Thursday, 24 October 2013

राजनैतिक आतंक की छाँव में राहुल गाँधी होने का मतलब



राहुल गांधी के भाषणों को लगातार सुनिए तो देश के बारे में कम गांधी परिवार या राहुल गांधी, एक व्यक्ति, के बारे में अधिक कहते सुने देते हैं. कभी बचपन के डरावने अनुभव तो कभी मां के आधी रात कमरे में आकर रोने की बातें. राजस्थान भाषण भी इस से कुछ अलग नहीं था. या शायद था. क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ कि देश के सबसे सुरक्षित और मजबूत कहे जाने वाले परिवार के किसी सदस्य ने सार्वजनिक मंच से परिवार के सदस्यों की हत्या के बाद का अनुभव और स्वयं अपनी हत्या का डर जाहिर किया हो.
गैर कांग्रेसी इसे राजनैतिक चश्मे से देखना पसंद करेंगे तो कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह भक्तिभाव जाहिर करने का एक और मौका होगा. यकीनन इन सब के बीच दादी और पिता की हत्या के बाद डरे सहमे जवान बालक की मानसिकता तक शायद ही कोई पहुँच पायेगा जो सुरक्षा के साए में भी असुरक्षित महसूस करता है. देखा जाए तो जवाहर लाल नेहरु को छोड़ कर पिछली तीन पीढ़ियों में किसी की भी मृत्यु सामान्य कारणों से नहीं हुई. कहने वाले इसे शहादत भी कहते हैं लेकिन शहादत से अधिक यह उस तंत्र की पोल खोलता है जो देश की सुरक्षा का दम भरता है और चीरफाड़ करेंगे तो एक बार फिर निशाने पर वही आते हैं जो खुद को पीड़ित कहते हैं. बात चाहे प्रत्यक्ष रूप से सत्ता सँभालते राजीव गाँधी और इंदिरा गांधी की हो या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की चाभी और रिमोट थामे सोनिया-राहुल की.
राहुल गांधी के बयान के राजनैतिक निहितार्थ भी हैं, होने भी चाहिए. सदियों तक राजों-रजवाड़ों की परम्परा का पालन करने वाला यह देश अभी भी उस मानसिकता से शायद पूरी तरह बाहर नहीं निकला अन्यथा कोई कारण नहीं था कि दादी और पिता को याद करने वाले एक बयान पर बहस करने के लिए टीवी चैनलों और अख़बारों पर होड़ लग गई. अब इसे ऐसे समझिये कि यदि इस बयान पर टीवी चैनलों के एसी कमरों में बैठे एंकर इतने भावुक हो सकते हैं तो देश के साधारण आदमी का क्या हाल होगा जो देश को आजाद होने का क्रेडिट इसी गांधी परिवार को देता रहा है. (एक सर्वे के अनुसार इस देश के ८.९% लोग अभी तक नहीं जानते कि इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी है, उनके लिए अभी भी कांग्रेस को वोट देने का मतलब इंदिरा मैय्या को वोट देना ही है.) तो विरासत का हवाला देकर वोट मांगना उतनी बुरी बात नहीं जितनी इस पर प्रतिक्रिया आ जाती है क्योंकि भारत जैसे देश में यह हर बड़ा नेता और हर बड़ी पार्टी करती रही है.
बात व्यक्तिगत तौर पर राहुल गाँधी की करें तो वे डरे-सहमे-झिझकते-शर्माते युवराज की छवि में कैद हो चुके हैं और लाख कोशिशों के बावजूद उस से आजाद नहीं हो पा रहे हैं (दाढ़ी बढ़ाना, बाहें चढ़ाना, स्टेज से घोषणा पत्र और प्रेस के सामने बिल फाड़ना इस छवि से आजाद होने की कशमकश का हिस्सा हो सकता है). इस के लिए उनकी चाटुकार मंडली भी काफी हद तक जिम्मेदार है जो उनके हर सही गलत का विश्लेषण राहुल के नजरिये से करती है परन्तु देश ऐसा नहीं है. बहुसंख्यक तबका राहुल गांधी के बयान को राहुल गांधी बनकर नहीं सुनता है और यही समस्या है क्योंकि निर्मम राजनैतिक विश्लेषण में राहुल गांधी का बयान कहीं ठहरता नहीं है. लेकिन इस बात को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है कि यह बयान राजनैतिक तौर पर भले ही महत्वपूर्ण ना हो लेकिन राजनीति में इसका अलग महत्त्व है. क्योंकि ऐसे दौर में जब सत्ता हर ओर से निशाने पर है और सत्ता के परोक्ष नियंत्रणकर्ता के तौर पर गांधी परिवार इस गुस्से का केंद्र हैं तो राजनीति में भावनाओं का छौंक ही कोई सहारा यहाँ दे सकता है.
और किसी मनोविश्लेषक से पूछेंगे तो कहेगा यह अचेतन मन का वह डर बोल रहा है जिसे यह लगता है कि २०१४ की लड़ाई अस्तित्व की लड़ाई है क्योंकि इस बार सत्ता परिवर्तन का मतलब गांधी परिवार के लिए सुख-सुविधाओं, सुरक्षा-व्यवस्था और रहन-सहन के तौर तरीकों में परिवर्तन भी होगा. मोदी इसका सीधा संकेत गांधी परिवार और खासकर गैर-राजनैतिक माने जाने वाले रोबर्ट वाड्रा को निशाने पर लेकर दे चुके हैं. यह उस अघोषित संधि के उलट था जिसके तहत अब तक राजनैतिक दलों के नेताओं के परिवारगणों को निशाने पर नहीं लिया जाता था. तो क्या राहुल गांधी यह मान रहे हैं कि २०१४ में सत्ता ना आई तो गांधी परिवार के आखिरी वंशज के तौर पर खतरा उनकी जान पर भी बढेगा.

Wednesday, 23 October 2013

राम जेठमलानी v/s भाजपा - बनते बिगड़ते संबंधों की एक दिलचस्प दास्तान

एक खबर आई। राम जेठमलानी ने भाजपा के संसदीय बोर्ड के सदस्यों पर पचास पचास लाख का मानहानि का दावा ठोक दिया।खबर हैरान कर देने वाली थी। उस से भी हैरान कर देने वाली थी वे प्रतिक्रियाएं जो इस मामले पर आईं। कुछ ने कहा जेठमलानी सच का साथ देते हैं। कुछ ने कहा यह केवल पब्लिसिटी स्टंट है। पहले जेठमलानी को जानना जरूरी है उसके बाद भाजपा को। तब कहीं जाकर यह सोचना वाजिब होगा कि यह केवल सनसनी फैलाने वाला मामला है या वाकई जेठमलानी गंभीर हैं?
कई पुरानी तस्वीरें जहन में उभर आई।भाजपा की पहली सरकार में मंत्री पद संभाले व्यक्ति से लेकर भाजपा में शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने के फैसले तक कुछ भी साधारण नहीं किया राम जेठमलानी ने।
अविभाजित भारत के सिंध में 1923 में जन्मे जेठमलानी सत्रह साल की उम्र में वकील बने।एक रिफ्युजी के तौर पर भारत आये जेठमलानी हमेशा चर्चा में रहे।बात चाहे हिन्दू परिवार में दो शादियों की हो या पचास के दशक में स्मगलरों का वकील कहलाने की। बड़े से बड़ा विवादास्पद और हाई प्रोफाइल केस वह लड़ चुके हैं। कई बार देशद्रोही वकील का तमगा भी मिला।इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के हत्यारों से लेकर हाजी मस्तान और अफजल गुरु तक जेठमलानी के क्लाइंट रहे हैं। हर्षद मेहता और केतन पारिख जिन्होंने भारतीय शेयर बाजार को एक अरसा उँगलियों पर नचाया भी इस लम्बी लिस्ट में शामिल हैं। कई बड़े फैसले, जो न्याय की दुनिया मील का पत्थर साबित हुए, उनकी वकील के तौर पर काबिलियत के गवाह बने। लाख विपरीत परिस्थितियों, विरोधों के बावजूद कभी लगा नहीं कि राम जेठमलानी डिग रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा, जिसने 1971 में जनसंघ के तौर पर पहली बार जेठमलानी को उल्हासनगर से टिकट दिया था और 1996 में मंत्री पद, के लिए यह हमला अप्रत्याशित भी है और परेशान कर देने वाला भी।राम जेठमलानी, जो आपातकाल के खिलाफ विरोध में भाजपा का बड़ा हथियार रहे, भले ही अटल बिहारी वाजपेयी का विशवास कभी ना जीत पाए हों पर लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी हमेशा रहे।यही कारण है कि हर भाजपा सरकार में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हीं जेठमलानी ने भाजपा और लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ ना सिर्फ बगावत शुरू कर दी बल्कि सीधा निशाना आडवाणी पर ही साध दिया।
राम जेठमलानी हमेशा दिल की बात कहने वाले और उस बात की कीमत वसूलने वाले राजनेता और वकील के तौर पर जाने जाते हैं।इसके लिए 27 जुलाई 2011 का पाकिस्तानी दूतावास द्वारा आयोजित वह रात्रिभोज याद करने की जरूरत है जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और चीनी राजदूत के सामने भारत के राज्य सभा सदस्य के तौर पर भी जेठमलानी खुले शब्दों में यह कहने से नहीं हिचकिचाए थे कि "चीन भारत और पाकिस्तान  का संयुक्त दुश्न्मन है और पाकिस्तान सरकार को यह बात समझने की जरूरत है"।
जब नितिन गडकरी पर व्यावसायिक हितों के लिए राजनीति के इस्तेमाल के आरोप लगे तो खुला विरोध करने वाले पहले शख्स जेठमलानी ही थे।इसी कड़ी में संगठन के पदाधिकारियों को लिखी कड़ी चिट्ठी के सार्वजनिक हो जाने का खामियाजा पार्टी से निष्काशन के रूप में भुगतना पडा।
अब जबकि यह जंग अदालत के दरवाजे तक पहुँच गई है देखना दिलचस्प होगा कि नतीजा भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर क्या असर डालता है?
देखना होगा भारतीय न्याय तंत्र की जड़े हिला देने वाला सबसे महँगा यह वकील क्या यही काम भारतीय राजनीति के साथ कर सकता है?

Thursday, 17 October 2013

तो सुप्रीम कोर्ट भी बिकता है?

देश में घोटाला हुआ और कोयले में लगी चिंगारी को दबाने की तमाम कोशिशें हुई, कभी जीरो लॉस थ्योरी के नाम पर तो कभी सीएजी को निशाने पर लेकर।दमघोंटू धुंआ सड़क तक आकर सत्ता की पोल खोलने लगा तो जांच भी शुरू हुई। जांच के दौरान भी रवैया वही रहा जो किसी भी केस में होता है जहाँ दांव पर बड़े रसूख वालों का रसूख लगा हो। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने कुछ आस बंधाई जब सीबीआई को पिंजरे में बाद तोता कहा गया जो भारतीय न्यायव्यवस्था और लोकतान्त्रिक भ्रष्टाचार के इतिहास में एक मुहावरा बन गया। इसके बाद कोयला घोटाले की जांच पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने लगी तो एसी कमरों में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी लगा कि अब सब ठीक है।
लेकिन तीन दिन पहले जब पूर्व कोयला सचिव पीसी पारिख और प्रख्यात उद्योगपति बिड़ला जांच के दायरे में आये तो बयानबाजी के कोहरे में सुप्रीम कोर्ट की छवि भी धुंधली नजर आने लगी।
पहला बयान उस अधिकारी का आया जो अपनी चालीस साल की बेदाग़ सेवा का हवाला देकर ईमानदारी की बात करते हुए सीबीआई के फैसले और रवैये पर सवाल उठा रहा था।लोकतंत्र में सत्ता के उच्चतम प्रतिष्ठान प्रधानमन्त्री पद की ओर उठती उंगली यकीनन लोकतंत्र के मुखिया की कुर्सी के पायों के बौनेपन का एहसास करा रही थी। प्रथम साजिशकर्ता के तौर पर प्रधानमन्त्री के शामिल होने का मतलब है लोकतंत्र की जीत और जो लोकतंत्र की ही नाक काटकर हासिल हुई हो। पारदर्शिता और न्यायपरकता के इस खेल में अपनी ख़ामोशी से हजारो सवालों की लाज रखने वाला पीएम जब खुद सवालों के दायरे में है तो सवालों की लाज भले ही रखी जा रही हो परन्तु लोकतंत्र की लाज का सवाल कहीं दिखाई नहीं देता।
दूसरा बड़ा सवाल उन दलों की प्रतिक्रया से पैदा हुआ जिनपर जिम्मेदारी थी इस लोकतंत्र के पहरुए बनकर सरकार को कुछ गलत न करने देने की। लेकिन प्राथमिक जिम्मेदारी का एहसास होने की बजाय इस बार भी रटे रटाये बयान सामने आये जो 2014 के लिए निशाना साधते दलों की कमान से निकले हर तीर पर लिखे होते हैं। तो क्या वाकई 2014 की लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण है कि लोकतान्त्रिक मर्यादा का भी उल्लंघन आसानी से किया जा सकता है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ रखने वाले दल यही जताना चाहते हैं। लेकिन जनता तक पहुँचते संकेत तो प्रधानमन्त्री के खिलाफ उमड़े गुस्से के धुएं में कहीं खो गए लगते हैं।
तीसरा और सबसे बड़ा झटका देश की राजनीति का मिजाज भी समझा गया और सत्ता पूँजी समीकरण की रासायनिक संरचना भी। लुटियंस की दिल्ली के प्राचीरों के स्वघोषित संरक्षकों ( केंद्रीय मंत्रियों) में से एक केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का बयान सर्वाधिक चौंकाने वाला था। उन्हें ना चिंता लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की हो रही छीछालेदार की थी ना सीबीआई जांचों और उठती उँगलियों के डर से हर फ़ाइल पर कुंडली मारकर बैठी नौकरशाही के आत्मविश्वास की। उनके बयान में चिंता जाहिर हुई कोर्पोरेट के ऊपर उठती उँगलियों की।इस के लिए वे सुप्रीम कोर्ट पर ऊँगली उठाने से भी बाज नहीं आये।वाणिज्य मंत्री होने के नाते उनकी चिंता वाजिब है परन्तु वाणिज्य मंत्री वे इसलिए बने क्योंकि लोकतंत्र के प्यादे कहे जाने वाले लोगों ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी। लेकिन उनके बयान से सत्ता के कार्पोरेटाना पहलू की पोल एक बार फिर खुलती नजर आई। झारखण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश से आने वाले कम से कम 80 सांसद ऐसे हैं जो केवल कारपोरेट से सम्बंधित सवाल पूछते हैं।राज्यसभा में कम से कम 65 सांसद कोर्पोरेट घरानों के सीधे सीधे नुमाइन्दे हैं।किसानों से सम्बंधित यही आंकडा आप मांगेंगे तो हम कहेंगे किसान अब नेता नहीं बनता उलटा नेता अभिनेता अक्सर किसान बनते दिखाई देते हैं और यह सामजिक जीवन का हिसा नहीं होता बल्कि टैक्स प्लानिंग का हिस्सा होता है।
एक आखिरी और सबसे बड़ा सवाल जो जनता के सामने और आया है वह है सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता का। अगर सुप्रीम की निगरानी में काम करते हुए भी सीबीआई कुछ गलत कर सकती है तब तो लोकतंत्र शब्द को भी हैरी पॉटर के खलनायक वोल्डरमोर्ट की तरह निषिद्ध कर देना चाहिए। लेकिन इस सवाल का जवाब ढूँढने की जिम्मेदारी उसी जनता की है जिसे रोज सुबह मजदूरी पर जाना होता है ताकि शाम तक घर में सब्जी रोटी का जुगाड़ हो सके।