Friday, 1 November 2013

संघ के बयान का मतलब.....

किसी भी अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला बोझ और अधिकाधिक मानवीय संसाधनों की जरूरत के बीच साधा गया संतुलन ही आर्थिक विकास की परिभाषा तय करता है. लेकिन बात मौजूदा लोकतंत्र की हो तो मानवीय संसाधन का मतलब वोट का जुगाड़ हो जाता है और प्राकृतिक संसाधनों का मतलब वोट के जुगाड़ को दिया जाने वाला लोलीपोप जो उन्हें किसी खास चुनाव चिन्ह से जोड़कर रखे. इन दोनों के मेलजोल से जो भी दल तीन किलोमीटर की परिधि वाले आलिशान बंगलों की दिल्ली पर काबिज होते हैं आर्थिक विकास की परिभाषा अपने आंकड़ों से वे खुद गढ़ लेते हैं. यानी सब कुछ उसी वोट के जुगाड़ के इर्द गिर्द घूमता है, जिसे संविधान के तहत भी और लोकतंत्र की भावना के तहत भी, मूल लोकतान्त्रिक अधिकार माना गया है.
ऐसे में देश की जनसँख्या को लेकर आये किसी भी बयान को राजनैतिक नजर से ना देखना गलत भी होगा और अदूरदर्शिता भी. गलत और अदूरदर्शी ना कहलाने की इसी होड़ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक उच्च पदाधिकारी के बयान की चीरफाड़ शुरू हुई जब उन्होंने कहा कि देश को राजनैतिक असंतुलन से बचाने के लिए जरूरी है कि हिन्दू परिवार ‘हम दो हमारे दो’ की अधिकृत सरकारी नीति को धता बताते हुए कम से कम तीन बच्चे पैदा करें. कहने का मतलब यह कि बाकी सम्प्रदायों के मुकाबले हिन्दुओं की घटती आबादी देश के लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन रही है. खतरा लोकतंत्र को है या वोट बैंक को यह तो साफ़ नहीं है लेकिन यह बयान इतना जता देने के लिए काफी है कि राजनैतिक दल देश में रहने वाले विभिन्न दलों के लोगों को ना केवल वोट बैंक की नजर से देखते हैं बल्कि दूसरे दलों के वोट बैंक पर लगते ब्याज के अनुसार अपने खाते में पड़े वोटों को बढाने का भी ख्याल करते हैं. गौर कीजिये ‘वोट को बढाने का ख्याल’. यानी गुणात्मक वृद्धि की इस दौड़ में गुणात्मक विकास के चिंतन के लिए ना कोई जगह है ना समय.
अब बात उस अधिकार की करें जिस के साए में यह जोड़ तोड़ रुपी मानसिकता हमारे राजनैतिक दलों की बन रही है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं वोट के अधिकार की. देश के तीन करोड़ लोग जो अलग अलग प्रदेशों की २६ राजधानियों में रोजी रोजी के लिए मेहनत मजदूरी करते हुए रह रहे हैं अभी तक वोट के इस अधिकार से वंचित हैं क्योंकि उनके पास रहने के लिए छत तो है लेकिन इस का कोई प्रमाण नहीं. यानी देश के नागरिक हैं, मनमोहिनी अर्थव्यवस्था में जीडीपी के पहिये को धकेलने वाले बैल भी हैं लेकिन लोकतंत्र के पहिये वे आज तक नहीं बन पाए.
इसके अलावा बड़े-बड़े राजनैतिक दलों के छोटे नेता अक्सर ऐसी मुहिम के हिस्सेदार बन जाते हैं जहाँ बिना किसी प्रमाण के वोटर कार्ड बनवाये जाते हैं जिनका आधार केवल यह सम्भावना होती है कि वोट किस दल को पड़ने वाला है. यहाँ वोटर आईडी कार्ड बनवाने का मतलब वोट खरीदना भी है और वोटर आईडी कार्ड बेचना भी. छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तरपूर्वी राज्यों में तो यह बाकायदा धंधा बन चुका है. इस सिंडिकेट को बांग्लादेश से घुसपैठ कर आये सवा करोड़ नागरिकों में से कम से कम ६५ लाख लोगों के वोटर आईडी कार्ड बन जाने के आंकड़े को देखकर समझा जा सकता है. इस धंधे में सेंध लगाने वाले समाजसेवियों से कभी मिलेंगे तो वे आपको बताएँगे कि निस्वार्थ भाव से वोटर आईडी कार्ड बनवाने और फर्जी वोटर कार्ड कैंसिल करवाने की मुहिम चलाने वाली संस्थाओं के प्रमुख चेहरों और कार्यकर्ताओं को किस प्रकार की धमकियां मिलती है. एक बानगी देखनी हो तो दिल्ली में ताजा चुनाव के मद्देनजर वोट की शक्ति नामक कैम्पेन चला रहे लोगों से मिल लीजियेगा.
बुनियादी सवाल अब भी वही है क्या लोकतंत्र में तंत्र के पीछे खड़े लोक को केवल पांच साल में एक बार वोट डालने के अधिकार से ही उसकी अहमियत का अंदाजा दिलाया जा सकता है? राजनैतिक असंतुलन वाली थ्योरी की छाया में भी इसे समझा जाए तो लोकतंत्र की यह लकीर भीड़तंत्र से आगे नहीं जा पाती है. खैर! जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना यह लोकतंत्र अभी अपने शैशव काल में है और बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब इसे ढूँढने हैं. एक और सही!

इतनी ख़ामोशी से गुजर जाना? ये तो ठीक नहीं.....

राजेन्द्र यादव नहीं रहे. ऐसा लगा जैसे कोई रेल किसी पुल से ख़ामोशी से गुजर गई हो. असम्भव! ऐसा तो नहीं सोचा था. रोज नई बहस, नए विवाद, नए झमेले का हिस्सा बना रहने वाला कलम का यह पुरोधा ऐसे ख़ामोशी से चला जायगा ये तो नहीं सोचा था कभी. उस से भी ज्यादा हैरत हुई जब तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने इस खबर को उतनी मुखरता से नहीं चलाया जितना किसी रियल्टी शो या कोमेडी शो की खबर को चलाया जाता है.
राजेन्द्र यादव की उपस्थिति उनके लेखन की वजह से तो थी ही लेकिन साथ ही साथ हिंदी साहित्य में उनकी जगह उनके क्रियाकलापों की वजह से कहीं ज्यादा थी. स्त्री विमर्श, दलित विमर्श का नायक बने लेखक राजेन्द्र जब सम्पादक के रूप में सामने आये तो प्रेम चंद की ‘हंस’ को नया रूप देने में भी सफल हुए और मंडल-कमंडल के दौर में महत्वपूर्ण राजनैतिक, वैचारिक और सामाजिक हस्तक्षेप करने में भी. ऐसे संक्रामक दौर में जब सोवियत के विघटन के बाद विचारधाराएँ ख़त्म होने के कगार पर थी और देश में नए सामाजिक और राजनैतिक बदलाव सर उठा रहे थे, तब राजेन्द्र यादव ने हंस को अपना हथियार बनाते हुए सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों पर लगातार लिखा और ऐसा लिखा कि उन पर कई कई मुक़दमे तक हुए पर उनकी कलम ना रुकी, ना झुकी.
यही हाल स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को लेकर उनके प्रयासों का रहा. उनके स्त्री विमर्श को शुरुआत में केवल देह विमर्श की नजर से देखा गया और दलित विमर्श में असहज लेखक समाज ने उन्हें साहित्य के लालू प्रसाद यादव तक का तमगा दिया. लेकिन राजेन्द्र यादव अपने विचारों पर अडिग रहे क्योंकि वे समाज के लिए एक सकारात्मक सोच का दायरा बनाना चाहते थे. कभी किसी संशय का शिकार उन्होंने अपनी कलम को होने दिया हो याद नहीं आता.
अपने लेखन को लेकर उनमे एक अटूट विशवास था जो अक्सर उनके वक्तव्यों में झलकता भी था. मसलन उनका यह कहना कि ‘लिखते वक्त संकीर्ण दायरे में रहना गलत बात है. बड़े बड़े मुद्दे उठाने चाहिए. अगर मेरे लिखने से विवाद पैदा होता है तो हो. उसकी चिंता मुझे नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ जो लोग विवाद पैदा करेंगे कल वो बहस करेंगे और परसों वे मुझसे सहमत होंगे.’ अपनी छवि और स्थापना की चिंता उन्हें कभी नहीं रही. अपने लेखन को लेकर यह विशवास ही था कि खुद पर हुए किसी मजाक या किसी कटु आलोचना से वे तनिक भी नहीं घबराए या बौखलाए. कभी भी नहीं. जवाब हमेशा दिया लेकिन बहस के अंत में विरोधी को गले लगाना कभी नहीं भूले.
ऐसे दौर में जब हिंदी साहित्य एक सी सोच वाले लेखकों का झुण्ड बनता जा रहा था राजेन्द्र यादव बहस का प्रतीक बनकर उभरे. उन्होंने अपने कट्टर से कट्टर विरोधी को भी हंस में जगह दी. यह केवल राजेन्द्र यादव ही कर सकते थे कि अपनी लड़ाई पूरे दिल से लड़ो और लड़ाई के अंत में विरोधी को घर खाने पर आने का निमंत्रण भी दो. हंस में पाठकों और लेखकों की चिट्ठियां पढ़ें आपको हैरत होगी कि कैसे कोई सम्पादक अपने खिलाफ इतने कटु प्रहार होने पर भी उस चिट्ठी को छाप सकता है. यही राजेन्द्र थे. अनिवार्य संवाद के प्रतीक! इसका मतलाब यह कतई नहीं है कि वे अहंवादी या सेंसिटिव नहीं थे. लेकिन उनका स्तर दूसरा था.
इसके अलावा लेखकों की एक बड़ी फ़ौज उनकी देन है हिंदी साहित्य को. अपने लेखन के लिए जितने निष्ठावान वे थे उससे कहीं अधिक दूसरे को लेखक बना देने के लिए उत्साही. ज़रा किसी में लिखने के लिए रूचि दिखी कि हर काम छोड़ कर बैठ जाते थे लिखने के टिप्स देने में. इसी तरह एक पूरी पीढी लेखकों की तैयार कर गए हैं वे. अक्सर मजाक में कहते भी थे ‘मेरे बाद कोई तो हो मेरे गुण गाने वाला’. लेकिन उनके निकट रहने वाला व्यक्ति कभी उनके गुण नहीं गा पाता था, उन्हें महान समझना मुश्किल था. बचपन की सीमा को छूता अल्हड़पन और हमेशा छाई रहने वाली मस्ती शायद इसका एक कारण रही हो.
उनके जीवन की साठवीं वर्षगाँठ पर आगरा में मित्रों के बीच दिया उनका वक्तव्य जस का तस आपके सामने रख रहा हूँ शायद यह कुछ मदद करे उन्हें समझने में. “हम लेखक अक्सर अपनी पांडुलिपि तिजोरी में रखते हैं ताकि नक़ल बिकती रहे और असल हमेशा बची रहे. यही रवैया हम जिंदगी को लेकर रखते हैं. असली चेहरा, असली चाल, असली चरित्र घर रख आते हैं और महफ़िल में आ जाते है सब नकली लेकर, जो अक्सर तारीफ़ बटोर लेता है. आज कहना चाहता हूँ मैं जो कुछ हूँ चाहे वह मेकअप हो, मुखौटा हो, प्रतिलिपि हो, या सचमुच अपना विस्तार हो सब आपका दिया है. मैं अपनी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ कि जो भी गलत खराब या अरुचिकर है वही असली राजेन्द्र यादव है”
उनकी स्मृति को प्रणाम!

Thursday, 24 October 2013

राजनैतिक आतंक की छाँव में राहुल गाँधी होने का मतलब



राहुल गांधी के भाषणों को लगातार सुनिए तो देश के बारे में कम गांधी परिवार या राहुल गांधी, एक व्यक्ति, के बारे में अधिक कहते सुने देते हैं. कभी बचपन के डरावने अनुभव तो कभी मां के आधी रात कमरे में आकर रोने की बातें. राजस्थान भाषण भी इस से कुछ अलग नहीं था. या शायद था. क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ कि देश के सबसे सुरक्षित और मजबूत कहे जाने वाले परिवार के किसी सदस्य ने सार्वजनिक मंच से परिवार के सदस्यों की हत्या के बाद का अनुभव और स्वयं अपनी हत्या का डर जाहिर किया हो.
गैर कांग्रेसी इसे राजनैतिक चश्मे से देखना पसंद करेंगे तो कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह भक्तिभाव जाहिर करने का एक और मौका होगा. यकीनन इन सब के बीच दादी और पिता की हत्या के बाद डरे सहमे जवान बालक की मानसिकता तक शायद ही कोई पहुँच पायेगा जो सुरक्षा के साए में भी असुरक्षित महसूस करता है. देखा जाए तो जवाहर लाल नेहरु को छोड़ कर पिछली तीन पीढ़ियों में किसी की भी मृत्यु सामान्य कारणों से नहीं हुई. कहने वाले इसे शहादत भी कहते हैं लेकिन शहादत से अधिक यह उस तंत्र की पोल खोलता है जो देश की सुरक्षा का दम भरता है और चीरफाड़ करेंगे तो एक बार फिर निशाने पर वही आते हैं जो खुद को पीड़ित कहते हैं. बात चाहे प्रत्यक्ष रूप से सत्ता सँभालते राजीव गाँधी और इंदिरा गांधी की हो या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की चाभी और रिमोट थामे सोनिया-राहुल की.
राहुल गांधी के बयान के राजनैतिक निहितार्थ भी हैं, होने भी चाहिए. सदियों तक राजों-रजवाड़ों की परम्परा का पालन करने वाला यह देश अभी भी उस मानसिकता से शायद पूरी तरह बाहर नहीं निकला अन्यथा कोई कारण नहीं था कि दादी और पिता को याद करने वाले एक बयान पर बहस करने के लिए टीवी चैनलों और अख़बारों पर होड़ लग गई. अब इसे ऐसे समझिये कि यदि इस बयान पर टीवी चैनलों के एसी कमरों में बैठे एंकर इतने भावुक हो सकते हैं तो देश के साधारण आदमी का क्या हाल होगा जो देश को आजाद होने का क्रेडिट इसी गांधी परिवार को देता रहा है. (एक सर्वे के अनुसार इस देश के ८.९% लोग अभी तक नहीं जानते कि इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी है, उनके लिए अभी भी कांग्रेस को वोट देने का मतलब इंदिरा मैय्या को वोट देना ही है.) तो विरासत का हवाला देकर वोट मांगना उतनी बुरी बात नहीं जितनी इस पर प्रतिक्रिया आ जाती है क्योंकि भारत जैसे देश में यह हर बड़ा नेता और हर बड़ी पार्टी करती रही है.
बात व्यक्तिगत तौर पर राहुल गाँधी की करें तो वे डरे-सहमे-झिझकते-शर्माते युवराज की छवि में कैद हो चुके हैं और लाख कोशिशों के बावजूद उस से आजाद नहीं हो पा रहे हैं (दाढ़ी बढ़ाना, बाहें चढ़ाना, स्टेज से घोषणा पत्र और प्रेस के सामने बिल फाड़ना इस छवि से आजाद होने की कशमकश का हिस्सा हो सकता है). इस के लिए उनकी चाटुकार मंडली भी काफी हद तक जिम्मेदार है जो उनके हर सही गलत का विश्लेषण राहुल के नजरिये से करती है परन्तु देश ऐसा नहीं है. बहुसंख्यक तबका राहुल गांधी के बयान को राहुल गांधी बनकर नहीं सुनता है और यही समस्या है क्योंकि निर्मम राजनैतिक विश्लेषण में राहुल गांधी का बयान कहीं ठहरता नहीं है. लेकिन इस बात को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है कि यह बयान राजनैतिक तौर पर भले ही महत्वपूर्ण ना हो लेकिन राजनीति में इसका अलग महत्त्व है. क्योंकि ऐसे दौर में जब सत्ता हर ओर से निशाने पर है और सत्ता के परोक्ष नियंत्रणकर्ता के तौर पर गांधी परिवार इस गुस्से का केंद्र हैं तो राजनीति में भावनाओं का छौंक ही कोई सहारा यहाँ दे सकता है.
और किसी मनोविश्लेषक से पूछेंगे तो कहेगा यह अचेतन मन का वह डर बोल रहा है जिसे यह लगता है कि २०१४ की लड़ाई अस्तित्व की लड़ाई है क्योंकि इस बार सत्ता परिवर्तन का मतलब गांधी परिवार के लिए सुख-सुविधाओं, सुरक्षा-व्यवस्था और रहन-सहन के तौर तरीकों में परिवर्तन भी होगा. मोदी इसका सीधा संकेत गांधी परिवार और खासकर गैर-राजनैतिक माने जाने वाले रोबर्ट वाड्रा को निशाने पर लेकर दे चुके हैं. यह उस अघोषित संधि के उलट था जिसके तहत अब तक राजनैतिक दलों के नेताओं के परिवारगणों को निशाने पर नहीं लिया जाता था. तो क्या राहुल गांधी यह मान रहे हैं कि २०१४ में सत्ता ना आई तो गांधी परिवार के आखिरी वंशज के तौर पर खतरा उनकी जान पर भी बढेगा.

Wednesday, 23 October 2013

राम जेठमलानी v/s भाजपा - बनते बिगड़ते संबंधों की एक दिलचस्प दास्तान

एक खबर आई। राम जेठमलानी ने भाजपा के संसदीय बोर्ड के सदस्यों पर पचास पचास लाख का मानहानि का दावा ठोक दिया।खबर हैरान कर देने वाली थी। उस से भी हैरान कर देने वाली थी वे प्रतिक्रियाएं जो इस मामले पर आईं। कुछ ने कहा जेठमलानी सच का साथ देते हैं। कुछ ने कहा यह केवल पब्लिसिटी स्टंट है। पहले जेठमलानी को जानना जरूरी है उसके बाद भाजपा को। तब कहीं जाकर यह सोचना वाजिब होगा कि यह केवल सनसनी फैलाने वाला मामला है या वाकई जेठमलानी गंभीर हैं?
कई पुरानी तस्वीरें जहन में उभर आई।भाजपा की पहली सरकार में मंत्री पद संभाले व्यक्ति से लेकर भाजपा में शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने के फैसले तक कुछ भी साधारण नहीं किया राम जेठमलानी ने।
अविभाजित भारत के सिंध में 1923 में जन्मे जेठमलानी सत्रह साल की उम्र में वकील बने।एक रिफ्युजी के तौर पर भारत आये जेठमलानी हमेशा चर्चा में रहे।बात चाहे हिन्दू परिवार में दो शादियों की हो या पचास के दशक में स्मगलरों का वकील कहलाने की। बड़े से बड़ा विवादास्पद और हाई प्रोफाइल केस वह लड़ चुके हैं। कई बार देशद्रोही वकील का तमगा भी मिला।इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के हत्यारों से लेकर हाजी मस्तान और अफजल गुरु तक जेठमलानी के क्लाइंट रहे हैं। हर्षद मेहता और केतन पारिख जिन्होंने भारतीय शेयर बाजार को एक अरसा उँगलियों पर नचाया भी इस लम्बी लिस्ट में शामिल हैं। कई बड़े फैसले, जो न्याय की दुनिया मील का पत्थर साबित हुए, उनकी वकील के तौर पर काबिलियत के गवाह बने। लाख विपरीत परिस्थितियों, विरोधों के बावजूद कभी लगा नहीं कि राम जेठमलानी डिग रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा, जिसने 1971 में जनसंघ के तौर पर पहली बार जेठमलानी को उल्हासनगर से टिकट दिया था और 1996 में मंत्री पद, के लिए यह हमला अप्रत्याशित भी है और परेशान कर देने वाला भी।राम जेठमलानी, जो आपातकाल के खिलाफ विरोध में भाजपा का बड़ा हथियार रहे, भले ही अटल बिहारी वाजपेयी का विशवास कभी ना जीत पाए हों पर लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी हमेशा रहे।यही कारण है कि हर भाजपा सरकार में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हीं जेठमलानी ने भाजपा और लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ ना सिर्फ बगावत शुरू कर दी बल्कि सीधा निशाना आडवाणी पर ही साध दिया।
राम जेठमलानी हमेशा दिल की बात कहने वाले और उस बात की कीमत वसूलने वाले राजनेता और वकील के तौर पर जाने जाते हैं।इसके लिए 27 जुलाई 2011 का पाकिस्तानी दूतावास द्वारा आयोजित वह रात्रिभोज याद करने की जरूरत है जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और चीनी राजदूत के सामने भारत के राज्य सभा सदस्य के तौर पर भी जेठमलानी खुले शब्दों में यह कहने से नहीं हिचकिचाए थे कि "चीन भारत और पाकिस्तान  का संयुक्त दुश्न्मन है और पाकिस्तान सरकार को यह बात समझने की जरूरत है"।
जब नितिन गडकरी पर व्यावसायिक हितों के लिए राजनीति के इस्तेमाल के आरोप लगे तो खुला विरोध करने वाले पहले शख्स जेठमलानी ही थे।इसी कड़ी में संगठन के पदाधिकारियों को लिखी कड़ी चिट्ठी के सार्वजनिक हो जाने का खामियाजा पार्टी से निष्काशन के रूप में भुगतना पडा।
अब जबकि यह जंग अदालत के दरवाजे तक पहुँच गई है देखना दिलचस्प होगा कि नतीजा भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर क्या असर डालता है?
देखना होगा भारतीय न्याय तंत्र की जड़े हिला देने वाला सबसे महँगा यह वकील क्या यही काम भारतीय राजनीति के साथ कर सकता है?

Thursday, 17 October 2013

तो सुप्रीम कोर्ट भी बिकता है?

देश में घोटाला हुआ और कोयले में लगी चिंगारी को दबाने की तमाम कोशिशें हुई, कभी जीरो लॉस थ्योरी के नाम पर तो कभी सीएजी को निशाने पर लेकर।दमघोंटू धुंआ सड़क तक आकर सत्ता की पोल खोलने लगा तो जांच भी शुरू हुई। जांच के दौरान भी रवैया वही रहा जो किसी भी केस में होता है जहाँ दांव पर बड़े रसूख वालों का रसूख लगा हो। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने कुछ आस बंधाई जब सीबीआई को पिंजरे में बाद तोता कहा गया जो भारतीय न्यायव्यवस्था और लोकतान्त्रिक भ्रष्टाचार के इतिहास में एक मुहावरा बन गया। इसके बाद कोयला घोटाले की जांच पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने लगी तो एसी कमरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी लगा कि अब सब ठीक है।
लेकिन तीन दिन पहले जब पूर्व कोयला सचिव पीसी पारिख और प्रख्यात उद्योगपति बिड़ला जांच के दायरे में आये तो बयानबाजी के कोहरे में सुप्रीम कोर्ट की छवि भी धुंधली नजर आने लगी।
पहला बयान उस अधिकारी का आया जो अपनी चालीस साल की बेदाग़ सेवा का हवाला देकर ईमानदारी की बात करते हुए सीबीआई के फैसले और रवैये पर सवाल उठा रहा था।लोकतंत्र में सत्ता के उच्चतम प्रतिष्ठान प्रधानमन्त्री पद की ओर उठती उंगली यकीनन लोकतंत्र के मुखिया की कुर्सी के पायों के बौनेपन का एहसास करा रही थी। प्रथम साजिशकर्ता के तौर पर प्रधानमन्त्री के शामिल होने का मतलब है लोकतंत्र की जीत और जो लोकतंत्र की ही नाक काटकर हासिल हुई हो। पारदर्शिता और न्यायपरकता के इस खेल में अपनी ख़ामोशी से हजारो सवालों की लाज रखने वाला पीएम जब खुद सवालों के दायरे में है तो सवालों की लाज भले ही रखी जा रही हो परन्तु लोकतंत्र की लाज का सवाल कहीं दिखाई नहीं देता।
दूसरा बड़ा सवाल उन दलों की प्रतिक्रया से पैदा हुआ जिनपर जिम्मेदारी थी इस लोकतंत्र के पहरुए बनकर सरकार को कुछ गलत न करने देने की। लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी का एहसास होने की बजाय इस बार भी रटे रटाये बयान सामने आये जो 2014 के लिए निशाना साधते दलों की कमान से निकले हर तीर पर लिखे होते हैं। तो क्या वाकई 2014 की लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण है कि लोकतान्त्रिक मर्यादा का भी उल्लंघन आसानी से किया जा सकता है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ रखने वाले दल यही जताना चाहते हैं। लेकिन जनता तक पहुँचते संकेत तो प्रधानमन्त्री के खिलाफ उमड़े गुस्से के धुएं में कहीं खो गए लगते हैं।
तीसरा और सबसे बड़ा झटका देश की राजनीति का मिजाज भी समझा गया और सत्ता पूँजी समीकरण की रासायनिक संरचना भी। लुटियंस की दिल्ली के प्राचीरों के स्वघोषित संरक्षकों ( केंद्रीय मंत्रियों) में से एक केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का बयान सर्वाधिक चौंकाने वाला था। उन्हें ना चिंता लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की हो रही छीछालेदार की थी ना सीबीआई जांचों और उठती उँगलियों के डर से हर फ़ाइल पर कुंडली मारकर बैठी नौकरशाही के आत्मविश्वास की। उनके बयान में चिंता जाहिर हुई कोर्पोरेट के ऊपर उठती उँगलियों की।इस के लिए वे सुप्रीम कोर्ट पर ऊँगली उठाने से भी बाज नहीं आये।वाणिज्य मंत्री होने के नाते उनकी चिंता वाजिब है परन्तु वाणिज्य मंत्री वे इसलिए बने क्योंकि लोकतंत्र के प्यादे कहे जाने वाले लोगों ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी। लेकिन उनके बयान से सत्ता के कार्पोरेटाना पहलू की पोल एक बार फिर खुलती नजर आई। झारखण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश से आने वाले कम से कम 80 सांसद ऐसे हैं जो केवल कारपोरेट से सम्बंधित सवाल पूछते हैं।राज्यसभा में कम से कम 65 सांसद कोर्पोरेट घरानों के सीधे सीधे नुमाइन्दे हैं।किसानों से सम्बंधित यही आंकडा आप मांगेंगे तो हम कहेंगे किसान अब नेता नहीं बनता उलटा नेता अभिनेता अक्सर किसान बनते दिखाई देते हैं और यह सामजिक जीवन का हिसा नहीं होता बल्कि टैक्स प्लानिंग का हिस्सा होता है।
एक आखिरी और सबसे बड़ा सवाल जो जनता के सामने और आया है वह है सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता का। अगर सुप्रीम की निगरानी में काम करते हुए भी सीबीआई कुछ गलत कर सकती है तब तो लोकतंत्र शब्द को भी हैरी पॉटर के खलनायक वोल्डरमोर्ट की तरह निषिद्ध कर देना चाहिए। लेकिन इस सवाल का जवाब ढूँढने की जिम्मेदारी उसी जनता की है जिसे रोज सुबह मजदूरी पर जाना होता है ताकि शाम तक घर में सब्जी रोटी का जुगाड़ हो सके।

Friday, 20 September 2013

क्या हमें संसद में एक रावण की जरूरत है? हाँ…..

बात सनातन धर्म के धर्मग्रंथों से शुरू करना चाहूँगा जिसमे देवताओं और राक्षसों का संघर्ष तो सब जानते हैं लेकिन इसका कारण बहुत कम लोग जानते हैं. रामायण के एक हिस्से में राम और रावण का संवाद इस पर रौशनी डालता है जहाँ रावण देव संस्कृति को धिक्कारते हुए उसे भोग संस्कृति करार देता है तो दूसरी तरफ खुद को रक्ष परम्परा का वाहक मानता है प्रकृति की रक्षा करने के लिए पैदा हुए हैं. राक्षस शब्द का जन्म रक्ष संस्कृति के लोगों के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है.
देवराज इंद्र और उनके दरबार में होने वाले भोग विलास की बात ना करते हुए आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आज यह सवाल वाकई महत्वपूर्ण है कि क्या यह प्रकृति संसाधन अंधाधुंध भोग के लिए है या हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे रक्षित रखना चाहिए. बात झारखंड या अन्य किसी इलाके में मिलने वाली कोयला खानों की हो या उत्तराखंड, हिमाचल में मिलने वाले जल संसाधनों की, अंधाधुंध दोहन जैसे हमारी आदत बन चुकी है. जिसके खतरनाक नतीजे पिछले कुछ दिनों में हमने उत्तराखंड में भुगते भी हैं. 5225 मृत लोगों की सरकारी सूची आने वाले कई दशकों के लिए जलप्रलय से होने वाले नुक्सान की मिसाल बनकर रहेगी.
आखिर इस अंधाधुंध दोहन के लिए जिम्मेदार कौन है? बात उत्तराखंड की करें तो अक्सर लखनऊ से पहाड़ ना दिखने की बात करते करते उत्तराखंड का निर्माण हुआ ताकि पहाड़ के विकास का मॉडल पहाड़ के हिसाब से बनाया जा सके. विकास के नाम पर मिला तो कंक्रीट का जंगल, बिना किसी योजना के अंधाधुंध लगे  औद्योगिक संयंत्र और वाहनों का शोर. वाहनों का शोर जहाँ खनिज सम्पदा को ख़त्म करने में लगा, औद्योगिक संयंत्रों ने उत्तराखंड के हिस्से में आने वाले चुनिन्दा खेती के इलाकों को ख़त्म किया, वहीँ कंक्रीट का जंगल खडा करने के लिए जीवनदायी नदियों में अवैध और अवैज्ञानिक खनन ने जोर पकड़ा. अवैध खनन को सरंक्षण मिला विधानसभाओं में बैठे माननीयों और उनके विशालकाय अंगूठे के नीचे काम करने वाले चींटी जैसे प्रशासकों का. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हुई तो प्राकृतिक न्याय की शुरुआत करते हुए प्रकृति ने इस बरसात में जो हाहाकार मचाया है वह सबके सामने है. यह सब उस राज्य में हुआ है जो खुद को गर्व से देवभूमि के नाम से प्रचारित करता है.
उत्तराखंड को उदाहरण के तौर पर लेते हुए पूरे देश को समझा जा सकता है और देश को उदाहरण मानते हुए पूरी दुनिया को. लेकिन बात केवल भारत को लेकर करें तो लगभग उत्तराखंड जैसा ही हाल झारखंड के उन इलाकों में भी है जहाँ खनिज पदार्थों के लिए वेदान्ता ग्रुप आदिवासियों पर गोलियां चलवाने से भी बाज नहीं आ रहा है. नतीजा है माओवाद का फैलता क्षेत्र, जो पूरे देश के 550 जिलों में से 278 में पाँव पसार चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि खुद को गर्व से देव संस्कृति का हिस्सा कहने वाले हम लोग क्या केवल प्रकृति का दोहन करने के लिए पैदा हुए हैं? यदि यही देव संस्कृति है तो क्या हमें जरूरत नहीं है कुछ राक्षसों की जो प्रकृति की रक्षा का वचन लेते हुए अपनी रक्ष संस्कृति कायम करें. क्या समय नहीं आ गया है कि देव संस्कृति को पुनर्परिभाषित किया जाए या पीढ़ियों पुरानी मान्यता को तोड़ते हुए गर्व से कहा जाए “हाँ, मैं राक्षस हूँ”. इसमे बुराई भी कुछ नहीं क्योंकि आज भी भारत के एक बड़े इलाके में दशहरा पर राम का पुतला जलाया जाता है और रावण को पूजा जाता है.
आखिर में उसी बुनियाद सवाल की तरफ लौटना चाहूँगा कि क्या एक व्यक्ति के प्रयासों से कोई सफलता इसमें मिल सकती है या नहीं? निराशावादी ना होते हुए कहना ठीक होगा कि सफलता मिलती तो है परन्तु यह सफलता बहुत छोटी होती है. इसके लिए संसद से उचित कानूनों का बनना और उनका पालन होना जरूरी है.तो क्या संसद से इन माननीयों (जो खुद को लोकतंत्र का देवता भी मानते हैं) को निकाल कर कुछ राक्षसों को भेजने की जरूरत है? शायद हाँ. परन्तु ध्यान रहे इस बार राक्षस असली हों देवताओं के भेष में लिपटे राक्षस तो यह लोकतंत्र पिछले ६७ सालों से देख ही रहा है.

मुजफ्फरनगर - क्या है परदे के पीछे के राजनैतिक समीकरण

मुजफ्फरनगर में जो हुआ उसकी समीक्षा सभी तरीके से की जा रही है. ऐसे में राजनैतिक पक्ष को नजरअंदाज करना गलत होगा. राजनैतिक दृष्टि से देखे तो यह दो समुदायों के बीच का मामला नहीं था. यह मामला था इलाके की उन 18 लोकसभा सीटों का जहाँ हिन्दू और मुस्लिम वोट अहम् भूमिका निभाते हैं. पिछली बार इनमे से 3-3 सीट सपा और भाजपा को तो 6 सीट बसपा, 5 राष्ट्रीय लोक दल को तो एक कांग्रेस को मिली थी.
इलाके के लोगों से बात करें तो पता लगता है सियासत को लहू का जायका कितना पसंद है. जहाँ एक ओर सत्ताधारी पार्टी सपा है तो दूसरी ओर केंद्र में सरकार की सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल. दोनों का वोट बैंक एक समुदाय विशेष से आता है. अपने अपने समुदाय विशेष को नाराज ना होने देने का दबाव होना स्वाभाविक है. लेकिन यह दबाव मुख्यमत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में चल रही सपा सरकार पर ज्यादा है.
ऐसे में अखिलेश सरकार पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने वोट बैंक के चक्कर में गुंडों की गुंडई को भी नजरअंदाज कर रही है. उत्तर प्रदेश के थानों में जाएँ तो हर वक्त एक दो गाड़ियों का सपा की झंडी लगाकर खड़े रहना यह बताता है कि प्रशासन के कामों में स्थानीय सरकारी चमचों का कितना दखल है. ये चमचे समुदाय विशेष से हों तो हत्या की रिपोर्ट सामने लाश होने पर भी पुलिस लिखने से डरती है.
यही सब तब हुआ जब कवाल गाँव में छोटी सी झड़प आपसी मारपीट में बदली और तीन जाने चली गई. यदि प्रशासन उसी वक्त कड़े कदम उठाता तो शायद बात इतनी न बढती. गाँव के ही एक व्यक्ति का कहना है यदि सरकार अपना काम करती तो राजनीति चमकाने का मौका कैसे मिलता? इसलिए पुलिस ने कुछ नहीं किया.
मजबूरन पहले पंचायत फिर महापंचायत हुई. यहाँ भी प्रशासन खामोश रहा. महापंचायत में आते लोगों पर हमला हुआ तो आने वाले वक्त की आहट किसी बहरे को भी सुनाई दे रही थी, पर सरकार को नहीं.
और अब जब बात गाँव गाँव में पहुँच गई है तो दंगों को रोकने के ढोंग किया जा रहा है. गौर से देखे तो ये दंगे ध्रुवीकरण की उसी कोशिश का एक हिस्सा थे जो पिछले एक साल से लगातार उत्तर प्रदेश में हो रही है.
क्षेत्र के राजनैतिक पंडितों की बात पर यकीन करें तो अल्पसंख्यक समुदाय के दिलों में अतिसुरक्षा की भावना बनाए रखना सपा की राजनैतिक मजबूरी है. इसी लिए कई मौकों पर तुष्टीकरण की नीति साफ़ दिखाई देती है. ऐसे में इन बिगड़ते हालात का गणित शुरुआत में सपा के पक्ष में था. ख़तरा होगा तो बचाव करने वाला हीरो भी कहलायगा. लेकिन ऐसी राजनीति करना अक्सर शेर की सवारी जैसा होता है, जिसमे सही समय पर शेर से उतरना जरूरी होता है. इसमे सपा नाकाम रही है. इलाके के राजनैतिक गणित को देखें तो जहाँ इन दंगो की शुरुआत से सपा को फायदा होने वाला था वहीँ इनके चलते रहने से अब फायदा अन्य पार्टियों को मिलता दिख रहा है. ऐसे में सपा लाख कोशिशें करें इस बिगड़ते माहौल का अभी सुधरना मुश्किल है. ऐसा भी संभव है पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही इन तनाव की चपेट में आ जाए.
इन दंगों के शिकार चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, लेकिन नुक्सान उसी का हुआ है जो दंगो से बचना चाहता है. दंगों की शुरुआत करने वाले और दंगों को संचालित करने वाले तो अब भी बचे हैं, महफूज हैं. इस देश में यदि आप ‘राजनैतिक’ हिन्दू या मुसलमान हैं तो आप के सब गुनाह इस समीकरण के आधार पर माफ़ कर दिए जाते हैं कि सरकार कौन सी है. बशीर बद्र की बात सही महसूस हो रही है…..
हिन्दू भी मजे में है मुसलमां भी मजे में,
इंसान परेशान यहाँ भी है वहां भी.
एक साथी पत्रकार के अनुसार लखनऊ के निवासी कैलकुलेटर लेकर बैठे हैं. जब तक दंगों के कारण खराब हुई छवि से खोये गए वोट, ध्रुवीकरण से मिलने वाले वोटों से कम होंगे यह खेल चलता रहेगा.

Wednesday, 18 September 2013

राजनीति के महाभारत में धृतराष्ट्र काल है ये

इतिहास लिखे जाते समय सदियाँ अक्सर पन्नों में सिमट जाती है और पूरे साम्राज्य का नाश कर देने वाले जयचंद केवल एक पंक्ति. लेकिन बात जब महाभारत की हो तो यह गौरव ध्रतराष्ट्र को प्राप्त नही होता. अभी हाल में ही हुए एक सर्वे में ध्रतराष्ट्र को महाभारत का सबसे घ्रणित पात्र बताया गया है. दुर्योधन से भी ज्यादा! आखिर ऐसा क्या है जो सौ कौरवों के पिता, एक-पत्निव्रता ध्रतराष्ट्र को उस दुर्योधन से अधिक घ्रणित बना देता है जिसने महाभारत की नींव रखी. सर्वे में जब यही सवाल पूछा गया तो अधिकतर जवाब एक से आये. महाभारत में भले ही ध्रतराष्ट्र ने किया कुछ न हो लेकिन हुआ सब उनकी देखरेख में. ऐसे में ध्रतराष्ट्र ने मौन रहते हुए उन सब गलत चीजों को समर्थन दिया जिसे रोकना उनका फर्ज था.
गौर से देखें तो भारतीय राजनीति का भी यह ध्रतराष्ट्र काल है. फर्क बस इतना है कि इस दौर में ध्रतराष्ट्र एक से ज्यादा है. ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौरवों की संख्या भी सौ से अधिक ही होगी. भारत में सरकार से लेकर हर पार्टी का अपना एक ध्रतराष्ट्र है. बात सबकी करेंगे शरुआत सरकार से:-
सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह शुचिता के ध्वजवाहक भी माने जाते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के पुरोधा भी. उनके द्वारा १९९१ में शुरू की गई वह पहल, जिसमे मुक्त बाजार को देश की तरक्की में साझेदार माना गया था, आज दम तोडती दिख रही है तो इसके लिए उन्ही के साथ रहने वाले कौरव जिम्मेदार हैं. आखिर क्या कारण हैं जिसने एक अच्छी शुरुआत के रूप में चले आर्थिक सुधारों के दौर को देश बेचने के लिए लगने वाली बोली में तब्दील कर दिया. क्यों मनमोहन सिंह उस भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रहे हैं जिसे रोकने की बात वह लाल किले से लगातार करते रहे हैं. क्या है ऐसा कि मनमोहन के दम पर कांग्रेस उसी शुचिता, इमानदारी और बेदाग़ छवि का दावा करते हुए चुनाव जीती जिसे उसके अपने मंत्रियों ने तार तार किया. क्यों मनमोहन सिंह ध्रतराष्ट्र बने देश को बिकते हुए देख रहे हैं जब कि बहुसंख्यक आबादी भुखमरी का शिकार है. इस पर बात रखने के लिए शायद लेखन की एक श्रंखला भी कम पड़े इसलिए अगले ध्रतराष्ट्र पर चलते हैं.
बात भाजपा की करें तो यही भूमिका संयुक्त रूप से नरेन्द्र मोदी और लाल कृष्ण आडवानी के पास है. आडवानी अपनी भूमिका से किनारा करने की कोशिश में खुद को भीष्म पितामह घोषित कर चुके हैं. ऐसे में मोदी पर सबकी निगाहे हैं और खुद मोदी की निगाह प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर है. नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री की कुर्सी कब्जाने की कोशिश में माया कोडनानी, बाबू बजरंगी, विट्ठल रादडीया, जस्टिस आर के मेहता की ओर से आँखें मूँद कर पूरी तरह ध्रतराष्ट्र की भूमिका में रम चुके हैं.
लेकिन बात यहीं नहीं थमती है. बात किसी भी पार्टी की कर लें. नाम लें या ना लें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहीं किसी परिवार के चार या पांच लोग पार्टी पर काबिज है तो कहीं परिवार के बजाय चार या पांच चेहरे पूरी पार्टी की राजनीति तय करते हैं. यही चार पांच लोगों का कोकस पार्टी संविधान और पार्टी कार्यकर्ताओं को नजर अंदाज करते हुए पार्टी की विचारधारा तय करता है. शायद भारतीय लोकतंत्र को पुरानी राजनैतिक कहावतों से पार जाने में अभी वक्त लगेगा जिनमे से एक कहावत “नेताजी रहें शासन में, कार्यकर्ता अनुशासन में” भी है. आम कार्यकर्ता की पार्टी नेतृत्व से यह दूरी लोकतंत्र के लिए घातक भी है और भविष्य के लिए जहर भी.
शायद ध्रतराष्ट्र युग की राजनीति अभी और चले. इन्तजार कीजिये लोकतंत्र की इस द्रौपदी के चीरहरण के आखिरी पल का जब कोई कृष्ण अवतरित हो. या शायद अट्ठारह दिनी महाभारत ही इसका इलाज हो, लेकिन लोकतंत्र में सत्ता बन्दूक की नली से आये तो नतीजे भी घातक ही होते हैं. इसलिए माओवाद से कहो कुछ धैर्य रखे. लोकतंत्र की शांतिवार्ता जारी है.

Thursday, 12 September 2013

मुजफ्फरनगर- जलते चौराहों, सुलगते अंधेरों का सच



मैं मुजफ्फरनगर हूँ. आप सभी पिछले कई दिनों से मेरी खोज खबर निकालने के लिए परेशान हैं तो मैं खुद भी अपने जलते बदन, सुलगते जख्मों को अनदेखा करते हुए आप के सामने पेश होने आया हूँ. इल्जाम तो कई हैं मुझ पर. जैसे मैंने पूरे प्रदेश को साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया है. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मुजफ्फरनगर के इतिहास में यह आम बात है. और भी न जाने कितने तरीके के इल्जाम मेरे ऊपर लग रहे हैं. काश! इल्जाम लगाने वाले यह भी सोच लेते कि बुरे वक्त की आग में जलता एक शहर उनके इल्जामों से और जलन महसूस करेगा. खैर अपना बयान देने आया हूँ. कोशिश करूंगा हर वो बात जो जानने लायक है आप तक पहुँचाऊं. आप के बीच आने का एक बड़ा कारण यह भी था कि सूचना क्रांति के दौर में आधी अधूरी जानकारी देने वालों की जबान पर लगाम लगा सकूँ.
मैं छोटा सा एक जिला हूँ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का. आबादी की बात करें मिली जुली आबादी है. कहीं मुस्लिम अधिक हैं तो कहीं हिन्दू. हिन्दुओं में भी जाट बहुत इलाका है. पहले कभी सोचा नहीं था कि मेरे बाशिंदों को उनके धर्म के नाम से गिना जायगा लेकिन खैर! अब तो कह रहे हैं जाति के आधार पर भी गणना चल रही है. हो भी क्यों न? बात धर्म और जाति की होगी तो राजनेताओं को काम करने की बजाय धर्म की चार बातें करने पर वोट जो मिल जाते हैं.
पिछले कुछ दिनों से जलते मकानों, जलती दुकानों के धुंए से परेशान हूँ. बीच बीच में चलती गोलियां भी सिरदर्द बढ़ा रही हैं. सेना आई तो है मगर गोलियों की गडगडाहट का स्थान अब बूटों की खडखडाहट ने ले लिया है और मैं न तब सो पाता था न अब सो पाता हूँ.
गौर से देखूं तो कारण समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू हुआ यह सब. अखबार तो यह कह रहे हैं कि मेरे एक गाँव के कुछ जवान लडको ने मेरी अपनी किसी बेटी से बदतमीजी की. पुलिस ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की तो लड़की के भाइयों ने आरोपी लड़के को उसी के मोहल्ले में जाकर धमकाया. बात आगे बढ़ी हाथापाई तक पहुंची तो लड़की के भाइयों ने उस लड़के को छुरा घोंप दिया. बाद में लड़की के भाइयों को भीड़ ने मार दिया. मेरे लिए यह कोई नई बात नही थी. यह तो ऐसे इलाकों में रोज होता है जहाँ के लोग आन बान शान के नाम पर जान देने को उतारू हों और प्रशासन निकम्मा हो. ऐसे में लोग अपने झगडे अक्सर सड़कों पर ही सुलझा लेते हैं. नतीजा मारपीट, गोलीबारी, ह्त्या में से कुछ भी हो सकता है. शायद इसीलिए अखबार कहते हैं कि एशिया में मुजफ्फरनगर का अपराध सूचकांक सबसे अधिक है. खैर!
यहाँ तक मामला पूरे तरीके से दो परिवारों के बीच में था यदि दो अलग अलग समुदायों के नेता दोनों परिवारों की तरफ से लड़ने के लिए ना आते. दो अलग समुदायों के परिवारों के पैरोकार दो अलग पार्टियों के नेता बने तो अनजान सी लड़की की छेड़छाड़ का मामला हिन्दू और मुस्लिम अस्मिता का मामला बना दिया गया. महापंचायत के बुलाने की बात हुई. प्रशासन एक बार फिर मौन था. सुरक्षा के इंतजाम नहीं किये गए. महापंचायत हुई. दो घरों की लड़ाई को सुलझाने पूरे प्रदेश से 70000 लोग आये. नहीं नहीं! वो दो घरो की लड़ाई सुलझाने नहीं आये थे वो तो अपने धर्म की अस्मिता बचाने आये थे. महापंचायत के बाद तनाव बढ़ा, जाते हुए काफिले पर पत्थरबाजी हुई. नतीजा आप सबके सामने है.
अखबार कह रहे हैं २५ लोग मरे हैं. टीवी कह रहा है ३० मरे हैं. यह कोई नही कह रहा कि जिन धर्मों को बचाने का दावा ये सियासती पैरोकार कर रहे थे वो दोनों धर्म भी मरणासन्न हालत में मेरे चौराहों पर पड़े हैं. कोई तो आये अब उन्हें बचाने. अब कोई नही आएगा. क्योंकि अन्दर की तस्वीर केवल मैं जानता हूँ.
सियासत की बुरी नजर लगी है मुझे. आधी आधी आबादी दो अलग अलग धर्मों की होने के कारण मेरी राजनीति जो कभी मुद्दों पर चला करती थी, अब ध्रुवीकरण की मोहताज बनकर रह गई है. इन दंगों का दोष तो महापंचायत को दिया जा रहा है लेकिन मुझे याद आते हैं वो दौर जब अग्रेज सरकार ने मेरे बाजार में स्थित एक मस्जिद को ढाने का फैसला लिया था तो ऐसी ही महापंचायत कर हिन्दुओं ने उस मस्जिद की रक्षा की कसम ली थी और २७ लोगो की शहादत के बाद अंग्रेज सरकार हार गई थी. आज भी वह मस्जिद अपनी जगह कायम है. ऐसे में वही लोग क्यों आपस में लड़ने लगे. तह में सियासत है.
बात अभी की करूँ तो सेना के बूटों तले सांस रोके पडा हूँ. जख्मों की जलन ना दिन को सोने देती है ना रात को. कर्फ्यू में घरों से रोते बच्चों की आवाजें कानों को परेशान कर रही है. आखिर घरों में राशन पानी जाने के लिए भी तो कर्फ्यू खुलना चाहिए. बस दुआ कीजिये कि सियासत के पेट की भूख मिट गई हो. ठीक हो जाऊँगा तो फिर आउंगा आप सब के बीच अभी तो इजाजत दीजिये. गोलियों की आवाज मेरा इन्तजार कर रही है.
-आपका अपना मुजफ्फरनगर