उम्मीद
है सीए/इंजीनयर/डॉक्टर/लेखक/अध्यापक/साधारण
व्यक्ति होने के नाते आपको
मेडिकल साइंस, अध्यात्म, मनोविज्ञान, फिजिक्स
और केमिस्ट्री की अच्छी जानकारी
जरूर होगी. (just
kidding)
बात मेडिकल साइंस की करें तो सर्वविदित है कि शरीर में पैदा होने वाले सभी भाव,विचार, रोग शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल स्त्राव से नियंत्रित होते हैं. हर व्यक्ति का व्यवहार उसके शरीर के अंदर के हार्मोन्स पर निर्भर करता है जिसे बाबा राजकुमार हिरानी जी ने केमिकल लोचा कहकर परिभाषित किया है (मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. अध्याय दूसरा श्लोक तीसरा). इस तरह इंसानी स्वभाव को समझते-समझते मेडिकल साइंस, फिजिक्स और केमेस्ट्री में बदल जाती है क्योंकि जिस हार्मोन से इंसान का स्वभाव और व्यवहार नियंत्रित हो रहा है वह कम से कम दो रसायनों की एक निर्धारित वातावरण में तय नियमों के तहत हुई अन्तरक्रिया का उपोत्पाद है. इसका मतलब अगर हमारा नियंत्रण रसायनों और परिस्थितियों पर हो तो अधिकतर परिस्थितियों में इंसानी स्वभाव को नियंत्रित करना संभव है. लेकिन यह बात कहनी जितनी आसान है करनी उतनी ही मुश्किल है और यहीं से मेडिकल साइंस आध्यात्म और कॉस्मिक/प्लूटोनिक एनर्जी के सामने घुटने टेकती नजर आती है.
बात मेडिकल साइंस की करें तो सर्वविदित है कि शरीर में पैदा होने वाले सभी भाव,विचार, रोग शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल स्त्राव से नियंत्रित होते हैं. हर व्यक्ति का व्यवहार उसके शरीर के अंदर के हार्मोन्स पर निर्भर करता है जिसे बाबा राजकुमार हिरानी जी ने केमिकल लोचा कहकर परिभाषित किया है (मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. अध्याय दूसरा श्लोक तीसरा). इस तरह इंसानी स्वभाव को समझते-समझते मेडिकल साइंस, फिजिक्स और केमेस्ट्री में बदल जाती है क्योंकि जिस हार्मोन से इंसान का स्वभाव और व्यवहार नियंत्रित हो रहा है वह कम से कम दो रसायनों की एक निर्धारित वातावरण में तय नियमों के तहत हुई अन्तरक्रिया का उपोत्पाद है. इसका मतलब अगर हमारा नियंत्रण रसायनों और परिस्थितियों पर हो तो अधिकतर परिस्थितियों में इंसानी स्वभाव को नियंत्रित करना संभव है. लेकिन यह बात कहनी जितनी आसान है करनी उतनी ही मुश्किल है और यहीं से मेडिकल साइंस आध्यात्म और कॉस्मिक/प्लूटोनिक एनर्जी के सामने घुटने टेकती नजर आती है.
ज्योतिष/आध्यात्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय विभिन्न ग्रहों की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव, उसकी शारीरिक एवं मानसिक संरचना और क्षमता पर पड़ता है, इसी आधार पर कुंडली बनाई जाती है. (कुंडली विज्ञान कितना सही इस पर एक अलग बहस हो सकती है लेकिन आप चाहे तो विभिन्न क्षेत्रों में विख्यात/कुख्यात व्यक्तियों की कुंडली देख सकते हैं जो उनके कार्यक्षेत्र और उनकी प्रतिभा के आधार पर लगभग एक सी ही दिखाई देंगी,आप चाहें तो इसे भी संयोग मात्र कहकर ख़ारिज कर सकते हैं)
यानी व्यक्ति के विभिन्न परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने का क्रम उसके जन्म के समय से ही तय हो जाता है. इस तरह देखा जाए तो व्यक्ति के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाएँ पूर्व-निर्धारित होती हैं अर्थात व्यक्ति का स्वभाव, विचार, प्रतिक्रियाएं उसके नियंत्रण से लगभग बाहर होती हैं. अगर यह सब पूर्व नियंत्रित है तो किसी व्यक्ति की मित्रता, शत्रुता किन और कैसे लोगों से होगी यह भी एक साधारण व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर की चीज है. इस सारे घटनाक्रम में एक शक्ति काम करती है जिसे हम साधारण भाषा में फिजिकल एनर्जी कह सकते हैं. दो एक सी फिजिकल एनर्जी के लोग एक दुसरे को अधिक पसंद करते हैं और विपरीत एनर्जी के कम. यह बात साधु संतों से लेकर तथाकथित अंडरवर्ल्ड के लोगों पर समान रूप से लागू होती है.
अब शायद यह समझना आसान होगा कि क्यों कोई व्यक्ति हमे अचानक बिना किसी कारण अच्छा या बुरा लगता है. क्यों कोई हमे बिना कारण पसंद करता है तो कोई बिना कारण हमसे नाराज हो सकता है. निश्चित रूप से बाहरी परिस्थितियों का भी एक हद तक इसमें योगदान रहता है परंतु यह किसी भी रासायनिक क्रिया में एक उत्प्रेरक की सीमा से अधिक नहीं बढ़ पाता क्योंकि सामान परिस्थितियों में दो अलग अलग व्यक्तियों को अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है.
अगला सवाल यह आता है कि क्या यह फिजिकल एनर्जी तभी काम करती है जब दो व्यक्ति एक दूसरे के आमने सामने एक निश्चित दूरी पर हों? इसका जवाब आज के तकनीकी दौर में और भी आसान हो जाता है, जब हम किसी से फोन पर बात करते हैं या किसी का फेसबुक/ट्विटर प्रोफाइल देखते हैं क्या हम अचानक किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित या विकर्षित महसूस नहीं करते?
हाँ,
और यह स्वाभाविक
है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति
की फिजिकल एनर्जी से उसकी आवाज
भी प्रभावित होती है इसीलिए
केवल फोन पर बात करने भर से
पसंदगी या नपसन्दगी का एक भाव
आ जाता है. यही
बात सोशल मीडिया प्रोफाइल पर
भी लागू होती है जहाँ हर व्यक्ति
अपनी रूचि और आदतों के अनुसार
ही अपना प्रोफाइल बनाता है
और हम अपनी रुचियों के आधार
पर उसे पसंद या नापंसंद करते
हैं. इस
पूरी क्रिया में फिजिकल एनर्जी
का अपना महत्त्व है.
क्या इस नियम का कोई अपवाद नहीं? ऐसा नहीं है. हर नियम/अवधारणा की तरह इसके भी अपवाद हैं और अन्य नियमों के मुकाबले इसके अपवाद ढूँढने आसान हैं क्योंकि इसके अपवाद केवल मानव की दृढ इच्छाशक्ति और उसकी निरंतरता के आधार पर बनते हैं. बहुत से लोगों को आपने देखा होगा जो खुद को पूरी तरह बदलने में कामयाब रहे हैं. यह मुमकिन है. बस जरूरत अंदर उठते भावों के विपरीत क्रिया करने की है जिसके लिए दृढ इच्छाशक्ति की जरूरत है और लगातार अभ्यास से इसे स्थायी आदत बनाना मुमकिन भी है. भारतीय समाज में संयुक्त परिवारों की सफलता या असफलता इसी अपवाद की सफलता पर निर्भर करती है जहाँ स्व-रूचि को तिलांजलि देते हुए परिवार के हित में अपने मनोभावों की अनदेखी करनी पड़ती है.
इसका
एक और उदाहरण आप किसी बच्चे
और बड़े से बात करते हुए भी देख
सकते हैं. बच्चे
की बातचीत में उसके भाव साफ़
चमकते हैं. स्कूल
का काम पूरा करने की बात हो या
खेलने की बच्चा अपनी भावनाओं
के आधार पर ही जवाब देता है. 'पढ़ने
का मन नहीं है' 'अभी
थोडा और खेलने का मन है'
(यक़ीनन जवाब
इसके उलट भी हो सकता है पर
भावनाएं उसमे भी शामिल होंगी)
जबकि वयस्क
व्यक्ति से बात करते हुए 'काम
करने का मन है' बजाय
आपके द्वारा 'आज
यह काम करना पड़ेगा' सुनने
की सम्भावना अधिक है.
दोनों वाक्यों
में फर्क इच्छा और बाध्यता
का है. वयस्कता
के साथ स्वेच्छा के विपरीत
कार्य करने की बाध्यता मौजूदा
सामजिक ताने बाने में किसी
भी व्यक्ति को घेर लेती है.
इसे एक शायर
ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया
है
जैसे
जैसे हम बड़े होते गए,
झूठ
कहने में खरे होते गए.
भावनाओं
से बाध्यता की यह यात्रा ही
आज के तथाकथित रूप से सफल
व्यक्तियों की अंदरूनी बेचैनी
का रहस्य है. स्व
का रूपांतरण किये बिना अपने
क्रियाकलापों को बदलना किसी
भी व्यक्ति को कहीं न कहीं
मनोवैज्ञानिक स्तर पर द्विविभाजित
कर जाता है. इस
समस्या के एक हद से अधिक बढ़
जाने पर यह स्प्लिट-पर्सनैलिटी
डिसऑर्डर कहा जाता है जो लगभग
पागलपन की स्थिति है लेकिन
एक सीमा तक यह स्प्लिट पर्सनैलिटी
डिसऑडर पूरे समाज में देखा
जा सकता है.
कुछ
लोग यह कह सकते हैं कि अगर हर
व्यक्ति को अपने मन के भावों
के आधार पर कृत्य करने की छूट
मिल जाए तो यह समाज में एक
प्रकार की अराजकता की स्थिति
पैदा हो जायेगी.
मैं उनसे
सहमत हूँ और समाज में अराजकता
का विरोधी भी हूँ लेकिन मौजूदा
समय में सामाजिक/आर्थिक
रूप से सफल होने का दबाव एक
सीमा से अधिक है और यही अधिकतर
युवाओं के उनके केंद्र से
विचलित होने का कारण है.
आने वाले
समाय में इसके दुष्परिणामों
को बढ़ते मानसिक रोगियों और
शारीरिक रूप से कमजोर समाज
के रूप में देखा जा सकता है.(यक़ीनन
हम भी अपने पूर्वजों के मुकाबले
शरीरिक रूप से दुर्बल हैं.)
तो
ऐसे में रास्ता क्या है? क्या
अपनी स्वाभाविक आदतों के
विपरीत व्यवहार करने के मानसिक
दबाव में जीता समाज स्वयं से
किसी स्तर पर जुड़ाव भी महसूस
कर सकता है? क्या
कोई तरीका है जिस से दोहरे
मानसिक स्तर पर जीने की बाध्यता
में भी कोई साधारण इंसान अपने
अंदर कहीं गहरे में शांति
महसूस कर सकता है? क्या
सामजिक बंधनों के इस मायाजाल
से मुक्ति का कोई रास्ता है?
इस
विषय पर बाकी चर्चा अगले लेख
में.......
आपके सवाल
और विचार आमंत्रित हैं. यह
आगे की विचार यात्रा को दिशा
देने में सहायक होंगे.......


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