Monday, 14 July 2014

असली हीरो कौन? अन्ना, अरविन्द, आर.एस.एस., भाजपा या नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी?

यह हमेशा से होता आया है कि किसी भी मशीन का सॉफ्टवेयर उसके हार्डवेयर को संचालित करता रहा है और सॉफ्टवेयर के दोषों से हार्डवेयर अपनी तमाम ताकत के बावजूद पार नहीं पा सका। इंसान में इंसानी दिमाग सॉफ्टवेयर की भूमिका में होता है। हम किसी भी घटना, व्यक्ति या प्रसंग का विश्लेषण अपनी मानवीय कमजोरियों के साथ ही करते हैं और अक्सर कमजोर विश्लेषण ही हमारे कमजोर भविष्य को जन्म देते हैं।
यह भारतीय लोकतंत्र के साथ भी होता रहा है। आज नरेन्द्र मोदी भाजपा के सर्वोच्च नेता और भारत के प्रधानमंत्री के रूप में हमारे सामने हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सफ़र में अहम् भूमिका निभाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। भारत का भविष्य मोदी सरकार, भाजपा और RSS के क्रियाकलापों पर निर्भर करता है। पर क्या यह पूरा सच है? क्या वाकई ये तीनों ही भारतीय लोकतंत्र के इस ऐतिहासिक जनादेश के नायक है? या कुछ और भी है जिसे इसका श्रेय जाना चाहिए लेकिन संकुचित दृष्टि से इतिहास लिखने के अभ्यस्त हम लोग ऐसा करने से डर रहे हैं? क्या यह डर इसलिए है कि वह व्यक्ति या वह दौर अभी गुजरा नहीं है और भविष्य अनिश्चित है, अगर हमने आज उसे श्रेय दिया तो कल वह बड़ा खतरा बनकर सामने न आ जाय?
याद कीजिये 2004 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद के लगभग 11 साल। एक ओर जहाँ यूपीए लगातार बेहतर 2009 तक बेहतर प्रदर्शन करती रही, वहीँ दूसरी और विपक्ष लगातार या तो मैदान से नदारद रहा या अपने ही पाले में गोल करता रहा। यह वही समय था जब छह साल सत्ता सुख भोग चुके भाजपा नेता सड़क से नाता तोड़ कर एसी कमरों में बैठे इस बात का इन्तजार कर रहे थे कि जनता एक दिन यूपीए से नाराज होगी और उनकी बारी आएगी। यहाँ तक कि 2009 के बाद जब यूपीए ने गलतियाँ करनी शुरू की तब भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा आपसी संघर्ष में ही उलझी रही, यक़ीनन जनता से कोई रिश्ता इस पार्टी का नहीं था और इस रिश्ते को बनाने की कोई कोशिश भी नहीं हो रही थी।
ऐसे में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस के सामने पहली मुश्किल 2011 की शुरुआत में आई थी जब रालेगनसिद्धि का एक बुजुर्ग दिल्ली के जंतर मंतर पर आकर सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठा था। मुद्दा था भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत कानून। न्यूज चैनल्स ने इसे खूब उछाला और चार दिन में ही मामले की गंभीरता को परखते हुए यूपीए सरकार ने कानून के लिए बनी ड्राफ्टिंग कमेटी में सिविल सोसायटी के पांच लोगों को रखा। यह एक शुरूआती और बड़ी जीत थी और इस जीत में किरण बेदी, स्वामी रामदेव, प्रशांत भूषण, स्वामी अग्निवेश इत्यादि सभी लोगों ने अपनी अपनी भूमिका निभाई मगर इस जीत का आर्किटेक्ट एक नौजवान आरटीआई कार्यकर्ता था जिसका नाम अरविन्द केजरीवाल था। अरविन्द की ताकत केवल तीन चीजें थी - जनता के बीच रहकर उनके जैसा बनकर सत्ता को ललकारना, अपने आन्दोलन से बड़े बड़े नामों को जोड़ते रहना और उनकी एक आन्दोलनकारी के रूप में फैसले लेने की अद्भुत क्षमता जिसके सामने सरकार नतमस्तक नजर आई।
इसके बाद भी विपक्ष सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने में नाकामयाब रहा जिसका बड़ा कारण लगभग सभी पार्टियों में व्याप्त भ्रष्टाचार था। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, डीएमके, एआईडीएमके, एनसीपी सभी पार्टियां इस हमाम में नंगी भी थी और साझेदार भी।
अप्रैल 2011 के बाद अगस्त 2011 में जब आन्दोलन हुआ तो अन्ना देश भर में जाना पहचाना नाम थे और जनाक्रोश भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ था। इस जनाक्रोश को अन्ना में अपना हीरो नजर आ रहा था, भाजपा में नहीं। उस दौर में जनता सड़क से कानून बनाने की कोशिश कर रही थी यह विपक्ष की नाकामी का नतीजा भी था और विपक्ष से जनता की नाउम्मीदी का सुबूत भी। सरकार ने यह कानून बनाने का भरोसा भी जनता को दिया और बाद में धोखा भी।
अन्ना आन्दोलन सफल रहा या असफल यह चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन यूपीए सरकार के खिलाफ जनता में गुस्सा भरने का काम इस आन्दोलन ने किया इसमें कोई शक नहीं। इस गुस्से की आग में घी का काम सरकार के मंत्रियों के लगातार उजागर होते घोटालों और उनके लगातार बढ़ते अहंकार ने किया। अन्ना आन्दोलन में कई बार टूट भी हुई और यह अपना रास्ता बदलकर पार्टी भी बन गया। अरविन्द यहाँ भी वही करते रहे जो उन्होंने अन्ना आन्दोलन में किया - जनता से जुड़ना (मिशन बुनियाद), नए नए लोगों को पार्टी से जोड़ना (योगेन्द्र यादव, मेधा पाटेकर और बहुत से बड़े नाम) और चौंकाने वाले निर्णय लेते रहना (केवल दिल्ली में चुनाव लड़ना, टोपी और झाड़ू को पार्टी की पहचान बनाना)।
2012 की शुरुआत में जब आम आदमी पार्टी ने पांच राज्यों में से केवल दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो देश जैसे दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ दिल्ली का माहौल दूसरी तरफ पूरे देश का। फिर भी इन दोनों में एक चीज समान थी जनता में कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टियों के खिलाफ लगातार बढ़ता गुस्सा और कांग्रेस के खिलाफ इस लड़ाई में भाजपा के प्रति अविश्वास। दिल्ली और पूरे देश के माहौल में अंतर यह था कि दिल्ली को विकल्प मिल गया था जबकि देश को अभी भी विकल्प की तलाश थी।
कांग्रेस के खिलाफ विकल्प बनना अरविन्द केजरीवाल के लिए आसान नहीं था इसके लिए उन्हें एक तरफ दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ बिजली पानी आन्दोलन करना पड़ा दूसरी तरफ इस लड़ाई को आम आदमी बनाम कांग्रेस बनाने के लिए उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाये और सुबूतों के साथ इनका खुलासा भी किया। 2012 के मध्य तक हालात यह थे कि एक ओर एक साल से भी कम पुरानी पार्टी जहाँ खुद को 120 साल पुराणी पार्टी का प्रतिद्वंदी साबित करने में कामयाब हो रही थी वहीँ देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता बिजली पानी के मुद्दों पर घडियाली आंसू बहा रहे थे। इसके बाद माहौल में बदलाव आना शुरू हुआ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वरदहस्त प्राप्त नरेन्द्र मोदी गुजरात मुख्यमंत्री के तौर पर आशाओं भरा रिपोर्ट कार्ड लेकर दिल्ली आये और गुटबाजी में फंसी भाजपा को आर.एस.एस. के डंडे के डर से नरेन्द्र मोदी के पीछे खड़ा होना पड़ा।
लेकिन तब भी दिल्ली के लोग अपना हीरो भाजपा के किसी नेता की बजाय अरविन्द केजरीवाल में देख रहे थे, इसे समझते हुए भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार विजय गोयल की जगह डा. हर्षवर्धन को बनाया और आम आदमी पार्टी की तर्ज पर हर विधानसभा सीट के लिए अलग घोषणा पत्र भी बनाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी अरविन्द केजरीवाल की पार्टी लगातार जनता और भाजपा दोनों को चौंकती रही। भाजपा हर बार चौंकने के बाद आम आदमी पार्टी की नक़ल करने की कोशिश करती तो आम जनता अरविन्द केजरीवाल के और करीब हो जाती। चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए भी चौंकाने वाले थे और शायद आम आदमी पार्टी के लिए भी। इसीलिए इसके बाद आम आदमी पार्टी के नेता जहाँ लगातार विवादों भरे फैसले लेते रहे वहीँ भाजपा नरेन्द्र मोदी के पीछे लामबंद और एकजुट होकर लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई।
लोकसभा चुनाव से कहीं पहले अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को जनता के सामने खलनायक साबित कर चुके थे मगर दिल्ली चुनाव के बाद हुई अपनी भूलों के कारण खुद को विकल्प के तौर पर पेश नहीं कर पाए। यह करने में नरेन्द्र मोदी कामयाब रहे और आज वे प्रधानमंत्री हैं। लेकिन फिर जनजागरण का श्रेय अन्ना आन्दोलन, अन्ना टीम और ख़ास तौर पर अरविन्द केजरीवाल को जाता है। यह शायद इतिहास में दर्ज न हो पाए क्योंकि इतिहास विजेताओं के नजरिये से लिखा जाता है और विजेता इस वक्त भाजपा है।

Friday, 4 July 2014

मोदी सरकार, कितनी असरदार?




हम भारतीय मूल रूप से चर्चा, आलोचना, समाज सुधार इत्यादि बातों में समय बिताना पसंद भी करते हैं और यह करते हुए गौरवान्वित भी महसूस करते हैं, बशर्ते यह आलोचना और सुधरने की प्रक्रिया व्यक्तिगत रूप से हमारे ऊपर लागू न होती हो. चौबीसों घंटे के मीडिया चैनल इस मानवीय कमजोरी की आग में ईंधन का सतत प्रवाह करने को संकल्पबद्ध है, भले ही यह आग उनकी अपनी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह ही क्यों न लगाती हो. इस प्रश्न चिन्ह के सैकड़ों पुख्ता सबूत और प्रकरण आपको जरा सी मेहनत से मिल जायेंगे, ताजा उदाहरण बदायूं केस है जहाँ मीडिया ने इस मामले में न केवल अखिलेश सरकार को कठघरे में खड़ा किया बल्कि उत्तर प्रदेश को बलात्कार प्रदेश बताने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन जब बात सीबीआई जांच तक आई तो मामला ऑनर किलिंग की थ्योरी पर जाकर सिमटने लगा. (मैं यहाँ न तो अखिलेश सरकार की तारीफ कर रहा हूँ न ही ऑनर किलिंग को रेप से बेहतर स्थिति बताने की कोशिश है, मुद्दा मीडिया द्वारा बिना जांच किये उतावलेपन में अधपकी खबरें चलाना है जिसमे सरकार या उसके नुमाइंदे निशाने पर हों.) ज़रा पीछे मुडकर देखें तो पूरे बयान में से एक छोटा सा हिस्सा प्रसारित कर 'टंच माल' को राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बना देना (जहाँ दिग्विजय सिंह कांग्रेस सांसद मीनाक्षी नटराजन की तारीफ करते हुए उन्हें सौ प्रतिशत खरा इन्सान कह रहे थे), मनोहर पर्रीकर के ताजा बयान पर उठे विवाद समेत सैकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे जिनकी चर्चा तो घंटों, दिनों महीनों और शायद सदियों तक भी संभव है, लेकिन समाधान की गुंजाइश केवल मीडिया और हमारे अपने अन्दर से है. 

मीडिया और समाज की इसी कमजोरी का शिकार कुछ दिनों पहले तक जनभावनाओं और जनाकान्क्षाओं का प्रतीक बनी मोदी सरकार भी बन रही है. सरकार बने अभी जुम्मा जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए हैं कि सवाल उन मामलों को लेकर उठने लगे हैं जिनका समाधान कई दशकों में जाकर होता है. मीडिया के एक मित्र से बात हुई तो उनकी तरफ से तर्क यह गढ़ा गया कि मुद्दों को एक समय-सीमा में हल करने का दबाव ही लोकतंत्र में सरकारों को काम पर लगाए रखता है. लेकिन जब सवाल यह किया गया कि चौतरफा आलोचना के दबाव में अगर सरकार का आधा वक्त सफाइयां देने और अपना पक्ष रखने में ही गुजरने लगे तो काम कब होगा, वे महानुभाव खामोश हो गए. खैर! हम यहाँ बात एक एक मुद्दे पर करेंगे जिनको लेकर पिछले कुछ दिनों में मोदी सरकार आलोचना के केंद्र में रही.

महंगाई का मुद्दा चिरजीवंत और चिरनूतन है. सरकार कोई भी हो, देश और काल कोई भी हो, सार्वजनिक चर्चा के अवसर उपलब्ध हैं तो महंगाई हमेशा एक मुद्दा रही है. महंगाई के मानक और इसके घटक अनंत है लेकिन फिर भी लोकतंत्र के ज्ञात इतिहास में कोई ऐसी सरकार याद नहीं आती जिसने महंगाई को कम करने में सफलता पाई हो. (यहाँ महंगाई का अर्थ वही है जो हम में से अधिकतर लोग आसानी से समझते हैं, मूल्यवृद्धि) आलू प्याज के दाम बढे और सरकार निशाने पर, जबकि यह हर साल होता है. इन्ही एक दो महीनों में इन खाद्य पदार्थों के दाम अक्सर बढ़ते रहे हैं. इसके पीछे कारण मौसमी प्रभाव, जमाखोरी, सरकार के स्तर पर कमजोर खाद्यान भंडारण और वितरण प्रबंधन शामिल है. लेकिन अचानक होने वाली यह मूल्यवृद्धि कोई नई बात नहीं है. इस बार केवल एक बात नई थी, सरकार की अतिसक्रियता. जैसे ही सरकार को मानसून की कमजोरी और संभावित मगर अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि की भनक लगी, प्रधानमंत्री कार्यालय हरकत में आया और सम्बन्धी मंत्रियों और अधिकारियों की एक बैठक बुलाकर सूखे और खाद्यान्न संकट से निपटने के उपाय मांगे गए. प्रस्ताव पहुंचे और अगले दो घंटे में उन पर अमल शुरू हो गया. यही नहीं, उसके पंद्रह दिन बाद एक दूसरी बैठक भी बुलाई गई जिसमे अब तक हुए उपायों और कामों पर चर्चा और समीक्षा की गई. इतनी सक्रियता, वह भी उच्च स्तर पर, मगर मीडिया के कैमरों से कहीं दूर. अभी तो सरकारी अधिकारी भी इस कार्यशैली की आदत नहीं दाल पा रहे हैं कि महीनों में होने वाले निर्णय घंटों में होने लगें. प्याज संकट गहाराता इसके पहले ही वित्त मंत्री अरुण जेटली भी सक्रिय हुए और सम्बंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगाने सम्बन्धी नियमों में तत्काल संशोधन कर दिया गया. हालांकि केवल इतना पर्याप्त नहीं है खाद्य पदार्थों की महंगाई रोकने के लिए कृषि नीति, भंडारण नीति, वितरण नीति में संशोधन के साथ राज्यों का सहयोग भी चाहिए लेकिन फिर भी असर दिखने लगा है आप भी आलू-प्याज खरीदने जायेंगे तो महसूस करेंगे. पहले जहाँ आलू प्याज के बढ़ते दामों की चर्चा कई कई हफ़्तों तक चलती थी, वहीँ इस बार यह मुद्दा मीडिया चैनलों पर केवल कुछ दिन का मेहमान बनकर रह गया.

यही हालात रेल किरायों और पेट्रोल डीजल में मूल्य वृद्धि के सन्दर्भ में है. एक ओर तो हम बुलेट ट्रेन चलाने के सपने  देखते हैं दूसरी ओर रेल किराए के नाम पर रेलवे को कुछ देना नहीं चाहते. याद रखें, बुलेट ट्रेन बुरादे पर नहीं चल सकती. भारतीय रेल को महंगा कहने वालों को सीएमके रिपोर्ट २०१२ पढनी चाहिए जिसके अनुसार रेल किराए के मामले में भारत केवल छः देशों से ऊपर है और यूरोप देशों में तो भारत के मुकाबले २० गुना अधिक तक किराया वसूला जा रहा है, यही उनकी ओर से प्रदान की जाने वाली बेहतरीन सेवा के लिए समुचित संसाधन भी उपलब्ध कराता है. रेलवे को योजनाओं के लिए धन चाहिए. पेट्रोल डीजल मूल्य वृद्धि पर भी लगभग यही तर्क मैं दोबारा नहीं रखना चाहूँगा लेकिन इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इराक वार इत्यादि बहुत से बातें मोदी सरकार के बस में भी नहीं हैं.

यहाँ यह भी समझना होगा कि सामान्य वस्तुओं में मूल्य वृद्धि एक साधारण आर्थिक क्रिया है जो लगातार चलती रहती है. किसी भी सरकार की कुशलता को नापने का पैमाना उसका मूल्य वृद्धि पर नियंत्रण कर पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि सरकार की कुशलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था में नौकरी के कितने अवसर (सरकारी और गैर-सरकारी दोनों) उपलब्ध करा पाती है? मूल्यवृद्धि रोकने को पैमाना बनाना बिलकुल ऐसा ही होगा जैसे हम किसी चालक की योग्यता इस बात से पता करें कि वह वाहन को कितनी देर तक एक जगह पर रोक कर रख सकता है. यह एक हल्का उदाहरण है मगर बात केवल प्रतीक की है. साथ ही यह भी ध्यान रखें कि अर्थव्यवस्था का कायापलट कोई एक दिन या कुछ महीनों में होने वाला काम नहीं है, इसके लिए हमें धैर्य रखना होगा.

सरकारी खजाने के खाली होने के तर्क के विरोध में खड़े लोग यह कह सकते हैं कि खजाना ही भरना है तो देश के प्राकृतिक संसाधनों और पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि के मुख्य कारक बने चौपहिया वाहनों पर टैक्स (एक्साइज और रोड) बढ़ाकर इस खजाने की पूर्ति की जा सकती है यह गरीब लोगों के हित में भी होगा और पर्यावरण के हित में भी, क्योंकि इससे कम वाहन बिकेंगे. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि किसी भी देश में कार्पोरेट क्षेत्र को झटका देने वाला यह फैसला असंभव सा है और इसे असंभव बनाता है सत्ता का चरित्र जिसका शिकार हर सरकार बनती है और मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है.

आखिर में केवल यही कहना चाहूँगा कि किसी भी देश की हुकुमत दृश्य और नियंत्रित ताकतों से ज्यादा अदृश्य और अनियंत्रित ताकतों पर निर्भर करती है और यह सिद्धांत भारत पर भी लागू होता है. अच्छे दिनों के इन्तजार में तीन दशक बाद स्पष्ट जनादेश देने वाले लोगों को शायद अभी कुछ और बुरे दिन देखने पड़ें. कमजोर मानसून (फलस्वरूप कमजोर खेती, जल संकट, बिजली संकट), अधपका बजट, खाड़ी संकट और तिस पर चौबीसों घंटे की बेपाया आलोचना का दबाव ऐसा कर सकता है. याद रखें, दिल्ली सदन में बैठे सर्वोच्च व्यक्ति के हाथों में जादू की छड़ी नहीं है (यह जुमला यूपीए-2 से उठाया लग सकता है) और सरकार या उसका मुखिया कोई भी हो वह न तो बारिश करवा सकता है न ही इराक की लड़ाई को रोक सकता है. इसलिए इन्तजार रखें, भरोसा बनाये रखें क्योंकि अभी कम से कम एक साल बाद ही आज लिए गए फैसलों का असर दिखेगा और कुछ का असर दिखने में तो शायद इससे कहीं अधिक वक्त लग जाए.