कथित रूप से पार्टी ने एक गठबंधन से चलने वाली सरकार भी कुर्बान की. अब एक ओर जहाँ अरविन्द केजरीवाल खुलेआम टीवी इंटरव्यू में कहते दिखाई दे रहे हैं कि जन-लोकपाल के बजाय सस्ती बिजली/पानी के मुद्दे आम जनता के ज्यादा करीब हैं इसलिए पार्टी जन-लोकपाल के बजाय फिलहाल फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी जैसे मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर रही है. दूसरी ओर कुछ महीने पहले तक सरकार 'कुर्बान' करने का दावा करने वाले अरविन्द और अन्य नेता इस मामले पर कई कई बार माफ़ी मांग चुके हैं और इस बार किसी भी हाल में पांच साल पूरे करने का वादा कर रहे हैं.मतलब लोकपाल की आकांक्षी जनता के हाथ खाली?
जनता को अधिकार देने के पैरोकार अरविन्द केजरीवाल स्वराज के नाम से एक किताब भी लिख चुके हैं जिसमे महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की झलक दिखाई देती है. इस किताब के अनुसार जनता के प्रतिनिधि से लेकर जन-प्रतिनिधि द्वारा धन के इस्तेमाल के चुनाव तक का फैसला जनता स्वयं करेगी. इसी का प्रतिनिधित्व पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया था जब यह फैसला लिया गया कि पार्टी के आम कार्यकर्ता के द्वारा वोटिंग होने पर ही किसी व्यक्ति को एम्.एल.ए. का टिकट दिया जायगा. पिछले चुनाव में छिटपुट विवादों के बीच ऐसा किया भी गया लेकिन लोकसभा चुनाव में समय की कमी का हवाला देकर ऐसा करने से किनारा कर लिया गया. इस बार दिल्ली चुनाव में समय भी भरपूर था और माहौल भी पार्टी के पक्ष में था. लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने सभी टिकटों का फैसला खुद किया, बिना किसी कार्यकर्ता की सलाह के. (अंदरूनी कोटरी के लोगों की गिनती कार्यकर्ताओं में करना बेवकूफी होगी.) मतलब एक बार टिकट का बंटवारा पार्टी कार्यकर्ताओं की राय से करने के बाद अब बिना हाईकमान की पार्टी ने अदृश्य हाई-कमान बना लिया है.
इसी बिना हाई-कमान की पार्टी होने का दम भरने के लिए पार्टी जिला समिति सदस्यों, प्रदेश समिति सदस्यों और केन्द्रीय समिति सदस्यों को मिलाकर बनाई गई नॅशनल कौंसिल को पार्टी की केन्द्रीय समिति पर नकेल कसने और तमाम बड़े फैसले करने का अधिकार दिया गया था. इस सिस्टम से अनजान लोगों की जानकारी के लिए इस समिति की बैठक पार्टी संविधान के अनुसार साल में दो बार होनी थी और केन्द्रीय समिति को किसी भी बड़े फैसले से पहले इस समिति की सहमति लेनी जरूरी थी. पार्टी बनने के छः महीने बाद होने वाली बैठक को लगभग सवा साल तक लटका के रखने के बाद जनवरी 2014 में यह बैठक हुई तो इसमें तमाम अनाधिकृत लोगों को बुलाया गया और 'तथाकथित' बहुमत से एक प्रस्ताव पास कर दिया गया कि नैशनल कोंसिल की बैठक साल में एक बार होगी और तमाम बड़े-छोटे फैसले करने का अधिकार केन्द्रीय नेतृत्व की 'राजनैतिक परिषद्' को दे दिया गया जिसमे फिलहाल 9 सदस्य हैं. यानी एक समय पर लगभग हर जिले के कार्यकर्ता से सलाह करने का दावा करने वाला केन्द्रीय नेतृत्व केवल 9 लोगों की मनमर्जी पर उतर आया. इसी के प्रभाव के कारण कई पुराने कार्यकर्ता और नेता पार्टी छोड़कर चले गए. उस पर तुर्रा यह कि साल में एक बार नैशनल कोंसिल की मीटिंग करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ.
आर टी आई कार्यकर्ता के तौर पर पार्टी के मुख्य चेहरे अरविन्द केजरीवाल की पहचान को और पुख्ता करने के लिए पार्टी ने स्वयं सूचना के अधिकार के खुद पर लागू होने का दावा किया. इस पारदर्शिता के खेल में शुरुआती 'केवल ऑनलाइन डोनेशन' से पलटते हुए जहाँ पहले पार्टी ने चादर में चंदा इकठ्ठा करना शुरू किया वहीँ कार्यकर्ताओं को डोनेशन स्लिप भी दी जाने लगी. अब यह सफ़र डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन दिखाने तक पहुँच चुका है. इस के लिए सुबूत की मांग करने वाले ट्रांजेक्शन नंबर CCA13GAAQ263 से दो अलग अलग स्लिप देख सकते हैं. चंदे के हिसाब के अलावा भी अन्य मुद्दों पर कितनी आर.टी.आई. एप्लीकेशन पार्टी कार्यालय में बिना जवाब दिए पड़ी हैं यह कोई नहीं जानता. इनमे से कईयों को तो 1 साल तक हो चुका है. (जी! मैं खुद की लगाईं अर्जी की बात कर रहा हूँ.)
पार्टी में सूचना के अधिकार के साथ साथ लोकपाल के लागू होने की भी बात कही गई थी जिसमे जिला कार्यालय से लेकर प्रदेश और केन्द्रीय स्तर पर एक लोकपाल बेंच का गठन किया जाना अनिवार्य था जो सम्बंधित स्तर पर किसी प्रकार की अनियमितता होने पर कार्रवाई करता. आज इस लोकपाल की मौजूदा स्थिति यह है कि लोकपाल की बात छोडिये कई जिलों में तीन या चार तक जिला समितियां बना दी गई हैं. (जी! पहली समितियों को भंग किये बगैर) यही हालात प्रदेश स्तर पर भी हैं.
इसके अलावा पार्टी की स्थापना के वक्त पार्टी का कहना था कि दूसरी पार्टियाँ छात्र/महिला/व्यापारी/अल्पसंख्यक मोर्चा इत्यादि के नाम पर समाज में बंटवारे का खेल खेलती हैं और आम आदमी पार्टी ऐसा नहीं करेगी. आज पार्टी के इन सभी नामों से अलग अलग विंग मौजूद हैं तो पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल ने इसका यह कहकर बचाव किया कि दूसरी पार्टियां यह विंग समाज को तोड़ने के लिए बनाती हैं तो हमने यह समाज में एकता लाने के लिए बनाये हैं.
अंतिम बात जिसका दम अरविन्द केजरीवाल पिछले दिल्ली चुनाव में हर सभा में भरते दिखाई देते थे वह थी पार्टी का परिवारवाद और व्यक्तिवाद से दूर होने. ऐसे में पार्टी के व्यक्तिवादी होने पर तो शायद कुछ कहना जरूरी नहीं है क्योंकि पार्टी में अरविन्द की लगभग सुपरह्युमन जैसी स्थिति पार्टी के व्यक्तिवादी होने का सीधा सुबूत है. रही बात परिवारवाद की तो एक पार्टी नेता की हत्या के बाद उन्ही के भाई/भतीजों को टिकट देने की मिसालें पार्टी में कई बन चुकी हैं. नित नए तरीकों से अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता करती पार्टी कब परिवारवाद की शिकार हो जाए कौन जानता है? आखिर राजनीति में आने के पहले दिन मुलायम सिंह/प्रकाश सिंह बादल/करूणानिधि इत्यादि भी तो परिवार वाद के खिलाफ जंग लड़ते हुए अकेले इस मैदान में थे. तो थोडा इन्तजार कीजिये अभी समय लगेगा इस उलटबांसी को लेने में.
इस तरह जहाँ एक ओर आम आदमी पार्टी अपनी तमाम मूल-भूत अच्छाइयों को छोड़ चुकी है वहीँ कई बड़ी भूलें पार्टी नेतृत्व लगातार करता रहा है जैसे दिल्ली से वाराणसी की दौड़ लगाना, हिट एंड रन टाइप के खुलासे करना, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का गला घोटना. यहाँ यह बता देना बेहतर होगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान तमाम वादाखिलाफियों और गलतियों की चर्चा यहाँ नहीं की गई है जिनकी लिस्ट अधिक लम्बी है. इन तमाम कारणों के साथ साथ सेकुलरिज्म के आईने में पार्टी लगातार वोटों के लिए किसी भी हद तक जाने के संकेत लगातार देती रही है, 'बाटला हाउस एनकाउंटर' की दोबारा जांच की मांग करना इसका एक उदाहरण था.
पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता, जो अन्ना आन्दोलन में सड़कों पर उतरने वालों में एक थे, के शब्दों में 'अन्ना आन्दोलन के दौरान तिरंगा झंडा उठाकर फख्र महसूस होता था, पार्टी बनी तो पहले झंडा छूटा बाद में एक एक कर सभी मुद्दे छूटते गए, अब बची है तो खाली हाथों लगाईं जाने वाली दौड़ जिसमे इनाम सत्ता का है, वह भी पार्टी नेताओं के लिए'.
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर आम आदमी पार्टी में ऐसा बचा क्या है जिसके कारण अन्ना आन्दोलन में भाग ले चुका कोई भी व्यक्ति इसे तमाम राजनैतिक पार्टियों से अलग माने? शायद कुछ भी नही. राजनीति बदलने का वादा करने वाली पार्टी खुद राजनैतिक बदलाव का शिकार हुई तो ऐसे रसातल में जायगी किसने सोचा था? ऐसे में किरन बेदी जैसी लौह महिला को मुकाबले में उतारकर भाजपा ने जले पर नमक छिडकने वाला ही दांव चला है. फिर भी जनता के मन में क्या है कौन जानता है? लेकिन फिर भी कम से कम आन्दोलन से उपजी पार्टी होने का दम भरना तो अब अरविन्द केजरीवाल को छोड़ ही देना चाहिए.






