किसी भी अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला बोझ और अधिकाधिक मानवीय संसाधनों की जरूरत के बीच साधा गया संतुलन ही आर्थिक विकास की परिभाषा तय करता है. लेकिन बात मौजूदा लोकतंत्र की हो तो मानवीय संसाधन का मतलब वोट का जुगाड़ हो जाता है और प्राकृतिक संसाधनों का मतलब वोट के जुगाड़ को दिया जाने वाला लोलीपोप जो उन्हें किसी खास चुनाव चिन्ह से जोड़कर रखे. इन दोनों के मेलजोल से जो भी दल तीन किलोमीटर की परिधि वाले आलिशान बंगलों की दिल्ली पर काबिज होते हैं आर्थिक विकास की परिभाषा अपने आंकड़ों से वे खुद गढ़ लेते हैं. यानी सब कुछ उसी वोट के जुगाड़ के इर्द गिर्द घूमता है, जिसे संविधान के तहत भी और लोकतंत्र की भावना के तहत भी, मूल लोकतान्त्रिक अधिकार माना गया है.
ऐसे में देश की जनसँख्या को लेकर आये किसी भी बयान को राजनैतिक नजर से ना देखना गलत भी होगा और अदूरदर्शिता भी. गलत और अदूरदर्शी ना कहलाने की इसी होड़ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक उच्च पदाधिकारी के बयान की चीरफाड़ शुरू हुई जब उन्होंने कहा कि देश को राजनैतिक असंतुलन से बचाने के लिए जरूरी है कि हिन्दू परिवार ‘हम दो हमारे दो’ की अधिकृत सरकारी नीति को धता बताते हुए कम से कम तीन बच्चे पैदा करें. कहने का मतलब यह कि बाकी सम्प्रदायों के मुकाबले हिन्दुओं की घटती आबादी देश के लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन रही है. खतरा लोकतंत्र को है या वोट बैंक को यह तो साफ़ नहीं है लेकिन यह बयान इतना जता देने के लिए काफी है कि राजनैतिक दल देश में रहने वाले विभिन्न दलों के लोगों को ना केवल वोट बैंक की नजर से देखते हैं बल्कि दूसरे दलों के वोट बैंक पर लगते ब्याज के अनुसार अपने खाते में पड़े वोटों को बढाने का भी ख्याल करते हैं. गौर कीजिये ‘वोट को बढाने का ख्याल’. यानी गुणात्मक वृद्धि की इस दौड़ में गुणात्मक विकास के चिंतन के लिए ना कोई जगह है ना समय.
अब बात उस अधिकार की करें जिस के साए में यह जोड़ तोड़ रुपी मानसिकता हमारे राजनैतिक दलों की बन रही है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं वोट के अधिकार की. देश के तीन करोड़ लोग जो अलग अलग प्रदेशों की २६ राजधानियों में रोजी रोजी के लिए मेहनत मजदूरी करते हुए रह रहे हैं अभी तक वोट के इस अधिकार से वंचित हैं क्योंकि उनके पास रहने के लिए छत तो है लेकिन इस का कोई प्रमाण नहीं. यानी देश के नागरिक हैं, मनमोहिनी अर्थव्यवस्था में जीडीपी के पहिये को धकेलने वाले बैल भी हैं लेकिन लोकतंत्र के पहिये वे आज तक नहीं बन पाए.
इसके अलावा बड़े-बड़े राजनैतिक दलों के छोटे नेता अक्सर ऐसी मुहिम के हिस्सेदार बन जाते हैं जहाँ बिना किसी प्रमाण के वोटर कार्ड बनवाये जाते हैं जिनका आधार केवल यह सम्भावना होती है कि वोट किस दल को पड़ने वाला है. यहाँ वोटर आईडी कार्ड बनवाने का मतलब वोट खरीदना भी है और वोटर आईडी कार्ड बेचना भी. छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तरपूर्वी राज्यों में तो यह बाकायदा धंधा बन चुका है. इस सिंडिकेट को बांग्लादेश से घुसपैठ कर आये सवा करोड़ नागरिकों में से कम से कम ६५ लाख लोगों के वोटर आईडी कार्ड बन जाने के आंकड़े को देखकर समझा जा सकता है. इस धंधे में सेंध लगाने वाले समाजसेवियों से कभी मिलेंगे तो वे आपको बताएँगे कि निस्वार्थ भाव से वोटर आईडी कार्ड बनवाने और फर्जी वोटर कार्ड कैंसिल करवाने की मुहिम चलाने वाली संस्थाओं के प्रमुख चेहरों और कार्यकर्ताओं को किस प्रकार की धमकियां मिलती है. एक बानगी देखनी हो तो दिल्ली में ताजा चुनाव के मद्देनजर वोट की शक्ति नामक कैम्पेन चला रहे लोगों से मिल लीजियेगा.
बुनियादी सवाल अब भी वही है क्या लोकतंत्र में तंत्र के पीछे खड़े लोक को केवल पांच साल में एक बार वोट डालने के अधिकार से ही उसकी अहमियत का अंदाजा दिलाया जा सकता है? राजनैतिक असंतुलन वाली थ्योरी की छाया में भी इसे समझा जाए तो लोकतंत्र की यह लकीर भीड़तंत्र से आगे नहीं जा पाती है. खैर! जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना यह लोकतंत्र अभी अपने शैशव काल में है और बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब इसे ढूँढने हैं. एक और सही!
Friday, 1 November 2013
संघ के बयान का मतलब.....
इतनी ख़ामोशी से गुजर जाना? ये तो ठीक नहीं.....
राजेन्द्र यादव नहीं रहे. ऐसा लगा जैसे कोई रेल किसी पुल से ख़ामोशी से गुजर गई हो. असम्भव! ऐसा तो नहीं सोचा था. रोज नई बहस, नए विवाद, नए झमेले का हिस्सा बना रहने वाला कलम का यह पुरोधा ऐसे ख़ामोशी से चला जायगा ये तो नहीं सोचा था कभी. उस से भी ज्यादा हैरत हुई जब तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने इस खबर को उतनी मुखरता से नहीं चलाया जितना किसी रियल्टी शो या कोमेडी शो की खबर को चलाया जाता है.
राजेन्द्र यादव की उपस्थिति उनके लेखन की वजह से तो थी ही लेकिन साथ ही साथ हिंदी साहित्य में उनकी जगह उनके क्रियाकलापों की वजह से कहीं ज्यादा थी. स्त्री विमर्श, दलित विमर्श का नायक बने लेखक राजेन्द्र जब सम्पादक के रूप में सामने आये तो प्रेम चंद की ‘हंस’ को नया रूप देने में भी सफल हुए और मंडल-कमंडल के दौर में महत्वपूर्ण राजनैतिक, वैचारिक और सामाजिक हस्तक्षेप करने में भी. ऐसे संक्रामक दौर में जब सोवियत के विघटन के बाद विचारधाराएँ ख़त्म होने के कगार पर थी और देश में नए सामाजिक और राजनैतिक बदलाव सर उठा रहे थे, तब राजेन्द्र यादव ने हंस को अपना हथियार बनाते हुए सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों पर लगातार लिखा और ऐसा लिखा कि उन पर कई कई मुक़दमे तक हुए पर उनकी कलम ना रुकी, ना झुकी.
यही हाल स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को लेकर उनके प्रयासों का रहा. उनके स्त्री विमर्श को शुरुआत में केवल देह विमर्श की नजर से देखा गया और दलित विमर्श में असहज लेखक समाज ने उन्हें साहित्य के लालू प्रसाद यादव तक का तमगा दिया. लेकिन राजेन्द्र यादव अपने विचारों पर अडिग रहे क्योंकि वे समाज के लिए एक सकारात्मक सोच का दायरा बनाना चाहते थे. कभी किसी संशय का शिकार उन्होंने अपनी कलम को होने दिया हो याद नहीं आता.
अपने लेखन को लेकर उनमे एक अटूट विशवास था जो अक्सर उनके वक्तव्यों में झलकता भी था. मसलन उनका यह कहना कि ‘लिखते वक्त संकीर्ण दायरे में रहना गलत बात है. बड़े बड़े मुद्दे उठाने चाहिए. अगर मेरे लिखने से विवाद पैदा होता है तो हो. उसकी चिंता मुझे नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ जो लोग विवाद पैदा करेंगे कल वो बहस करेंगे और परसों वे मुझसे सहमत होंगे.’ अपनी छवि और स्थापना की चिंता उन्हें कभी नहीं रही. अपने लेखन को लेकर यह विशवास ही था कि खुद पर हुए किसी मजाक या किसी कटु आलोचना से वे तनिक भी नहीं घबराए या बौखलाए. कभी भी नहीं. जवाब हमेशा दिया लेकिन बहस के अंत में विरोधी को गले लगाना कभी नहीं भूले.
ऐसे दौर में जब हिंदी साहित्य एक सी सोच वाले लेखकों का झुण्ड बनता जा रहा था राजेन्द्र यादव बहस का प्रतीक बनकर उभरे. उन्होंने अपने कट्टर से कट्टर विरोधी को भी हंस में जगह दी. यह केवल राजेन्द्र यादव ही कर सकते थे कि अपनी लड़ाई पूरे दिल से लड़ो और लड़ाई के अंत में विरोधी को घर खाने पर आने का निमंत्रण भी दो. हंस में पाठकों और लेखकों की चिट्ठियां पढ़ें आपको हैरत होगी कि कैसे कोई सम्पादक अपने खिलाफ इतने कटु प्रहार होने पर भी उस चिट्ठी को छाप सकता है. यही राजेन्द्र थे. अनिवार्य संवाद के प्रतीक! इसका मतलाब यह कतई नहीं है कि वे अहंवादी या सेंसिटिव नहीं थे. लेकिन उनका स्तर दूसरा था.
इसके अलावा लेखकों की एक बड़ी फ़ौज उनकी देन है हिंदी साहित्य को. अपने लेखन के लिए जितने निष्ठावान वे थे उससे कहीं अधिक दूसरे को लेखक बना देने के लिए उत्साही. ज़रा किसी में लिखने के लिए रूचि दिखी कि हर काम छोड़ कर बैठ जाते थे लिखने के टिप्स देने में. इसी तरह एक पूरी पीढी लेखकों की तैयार कर गए हैं वे. अक्सर मजाक में कहते भी थे ‘मेरे बाद कोई तो हो मेरे गुण गाने वाला’. लेकिन उनके निकट रहने वाला व्यक्ति कभी उनके गुण नहीं गा पाता था, उन्हें महान समझना मुश्किल था. बचपन की सीमा को छूता अल्हड़पन और हमेशा छाई रहने वाली मस्ती शायद इसका एक कारण रही हो.
उनके जीवन की साठवीं वर्षगाँठ पर आगरा में मित्रों के बीच दिया उनका वक्तव्य जस का तस आपके सामने रख रहा हूँ शायद यह कुछ मदद करे उन्हें समझने में. “हम लेखक अक्सर अपनी पांडुलिपि तिजोरी में रखते हैं ताकि नक़ल बिकती रहे और असल हमेशा बची रहे. यही रवैया हम जिंदगी को लेकर रखते हैं. असली चेहरा, असली चाल, असली चरित्र घर रख आते हैं और महफ़िल में आ जाते है सब नकली लेकर, जो अक्सर तारीफ़ बटोर लेता है. आज कहना चाहता हूँ मैं जो कुछ हूँ चाहे वह मेकअप हो, मुखौटा हो, प्रतिलिपि हो, या सचमुच अपना विस्तार हो सब आपका दिया है. मैं अपनी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ कि जो भी गलत खराब या अरुचिकर है वही असली राजेन्द्र यादव है”
उनकी स्मृति को प्रणाम!
Thursday, 24 October 2013
राजनैतिक आतंक की छाँव में राहुल गाँधी होने का मतलब
Wednesday, 23 October 2013
राम जेठमलानी v/s भाजपा - बनते बिगड़ते संबंधों की एक दिलचस्प दास्तान
कई पुरानी तस्वीरें जहन में उभर आई।भाजपा की पहली सरकार में मंत्री पद संभाले व्यक्ति से लेकर भाजपा में शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने के फैसले तक कुछ भी साधारण नहीं किया राम जेठमलानी ने।
अविभाजित भारत के सिंध में 1923 में जन्मे जेठमलानी सत्रह साल की उम्र में वकील बने।एक रिफ्युजी के तौर पर भारत आये जेठमलानी हमेशा चर्चा में रहे।बात चाहे हिन्दू परिवार में दो शादियों की हो या पचास के दशक में स्मगलरों का वकील कहलाने की। बड़े से बड़ा विवादास्पद और हाई प्रोफाइल केस वह लड़ चुके हैं। कई बार देशद्रोही वकील का तमगा भी मिला।इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के हत्यारों से लेकर हाजी मस्तान और अफजल गुरु तक जेठमलानी के क्लाइंट रहे हैं। हर्षद मेहता और केतन पारिख जिन्होंने भारतीय शेयर बाजार को एक अरसा उँगलियों पर नचाया भी इस लम्बी लिस्ट में शामिल हैं। कई बड़े फैसले, जो न्याय की दुनिया मील का पत्थर साबित हुए, उनकी वकील के तौर पर काबिलियत के गवाह बने। लाख विपरीत परिस्थितियों, विरोधों के बावजूद कभी लगा नहीं कि राम जेठमलानी डिग रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा, जिसने 1971 में जनसंघ के तौर पर पहली बार जेठमलानी को उल्हासनगर से टिकट दिया था और 1996 में मंत्री पद, के लिए यह हमला अप्रत्याशित भी है और परेशान कर देने वाला भी।राम जेठमलानी, जो आपातकाल के खिलाफ विरोध में भाजपा का बड़ा हथियार रहे, भले ही अटल बिहारी वाजपेयी का विशवास कभी ना जीत पाए हों पर लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी हमेशा रहे।यही कारण है कि हर भाजपा सरकार में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हीं जेठमलानी ने भाजपा और लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ ना सिर्फ बगावत शुरू कर दी बल्कि सीधा निशाना आडवाणी पर ही साध दिया।
राम जेठमलानी हमेशा दिल की बात कहने वाले और उस बात की कीमत वसूलने वाले राजनेता और वकील के तौर पर जाने जाते हैं।इसके लिए 27 जुलाई 2011 का पाकिस्तानी दूतावास द्वारा आयोजित वह रात्रिभोज याद करने की जरूरत है जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और चीनी राजदूत के सामने भारत के राज्य सभा सदस्य के तौर पर भी जेठमलानी खुले शब्दों में यह कहने से नहीं हिचकिचाए थे कि "चीन भारत और पाकिस्तान का संयुक्त दुश्न्मन है और पाकिस्तान सरकार को यह बात समझने की जरूरत है"।
जब नितिन गडकरी पर व्यावसायिक हितों के लिए राजनीति के इस्तेमाल के आरोप लगे तो खुला विरोध करने वाले पहले शख्स जेठमलानी ही थे।इसी कड़ी में संगठन के पदाधिकारियों को लिखी कड़ी चिट्ठी के सार्वजनिक हो जाने का खामियाजा पार्टी से निष्काशन के रूप में भुगतना पडा।
अब जबकि यह जंग अदालत के दरवाजे तक पहुँच गई है देखना दिलचस्प होगा कि नतीजा भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर क्या असर डालता है?
देखना होगा भारतीय न्याय तंत्र की जड़े हिला देने वाला सबसे महँगा यह वकील क्या यही काम भारतीय राजनीति के साथ कर सकता है?
Thursday, 17 October 2013
तो सुप्रीम कोर्ट भी बिकता है?
लेकिन तीन दिन पहले जब पूर्व कोयला सचिव पीसी पारिख और प्रख्यात उद्योगपति बिड़ला जांच के दायरे में आये तो बयानबाजी के कोहरे में सुप्रीम कोर्ट की छवि भी धुंधली नजर आने लगी।
पहला बयान उस अधिकारी का आया जो अपनी चालीस साल की बेदाग़ सेवा का हवाला देकर ईमानदारी की बात करते हुए सीबीआई के फैसले और रवैये पर सवाल उठा रहा था।लोकतंत्र में सत्ता के उच्चतम प्रतिष्ठान प्रधानमन्त्री पद की ओर उठती उंगली यकीनन लोकतंत्र के मुखिया की कुर्सी के पायों के बौनेपन का एहसास करा रही थी। प्रथम साजिशकर्ता के तौर पर प्रधानमन्त्री के शामिल होने का मतलब है लोकतंत्र की जीत और जो लोकतंत्र की ही नाक काटकर हासिल हुई हो। पारदर्शिता और न्यायपरकता के इस खेल में अपनी ख़ामोशी से हजारो सवालों की लाज रखने वाला पीएम जब खुद सवालों के दायरे में है तो सवालों की लाज भले ही रखी जा रही हो परन्तु लोकतंत्र की लाज का सवाल कहीं दिखाई नहीं देता।
दूसरा बड़ा सवाल उन दलों की प्रतिक्रया से पैदा हुआ जिनपर जिम्मेदारी थी इस लोकतंत्र के पहरुए बनकर सरकार को कुछ गलत न करने देने की। लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी का एहसास होने की बजाय इस बार भी रटे रटाये बयान सामने आये जो 2014 के लिए निशाना साधते दलों की कमान से निकले हर तीर पर लिखे होते हैं। तो क्या वाकई 2014 की लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण है कि लोकतान्त्रिक मर्यादा का भी उल्लंघन आसानी से किया जा सकता है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ रखने वाले दल यही जताना चाहते हैं। लेकिन जनता तक पहुँचते संकेत तो प्रधानमन्त्री के खिलाफ उमड़े गुस्से के धुएं में कहीं खो गए लगते हैं।
तीसरा और सबसे बड़ा झटका देश की राजनीति का मिजाज भी समझा गया और सत्ता पूँजी समीकरण की रासायनिक संरचना भी। लुटियंस की दिल्ली के प्राचीरों के स्वघोषित संरक्षकों ( केंद्रीय मंत्रियों) में से एक केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का बयान सर्वाधिक चौंकाने वाला था। उन्हें ना चिंता लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की हो रही छीछालेदार की थी ना सीबीआई जांचों और उठती उँगलियों के डर से हर फ़ाइल पर कुंडली मारकर बैठी नौकरशाही के आत्मविश्वास की। उनके बयान में चिंता जाहिर हुई कोर्पोरेट के ऊपर उठती उँगलियों की।इस के लिए वे सुप्रीम कोर्ट पर ऊँगली उठाने से भी बाज नहीं आये।वाणिज्य मंत्री होने के नाते उनकी चिंता वाजिब है परन्तु वाणिज्य मंत्री वे इसलिए बने क्योंकि लोकतंत्र के प्यादे कहे जाने वाले लोगों ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी। लेकिन उनके बयान से सत्ता के कार्पोरेटाना पहलू की पोल एक बार फिर खुलती नजर आई। झारखण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश से आने वाले कम से कम 80 सांसद ऐसे हैं जो केवल कारपोरेट से सम्बंधित सवाल पूछते हैं।राज्यसभा में कम से कम 65 सांसद कोर्पोरेट घरानों के सीधे सीधे नुमाइन्दे हैं।किसानों से सम्बंधित यही आंकडा आप मांगेंगे तो हम कहेंगे किसान अब नेता नहीं बनता उलटा नेता अभिनेता अक्सर किसान बनते दिखाई देते हैं और यह सामजिक जीवन का हिसा नहीं होता बल्कि टैक्स प्लानिंग का हिस्सा होता है।
एक आखिरी और सबसे बड़ा सवाल जो जनता के सामने और आया है वह है सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता का। अगर सुप्रीम की निगरानी में काम करते हुए भी सीबीआई कुछ गलत कर सकती है तब तो लोकतंत्र शब्द को भी हैरी पॉटर के खलनायक वोल्डरमोर्ट की तरह निषिद्ध कर देना चाहिए। लेकिन इस सवाल का जवाब ढूँढने की जिम्मेदारी उसी जनता की है जिसे रोज सुबह मजदूरी पर जाना होता है ताकि शाम तक घर में सब्जी रोटी का जुगाड़ हो सके।
Friday, 20 September 2013
क्या हमें संसद में एक रावण की जरूरत है? हाँ…..
मुजफ्फरनगर - क्या है परदे के पीछे के राजनैतिक समीकरण
Wednesday, 18 September 2013
राजनीति के महाभारत में धृतराष्ट्र काल है ये
गौर से देखें तो भारतीय राजनीति का भी यह ध्रतराष्ट्र काल है. फर्क बस इतना है कि इस दौर में ध्रतराष्ट्र एक से ज्यादा है. ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौरवों की संख्या भी सौ से अधिक ही होगी. भारत में सरकार से लेकर हर पार्टी का अपना एक ध्रतराष्ट्र है. बात सबकी करेंगे शरुआत सरकार से:-
सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह शुचिता के ध्वजवाहक भी माने जाते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के पुरोधा भी. उनके द्वारा १९९१ में शुरू की गई वह पहल, जिसमे मुक्त बाजार को देश की तरक्की में साझेदार माना गया था, आज दम तोडती दिख रही है तो इसके लिए उन्ही के साथ रहने वाले कौरव जिम्मेदार हैं. आखिर क्या कारण हैं जिसने एक अच्छी शुरुआत के रूप में चले आर्थिक सुधारों के दौर को देश बेचने के लिए लगने वाली बोली में तब्दील कर दिया. क्यों मनमोहन सिंह उस भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रहे हैं जिसे रोकने की बात वह लाल किले से लगातार करते रहे हैं. क्या है ऐसा कि मनमोहन के दम पर कांग्रेस उसी शुचिता, इमानदारी और बेदाग़ छवि का दावा करते हुए चुनाव जीती जिसे उसके अपने मंत्रियों ने तार तार किया. क्यों मनमोहन सिंह ध्रतराष्ट्र बने देश को बिकते हुए देख रहे हैं जब कि बहुसंख्यक आबादी भुखमरी का शिकार है. इस पर बात रखने के लिए शायद लेखन की एक श्रंखला भी कम पड़े इसलिए अगले ध्रतराष्ट्र पर चलते हैं.
बात भाजपा की करें तो यही भूमिका संयुक्त रूप से नरेन्द्र मोदी और लाल कृष्ण आडवानी के पास है. आडवानी अपनी भूमिका से किनारा करने की कोशिश में खुद को भीष्म पितामह घोषित कर चुके हैं. ऐसे में मोदी पर सबकी निगाहे हैं और खुद मोदी की निगाह प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर है. नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री की कुर्सी कब्जाने की कोशिश में माया कोडनानी, बाबू बजरंगी, विट्ठल रादडीया, जस्टिस आर के मेहता की ओर से आँखें मूँद कर पूरी तरह ध्रतराष्ट्र की भूमिका में रम चुके हैं.
लेकिन बात यहीं नहीं थमती है. बात किसी भी पार्टी की कर लें. नाम लें या ना लें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहीं किसी परिवार के चार या पांच लोग पार्टी पर काबिज है तो कहीं परिवार के बजाय चार या पांच चेहरे पूरी पार्टी की राजनीति तय करते हैं. यही चार पांच लोगों का कोकस पार्टी संविधान और पार्टी कार्यकर्ताओं को नजर अंदाज करते हुए पार्टी की विचारधारा तय करता है. शायद भारतीय लोकतंत्र को पुरानी राजनैतिक कहावतों से पार जाने में अभी वक्त लगेगा जिनमे से एक कहावत “नेताजी रहें शासन में, कार्यकर्ता अनुशासन में” भी है. आम कार्यकर्ता की पार्टी नेतृत्व से यह दूरी लोकतंत्र के लिए घातक भी है और भविष्य के लिए जहर भी.
शायद ध्रतराष्ट्र युग की राजनीति अभी और चले. इन्तजार कीजिये लोकतंत्र की इस द्रौपदी के चीरहरण के आखिरी पल का जब कोई कृष्ण अवतरित हो. या शायद अट्ठारह दिनी महाभारत ही इसका इलाज हो, लेकिन लोकतंत्र में सत्ता बन्दूक की नली से आये तो नतीजे भी घातक ही होते हैं. इसलिए माओवाद से कहो कुछ धैर्य रखे. लोकतंत्र की शांतिवार्ता जारी है.