Thursday, 19 February 2015

नारीमुक्ति : अधिकार केवल नक़ल का?


पिछले हफ्ते महिला-पुरुष समानता पर कुछ वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ एक ब्लॉग लिखा तो लगा जैसे बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया. कुछ दोस्तों ने दोस्ती निभाते हुए इसे अच्छा बताया तो कुछ साथी महिला अधिकारों का हनन बताते हुए व्हाट्सएप और इमेल पर टूट पड़े. इनमें से कुछ प्रतिक्रियाएं बहुत उग्र थीं तो कुछ संतुलित, लेकिन अधिकतर प्रतिक्रियाओं में एक बात समान थी कि मेरे ब्लॉग में जो तुलना की गई है वह महिला और पुरुषों के शारीरिक/हार्मोनल/मेडिकल संरचना पर आधारित है जबकि महिलाओं को अधिकार देने की बात सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखी जानी आवश्यक है. मैं उन सभी से पूरी तरह सहमत हूँ कि मेरा पूरा ब्लॉग केवल शारीरिक संरचना को तुलना का आधार बनाते हुए लिखा गया था लेकिन जैसा कि मैं पहले एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ कि किसी भी इंसान की शारीरिक संरचना का प्रभाव उसके क्रियाकलापों और आचार व्यवहार पर पड़ता है तो महिलाओं के लिए यह लागू नहीं होगा यह मानना असंभव है. पिछला ब्लॉग केवल एक कड़ी की शुरुआत भर था जिसमे महिला और पुरुषों के अलग अलग होने की बात को मेडिकल तथ्यों के आधार पर साबित करने की कोशिश की गई थी. अब इसकी अगली कड़ी में महिला अधिकारों के पैमाने पर हमारे सामजिक परिवेश को कसने की कोशिश करते हैं.

महिला अधिकारों की बात करने से पहले शायद यह तय करना ज्यादा जरूरी है कि महिला आधिकारों की परिभाषा क्या है? यह मैं केवल इसलिए कह रहा हूँ कि महिला अधिकारों के नाम पर एक छलावे जैसा खेल हमारे समाज में लगातार चल रहा है. यह खेल पिछले पच्चीस साल में और ज्यादा तेज हुआ है जबसे भूमंडलीकरण के साथ पश्चिम की अर्थनीति ने भारत में प्रवेश किया. यह अर्थनीति कुछ कमियों के साथ भारत के लाइसेंसी राज से कहीं ज्यादा बेहतर और तर्कसंगत है, लेकिन इस पर चर्चा कभी बाद में. इस बात से शायद ज्यादातर लोग सहमत होंगे कि किसी भी समाज की सोच को चलाने और बदलने में अर्थनीति का योगदान उस से कहीं ज्यादा होता है जितना हम समझते हैं.

पश्चिम की अर्थनीति के साथ भारत के सामजिक/पारिवारिक ताने बाने में कुछ बड़े बदलाव हुए. जिनमें से एक बड़ा बदलाव यह था कि महिलाओं को उनकी मौलिक योग्यताओं से इतर अन्य मामलों में भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला जिसका पूरा पूरा फायदा भारतीय महिलाओं ने उठाया हो ऐसा कहना मुश्किल है. इस असफलता के पीछे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं को इन मौकों के साथ साथ एक छलावे में भी घेरा गया और वह छलावा था पुरुषों से बराबरी का. समय बदला और साथ साथ भारत के व्यवसाय करने का तरीका भी. पहले जिन जगहों पर केवल पुरुष काम करते थे अब उन्हीं जगहों पर महिलायें भी काम करती हैं, और यह सब महिला पुरुष बराबरी के नाम पर हो रहा है. बिना यह समझे कि क्या महिलाओं की कोई अलग योग्यता है या नहीं? क्या केवल पुरुषों के संग खड़े होकर हर काम करना भर ही उनकी योग्यता का सुबूत है. पुरुषों के काम करके खुद को बेहतर साबित करना क्या परोक्ष रूप से यह क़ुबूल कर लेना नहीं है कि पुरुष जो काम करते हैं वह बेहतर है और बेहतरी का मापदंड केवल उसी काम को दोहराना है. महिला पुरुष बराबरी के लिए महिलाओं का घर से कदम बाहर निकालना एक शुभ संकेत है लेकिन यह केवल पुरुषों की नक़ल करने के लिए हो, तो यह उनके लिए दुर्भाग्य भी बन जाता है.
इसे थोड़ा ऐसे समझिये कि क्या होगा अगर आप तेज दौड़ने वाले घोड़े से उम्मीद करें कि वह किसी बैल की तरह अधिक बोझ खींच कर दिखाए. या शेर की दहाड़ की तुलना किसी चिड़िया के चहचहाने से की जाए. इन सभी की अपनी अलग योग्यताएं, खूबसूरतियाँ और खूबियाँ हैं और तुलना करना किसी के साथ भी अन्याय होगा. तो फिर यह अन्याय लगातार महिलाओं के साथ क्यों किया जाता रहा है और वह भी नारी मुक्ति के नाम पर. महिलाओं के अपने कुछ गुण हैं जिनमे वे पुरुषों से बेहतर काम कर सकती हैं. उदाहरण के तौर पर इनमे से एक गुण उनका पुरुषों के मुकाबले अधिक रचनात्मक होना है. घर की दहलीज के अन्दर इस गुण का इस्तेमाल घर की साज सज्जा और अन्य कामों में किया जाता था तो घर के बाहर इस से मिलता जुलता काम इंटीरियर डिजाइनिंग या फैशन डिजाइनिंग हो सकता है. लेकिन अगर इस गुण को नजर अंदाज करके महिलाओं की सेना में भागीदारी को आधार बनाया जाए तो आखिर कितनी महिलायें इस के साथ न्याय कर पाएंगी? और यह हो रहा है. नतीजा देखिये. भारत की थल सेना में महिलायें हैं लेकिन बॉर्डर और अन्य संवेदनशील जगहों पर उन्हें नियुक्ति नहीं दी जाती, पुरुषों के मुकाबले में उनका कार्यकाल कम होता है. अगर बॉर्डर पर नियुक्ति नहीं होनी है तो महिलायें सेना में कर क्या रहीं है? क्या यह महिला अधिकारों के नाम पर यह सेना में सफ़ेद हाथी पालने जैसा नहीं है? तो क्या सेना में महिलाओं की कोई जगह नहीं है? है. आर्मी की एक शाखा है AMC (आर्मी मेडिकल कोर). यह शाखा सेना के जवानों/अधिकारियों को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती है. इस शाखा में भरपूर महिलायें हैं और उनकी क्षमताओं का दोहन भी इस शाखा में सही तरीके से हो पा रहा है. लेकिन इसके अलावा सेना की बाकी शाखाओं में महिलायें केवल सजावट का सामान बनकर रह गई हैं और वह भी नारी मुक्ति के नाम पर. और विडम्बना देखिये इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में जब इन महिलाओं को पहली बार परेड में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो सेना के पास इन्हें रुकवाने के लिए कोई ठिकाना भी नहीं था. मजबूरन 250 महिला अधिकारी दिल्ली के विभिन्न होटलों में रुकीं. क्या यह वाकई महिला स्वतंत्रता है? क्या हम इस से बेहतर कोई और तरीका नहीं निकाल सकते इनकी क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए? एक बात और, एक तरफ जहाँ सेना में महिलाओं के होने से कुछ फायदा नहीं मिल पाता वहीँ पुलिस में महिलाओं की कमी है. और यह महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में बाधा बन रहा है. लेकिन शायद ही कोई सरकार सेना में महिला भर्ती बंद कर पाए. कारण? वही महिला अधिकारों की बात करने वाले लोग. नतीजा? एक तरफ महिला सुरक्षा में हमारी कमजोरी तो दूसरी तरफ महिलाओं की क्षमताओं का बेवजह नष्ट होना.

अब जरा दुसरे पक्ष पर बात करते हैं महिला अधिकारों को एक जामा पहनाया गया है जिसमें उच्छ्रंखलता को ही महिला स्वतंत्रता मान लिया गया. इसी सोच के वशीभूत देर रात तक महिलाओं का बाहर रहना उनके अधिकारों से जोड़ दिया गया. यक़ीनन भारत जैसे विकासशील देश का एक बड़ा तबका आज भी महिलाओं को उपभोग की वस्तु के तौर पर देखता है और आश्चर्यजनक रूप से इसमें निम्न आय/शिक्षा वर्ग वाले लोगों के साथ साथ उच्च आय/शिक्षा वर्ग के लोग भी हैं. यकीन नहीं आता तो आप अधिकतर विज्ञापन/फिल्मों को देखिये. आखिर एक पुरुष अंडरवियर/शेविंग-क्रीम के विज्ञापन में महिलायें क्या कर रही हैं? जी. सही जवाब. वे इसे खूबसूरत बना रही हैं क्योंकि वे सजावट का सामान हैं. यह भी महिलाओं के साथ धोखा ही है और यह धोखा महिला अधिकारों के नाम पर हुआ है. पुरुषों से बराबरी का यही भ्रम महिलाओं के हाथ में जाम और उँगलियों में सिगरेट भी पकड़ा रहा है. थोडा और आगे जायेंगे तो यह अधिकार फ्री सेक्स के आसपास दम तोड़ने लगता है. 

कमियां गिनना आसान है इसलिए आप कह सकते हैं कि वही रास्ता मैंने अपना लिया है लेकिन आप गौर से देखेंगे तो यह कमियां एक पैटर्न में हैं. यहाँ महिला अधिकारों के नाम पर महिलाओं को बाजार (विज्ञापन/फ़िल्में ट=इत्यादि) में खड़ा कर दिया गया है या दोयम दर्जे का पुरुष बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है (सेना/पुरुष केन्द्रित व्यवसाय). इसमें महिला की अपनी पहचान कहाँ है? मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी भी गाँव में डेयरी या बुनकर व्यवसाय में लगी महिला को शाहर के किसी नाईट क्लब या बोर्ड रूम में बैठी महिला से अधिक बदलाव का वाहक मानता हूँ. 

ऐसा नहीं है कि महिला अधिकारों के इस खेल में केवल महिलायें ही शिकार बनी हैं. इसका शिकार पुरुष भी बने हैं. यह सब मानते हैं कि घर के रख रखाव और बच्चों के साथ पुरुषों के मुकाबले महिलायें अधिक सहज महसूस करती हैं और वे इसमें दक्ष भी हैं. इसमें कुछ वैज्ञानिक कारण हैं तो कुछ सामाजिक अभ्यास. ये दोनों कारण मिलकर इस तरह के कामों में महिलाओं को अधिक सक्षम बनाते हैं लेकिन पिछले कुछ समय में इस सक्षमता को महिलाओं की सामाजिक मजबूरी कहकर सामने रखा गया तो पुरुषों को यह जिम्मेदारी उठाने के नैतिक और सामाजिक दबाव में घेरा गया. नतीजा? दो अलग अलग जगहों पर दो ऐसे लोगों की तैनाती ऐसे काम में हो गई जिसमें वे सहज ही नहीं हैं. 

अंत में, महिला अधिकारों के छलावे से बाहर निकालें. महिलाओं का घर से बाहर निकलना शुभ है मगर इसका मतलब पुरुषों की नक़ल करना भर न मानें. बहुत से ऐसे काम हैं जहाँ महिलायें पुरुषों से बेहतर काम कर सकती हैं. वहां संभावनाएं भी हैं और मौके भी, बस नजर पैदा करें. और सबसे महत्वपूर्ण बात महिलाओं की आजादी का मतलब पुरुषों से मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी आजादी के अर्थ उन्हें स्वयं ढूँढने होंगे. पुरुषों को साथी माने, प्रतिद्वंदी नहीं. और हो सके तो नारीवाद के नाम पर नारी-अधिकारों को बेचने वालों के हंगामे से बचें. महिला अधिकार जंग का परिणाम नहीं सफ़र की परिणति होने दें.

महिला अधिकारों के नाम पर यह चलावा केवल सामजिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य में हो रहा हो ऐसा नहीं है. यह खेल कानूनी अधिकारों में भी चल रहा है जिस पर अगले लेख में बात करेंगे....

Sunday, 15 February 2015

महिला-पुरुष समानता : कितना भ्रम? कितना सच?

हमारे आस-पास बहुत सी ऐसी बातें और धारणाएं हैं जिन पर हम अक्सर बिना सोच विचार किये यकीन कर लेते हैं. इस तथाकथित यकीन के पीछे भी अलग अलग कारण हो सकते हैं. कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन पर हम आँख मूँद कर इसलिए यकीन कर लेते हैं क्योंकि उन्हें हम बचपन से सुनते आये हैं (जैसा कि हमारे पुरखे सुनते आये थे.) तो कुछ बातों के विरोध में हम इसलिए नहीं बोलते क्योंकि हम सामाजिक रूप से अलग विचारधारा के साथ खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाते. जैसे हम अक्सर यह कहते या सुनते हैं कि महिला और पुरुष एक समान होते हैं. महिला और पुरुष समानता का यह विचार इतना खूबसूरत है कि कई राजनैतिक पार्टियां इस के आसपास अपना एजेंडा बना लेती हैं तो कई राजनेता इस कथन के सहारे भौगौलिक दूरियों को मिटाने का यत्न करते हैं. जैसा कि अमेरिका के राष्ट्रपति जोर्ज बुश ने किया जब वे 2001 में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव जीते. उनके धन्यवाद भाषण के वे शब्द आज भी याद किये जाते हैं. उन्होंने कहा था "हम भले ही किसी भी जाति से हों, किसी भी प्रदेश से हों, महिला हों या पुरुष हों, एक बात हम सबमे एक समान हैं और इसे वैज्ञानिक भी मानते हैं, और वह बात है कि शारीरिक संरचना के आधार पर हम सब 99.9% एक समान हैं." लेकिन शायद ही कभी हमने इस कथन के पीछे झाँक कर देखा हो. क्या वाकई महिला और पुरुष एक समान हैं? क्या उनमें कोई अंतर नहीं? क्या कोई ऐसा काम नहीं जिसे केवल महिलायें या पुरुष कर पाते हो? 

चलिए शुरुआत वहां से करते हैं जहाँ से जीवन की शुरुआत होती है यानी वह पल जब माँ के गर्भ में हम सब के जीवन की शुरुआत होती है, यानी दो शुक्राणुओं का मिलना.



यह बात शायद सब जानते हैं कि इन दो शुक्राणुओं के मिलने से शरीर के अन्दर पहली कोशिका का जन्म होता है और यही एक कोशिका बाद में दो में विभाजित होती है और दो से चार में, चार से आठ में. विभाजन का यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि एक शिशु का पूरा शरीर तैयार नहीं हो जाता. एक पूरे शरीर के तैयार होने के वक्त इसमें लगभग दस हजार करोड़ कोशिकाएं तैयार हो चुकी होती हैं और ये सभी कोशिकाएं उसी एक मूल कोशिका के विभाजन से बनी होती हैं जो पहले दो शुक्राणुओं के मिलन से बनी थी. इन सभी कोशिकाओं में एक बात समान होती है और वह है गुणसूत्रों के वे 23 जोड़े, जो पहले शुक्राणु के मिलन के वक्त बनते है. अब जरा देखते हैं कि एक लड़की और एक लड़के के पैदा होने की क्रिया में क्या अंतर होता है? 

यह बात सब जानते होंगे (बचपन में पढ़े जीव विज्ञान की बदौलत) कि एक लड़के या लड़की के पैदा होने में इन 23 जोड़े गुणसूत्रों के 22 जोड़े एक समान होते हैं. इन 22 जोड़ों में दोनों क्रोमोजोम XX होते हैं. लिंग निर्धारण में अहम् भूमिका 23 वें जोड़े की होती है, जहाँ महिला में यह 23वा जोड़ा बड़ी खूबसूरती से मिलते जुलते XX क्रोमोजोम्स का जोड़ा रहता है जबकि पुरुषों में यह एक बेमेल जोड़ा यानी XY होता है. इसमें Y क्रोमोजोम आकार में छोटा होता है. 


XX गुणसूत्रों का जोड़ा 

XY गुणसूत्रों का जोड़ा

यही 23 गुणसूत्रों के जोड़े किसी भी इंसान के शरीर हर कोशिका में पाए जाते हैं और इनमें इंसान की आनुवंशिक जानकारी एकत्रित होती हैं जिसे हम साधारण भाषा में डीएनए कहते हैं. यानी पुरुष और महिलाओं के डीएनए में मूलभूत रूप से असमानता है. डीएनए की इस असमानता के बावजूद दो पुरुष या दो महिलाओं के मामले में यह लगभग 99.9% तक समान रहता है. जबकि एक पुरुष और एक महिला में यह केवल 98.5% सामान रहता है. इस तरह केवल लिंग परिवर्तन के साथ .1% का यह अंतर अचानक बढ़कर 1.5% तक पहुँच जाता है यानि 15 गुना ज्यादा. महिलाओं के साथ पुरुषों के डीएनए की समानता का यह अनुपात अगर आपको अधिक लगता है तो कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों पर निगाह डालने की जरुरत है जो एक पुरुष और एक नर चिम्पांजी के डीएनए को ९८ प्रतिशत से अधिक समान बताते हैं. महिला और पुरुषों के बीच डीएनए की यह असमानता क्या किसी और तरह से भी सामने आती है? 

कुछ और बातें हैं जिनसे इस बात को बल मिलता है कि यह असमानता आगे भी बनी रहती है. अगर हम बात बीमारियों की करें तो कुछ ख़ास बीमारियाँ पुरुषों में ज्यादा होती हैं तो कुछ ख़ास बीमारियाँ महिलाओं में ज्यादा होती हैं. उदाहरण के तौर पर ऑटिज्म यानि मानसिक रूप से कमजोर होने की बीमारी महिलाओं में मुकाबले पुरुषों में अधिक पाई जाती है. आंकड़े बताते हैं कि पागलपन या ऑटिज्म के मामले में एक महिला के मुकाबले कम से कम पांच पुरुष पीड़ित हैं. वहीँ आर्थराइटिस यानी जोड़ों में दर्द और अन्य समस्याओं की बात करें तो एक पुरुष के मुकाबले 2 से 3 महिलायें इस रोग से पीड़ित हैं. इसी तरह ल्युपस नामक बीमारी, जिसमें शरीर के किसी भी ख़ास अंग को नुकसान पहुँचने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है. आंकड़े बताते हैं कि ल्युपस के हर एक पुरुष मरीज के साथ कम से कम 6 महिलाएं ल्युपस की शिकार हैं. यहाँ ऐसी किसी बीमारी का जिक्र नहीं किया गया है जो महिला और पुरुषों में शारीरिक भिन्नता के आधार पर पैदा हो होती हो. अन्यथा आंकड़े यह भी कहते हैं कि स्तन कैंसर केवल महिलाओं में होता है. खैर यह केवल मजाक था, आगे बढ़ते हैं. 

बीमारियों को और ध्यान से देखें तो यह अंतर केवल महिला और पुरुषों के बीच बीमारी का शिकार होने तक नहीं है बल्कि कुछ बीमारियाँ पुरुषों को छोटी उम्र में नुक्सान पहुंचाती हैं तो महिलाओं को बड़ी उम्र में. जैसे डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी (Dilated Cardiomyopathy) दिल से सम्बंधित एक बीमारी है जिसमें दिल की बाहरी दीवारें पतली हो जाती हैं और बाद में दिल का आकार बढ़ने लगता है. इस बीमारी का अध्ययन बताता है कि इस बीमारी के होने पर अधिक उम्र में ज्यादा नुक्सान की संभावना है परन्तु बढती उम्र में नुक्सान की यह संभावना महिलाओं में कम और पुरुषों में कहीं ज्यादा है. यानी इस बीमारी के होने पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के बचने की संभावना अधिक है, जैसा कि ग्राफ में बताया गया है. 



बीमारियों के स्तर की यह समानता व्यवहार में भी सामने आती है. उदाहरण के लिए आप विभिन्न दुर्घटनाओं के यूट्यूब पर मौजूद वीडियो देख सकते हैं. पुरुष ड्राइवर होने पर अधिकाँश मामलों में गाड़ी जोर से आती है और टक्कर के बाद रुक जाती है. महिलाओं के केस में यह एक्सीडेंट कम स्पीड पर होता है लेकिन एक बार टक्कर लग जाने पर महिलायें ब्रेक की बजाय एक्सीलीटर पर पैर दबा देती है और गाड़ी ज्यादा तेज चलती है. दुर्घटना होने पर ब्रेक की बजाय स्पीड पैदल दबाने की यह घटना बताती है कि पुरुष और महिलाएं एक सी परिस्थिति में अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हैं. तो फिर समानता है कहाँ? कहीं नहीं. जी! 

पुरुष और महिलायें समान नहीं है, अलग अलग हैं. दोनों का सम्मान जरूरी है. लेकिन दोनों को एक समान बनाने की यह अंधी दौड़ महिलाओं को ज्यादा नुक्सान पहुंचा रही है. बात चाहे विभिन्न व्यवसायों में उतरने की हो या व्यसनों में, पुरुषों से बराबरी की इस दौड़ में महिलायें केवल दोयम दर्जे के पुरुष के रूप में सामने आ रही हैं. तो इस भ्रम को अपने मन से निकालिए. महिला पुरुष बराबर नहीं हैं, बराबर नहीं हो सकते. दोनों अलग हैं और बराबर सम्मान के अधिकारी हैं. पहले दोनों को अलग अलग समझना शुरू करें, तुलना खुद-ब-खुद बंद हो जायगी और बेहतरी का भ्रम भी दिमाग से निकल जायगा. (अंतिम वाक्य महिलाओं और पुरुषों पर समान रूप से लागू होता है.)

बाकी बातें अगली बार.....

Sunday, 8 February 2015

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला ख़त.....


प्रिय अरविन्द केजरीवाल,

सबसे पहले आपको बधाई हो कि दिल्ली के चुनाव में आपकी पार्टी ने उम्मीद से बेहतर तरीके से भाजपा और अन्य पार्टियों का मुकाबला किया. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बने यह आकांक्षा रखने वालों में मैं स्वयं भी था, हालांकि आपकी पार्टी से तमाम मुद्दों पर असहमति का अपना अधिकार अब भी मैं सुरक्षित रखना चाहता हूँ. इसके बावजूद लोकतंत्र में असहमति की आवाज बने रहने का पक्षधर होने के नाते आग के लिए पानी के डर के तौर पर उभरी आपकी पार्टी के लिए शुभेच्छा रखता हूँ. आप यह भी कह सकते हैं कि इस पार्टी से सहानुभूति होने का एक कारण अन्ना आन्दोलन से जुड़े रहना भी है और वैकल्पिक राजनीति का सपना देखने की जुर्रत भी.

अब जबकि दिल्ली में मतदान हो गया है और उम्मीदों आकांक्षाओं की लहर पर सवार आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के पूर्वानुमान हर एक्जिट पोल में हर चैनल लगा रहा है, ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का उत्साह उफान पर है जो स्वाभाविक है. उम्मीदों का असलियत में परिवर्तित होना और कार्यकर्ताओं द्वारा जमीन पर की गई मेहनत का नतीजों में झलकना यक़ीनन ख़ुशी का मौका होता है लेकिन यह मौका आत्मनिरीक्षण और भविष्य के लिए आउटलाइन बनाने का भी होता है. यह मौका होता है उन गलतियों को ढूँढने का जो पहले हुई, ऐसी व्यवस्था बनाने का कि वे गलतियां फिर न हों. ख़ुशी की लहर में उड़ना आसान है लेकिन जमीन पर बने रहना साबित करता है कि आप इस ख़ुशी के काबिल हैं, इसलिए यह मौका शायद ज्यादा महत्वपूर्ण है आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों के लिए, ताकि लोग उस भरोसे को कायम रख सकें जो उन्होंने आंदोलन से राजनैतिक पार्टी बने इस दल में दिखाया है.

इसके अलावा भी यह मौका होता है उन कार्यकर्ताओं/शुभचिंतकों की बात सुनने का जो अपनी असहमतियां/नाराजगियां पीछे धकेल कर पार्टी के लिए काम कर रहे थे, और आम आदमी पार्टी के लिए यह मौका इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पार्टी की मूलभूत विचारधारा में स्वराज भी है जिसमें हर जमीनी कार्यकर्ता पार्टी में अरविन्द केजरीवाल के बराबर अहमियत रखता है. मैं यह कहने की धृष्टता कर रहा हूँ कि आपके लिए यह मौका है स्वराज को स्थापित करने का जिससे आम आदमी पार्टी अब तक चूकती रही है. पार्टी कार्यकर्ता तो नहीं लेकिन पार्टी शुभचिंतक के तौर पर मैं भी कुछ बातें आपके सामने रखना चाहूँगा, बिना यह चाहे कि आप इन्हें ज्यों का त्यों मान लें. हाँ, यह जरूर कहूँगा कि आप इन पर विचार करें और अगर इनमें से कोई भी विचार दिल्ली और देश की जनता की बेहतरी के लिए उपयुक्त हो तो इस्तेमाल करें.

1. यह चुनाव हर किसी भी चुनाव की तरह पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई था, ऐसे में जीत की उत्कृष्ट आकांक्षा होना आसानी से समझ में आता है. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आपने दिल्ली के मतदाताओं को लुभाने के लिए एक लोकलुभावन घोषणापत्र तैयार किया जिसमे फ्री और सस्ती सुविधाएं मुख्य वादा था. आज के सन्दर्भ में महंगाई और भ्रष्टाचार की मार झेल रही जनता को यह त्वरित राहत देने वाला फैसला समझ में भी आता है लेकिन लंबे समय में ऐसी कोई अर्थव्यवस्था टिक पायेगी जिसमें नागरिक को उपभोक्ता की बजाय फ्री का मेहमान समझ जाए, इसमें मुझे संदेह है. हम इस तरह की फ्री सुविधाओं को देने के परिणाम इस से पहले बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में हम देख चुके हैं, इसलिए मेरी आपसे विनती है कि लंबे समय में कोशिश फ्री सुवोढायें देने की बजाय रोजगार पैदा करने की हो ताकि झुग्गी में रहने वाला व्यक्ति भी बिजली पानी और इंटरनेट जैसी सुविधाएं इस्तेमाल कर सके लेकिन भुगतान करके. वैसे भी फ्री सुविधा के बजाय भुगतान करके ली सुविधा जहाँ आत्मविश्वास की पोषक होती है वहीँ यह अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छी नीति है जहाँ अर्थ के हस्ततान्तरण की गति से ही विकास प्रभावित होता है.

2. दिल्ली चुनाव में आपको मिलने वाले अभूतपूर्व समर्थन के पीछे आपकी, आपके साथी नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं की दिन रात की मेहनत के साथ भाजपा के द्वारा आप के खिलाफ चलाये गए नकारात्मक चुनाव प्रचार और सत्ता में आने के बाद भाजपा में आये अहंकार की भी अहम भूमिका थी. उम्मीद है आप इन दोनों से दूर रहेंगे. सत्ता पक्ष के गलत कामों को जनता के सामने लाना विपक्ष की जिम्मेदारी होता है और आप बिना विपक्ष में रहे भी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे हैं इसके लिए साधुवाद. परंतु अब जब आप सत्ता में होंगे, जनता आपकी राजनीति का सकारात्मक पक्ष देखना चाहेगी. केंद्र में मोदी सरकार है, उसकी गलतियां उजागर करना भी जरुरी है परंतु आप पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे बाद में कुछ और. केंद्र की गलतियां नजर अंदाज करने की सलाह देने की धृष्टता मैं नहीं कर सकता क्योंकि यह भाजपा के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, देश के लिए नहीं. मेरा सुझाव केवल इतना है कि यह जिम्मेदारी ऐसे नेताओं को दें जो दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ें जैसे योगेन्द्र यादव, संजय सिंह, आनंद कुमार, प्रशांत भूषन, कुमार विश्वास इत्यादि. हमेशा कैमरों के सामने रहने का लोभ त्यागना पार्टी और देश के लिए लंबे समय में कारगर होगा. यक़ीनन 2019 के राष्ट्रीय चुनाव के मद्देनजर देश की राजनीति में बड़े बदलाव होंगे और उसमे आपकी अहम भूमिका हो सकती है लेकिन याद रखें 2019 में अभी 4 साल हैं और आप इन 4 सालों में दिल्ली को एक उदाहरण के तौर पर देश के सामने रख सकते हैं. 

3. पार्टी के मुख्य मुद्दों में से एक मुद्दा स्वराज भी है यह आपको याद दिलाने की शायद जरूरत नहीं है परंतु अभी तक पार्टी इस मुद्दे पर काम करने में लगभग असफल ही रही है. इसका उदाहरण आम आदमी पार्टी का 10 प्रदेशों में उपस्थित संगठन है जिनसे संवाद करने में पार्टी नेतृत्व पूरी तरह नाकाम रहा है. इसका प्रमुख कारण हर काम अरविन्द केजरीवाल के द्वारा या उनके रास्ते होने की परम्परा पार्टी में आ जाना है. उम्मीद है आप इसे बदलेंगे. पार्टी के मूल दृष्टिपत्र को एक बार फिर पढ़ने की जरूरत है तो उसे पढ़ें. आपको याद होगा उसमे लिखा था कि पार्टी के उम्मीदवारों का चयन पार्टी कार्यकर्ता करेंगे और आपने पिछले चुनाव में ऐसा किया और अपेक्षित सफलता भी मिली. लोकसभा चुनाव में यह पूरी प्रक्रिया समय की कमी को सामने रखते हुए नजर अंदाज कर दी गई और इस बार दिल्ली चुनाव में समय होते हुए भी टिकट पार्टी कार्यकर्ताओं की वोटिंग के बिना दिए गए, उम्मीद है आप पार्टी में स्वराज स्थापना की ओर काम करेंगे. इसका एक बड़ा फायदा देश भर में पार्टी को फ़ैलाने के दौरान दिखाई देगा जब किसी अन्य प्रदेश में चुनाव लड़ना आपके चेहरे के बिना भी संभव होगा. यक़ीनन ऐसा करने में आपको अपने हिस्से का मंच किसी दुसरे व्यक्ति से बांटना होगा लेकिन विचारधारा के लिए यह बेहतर है. यकीन मानिये पार्टी में प्रदेश स्तर पर आपको कई अरविन्द केजरीवाल मिल जायेंगे, जिनमे से कई को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, देर बस उन को लाइम लाईट में लाने की है. उम्मीद है आप पार्टी को चंद चेहरों और दिल्ली से आगे ले जाकर सामूहिक नेतृत्व को विकसित करने में सहयोग देंगे और ऐसा करने के लिए आपको केवल इतना करना है कि आप दिल्ली की जनता पर ध्यान दें.

4. दिल्ली चुनाव में टिकट वितरण और चुनाव लड़ने के दौरान बेहतरीन प्रबंधन की एक मिसाल आम आदमी पार्टी ने पेश की है लेकिन इस बेहतरीन मिसाल में कोई दाग या बेहतरी की और सम्भावना नहीं थी ऐसा सोचना खुद को धोखा देना होगा. यक़ीनन आप जीत रहे हैं लेकिन केवल नतीजे अंतिम सत्य नहीं, नैतिकता और सच के साथ खड़ा रहना वैकल्पिक राजनीति का बड़ा सच है. दिल्ली चुनाव के दौरान हुई गलतियों को आप दोहराएंगे नहीं ऐसा मैं उम्मीद करता हूँ, इन गलतियों में वो दो टिकट भी हैं जो अंतिम समय पर काटने पड़े और बाकी बचे 10 टिकट भी, जिनका प्रशांत भूषन जी ने विरोध किया परंतु जो पार्टी की छवि को नुकसान के मद्देनजर नहीं काटे गए. इन दस लोगों में पार्टी की सामूहिक शर्म नरेश बालियान भी हैं और हरियाणा से लगती दिल्ली की वे सीटें भी जहाँ पार्टी मानकों की बजाय जीतने की क्षमता के आधार लोगों को टिकट दिया गया. हो सकता है इनमे से कुछ लोग जीतकर भी आ जाएँ, और यह मेरी कामना भी है, ऐसे में आप इन्हें पार्टी विचारधारा से जोड़ने में कितने कामयाब होते हैं यह आपके लिए असली चुनौती होगी. उम्मीद है आप इस ओर ध्यान देंगे. 

5. दिल्ली चुनाव जीतने में आपकी ईमानदार छवि का बड़ा योगदान रहा है. आप आंदोलन से आये हैं और अब आपकी जिम्मेदारी प्रशासन चलना है. पिछले कार्यकाल में आप एक आंदोलनकारी रहकर प्रशासन चलाने की मिसाल पेश करने की कोशिश में न तो आंदोलन ही कर पाये न ही प्रशासन की कोई बेहतरीन मिसाल दे पाये. यहाँ मैं यह साफ़ कर दूं कि आपका पिछला कार्यकाल कई बेहतरीन फैसलों के कारण यादगार है और मैं उन फैसलों को लागू होते दोबारा देखना चाहूँगा लेकिन बहुत से अनचाहे विवाद और अव्यवस्था के कारक मुद्दों से बचा जा सकता था. उम्मीद है आप इस बार अन्दोलनकर्ता से प्रशासक का सफर अच्छे से तय करके जनता के भले के लिए कार्य करेंगे. यह समय आन्दोलन की रूमानियत से बाहर आने का है.

6. अब जब आप सत्ता में हैं तो आपकी पार्टी के कार्यकर्ता जो अब तक आपके साथ अडिग खड़े थे उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही आपके बजाय जनता के लिए ज्यादा होगी क्योंकि हर गली नुक्कड़ चौराहों पर आपकी सरकार द्वारा किये गए कार्यों का जवाब उन्हें देना होगा. जमीनी कार्यकर्ता किसी भी पार्टी का वह व्यक्ति होता है जिसे नेता के कार्यों का श्रेय तो नहीं मिलता लेकिन उसके कामों का अपयश अपने ऊपर झेलना होता है. ऐसे में संभव है कि पार्टी के अंदर से आपके कुछ फैसलों के विरोध में आवाज उठे. यह एक मजबूत लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी भी है. उनकी बात को सुनिए, क्योंकि जिस तरह आप लोकतंत्र में असहमति की आवाज उठाकर वैकल्पिक राजनीति का रास्ता साफ़ कर रहे हैं ऐसे ही आपकी पार्टी में भी असहमति की आवाज का होना जरूरी है, यह लोकतंत्र का गहना है. यकीन मानिये वे भाजपा के एजेंट नहीं हैं, जैसा कि इस से पहले बहुत से असहमति की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं को कहा गया. वह वही व्यक्ति है जिसने अन्ना आन्दोलन के दौरान सड़कों को नापा था तो निर्भया काण्ड में पुलिस के डंडे भी खाए थे. समय आने पर वह आपके खिलाफ भी आवाज उठाएगा क्योंकि वह आपके साथ नहीं है, वह सच के साथ है. उसका आवाज उठाना शुभ है, इसे रास्ता भटकने से बचने के लिए अलार्म की तरह मानें.

7. अन्ना आन्दोलन की शुरुआत दिल्ली में हुई, 25 जुलाई को आपका अनशन भी जंतर मंतर पर ही हुआ, बिजली पानी आन्दोलन से लेकर पहला और दूसरा चुनाव भी दिल्ली में ही केन्द्रित रहा. ऐसे में दिल्ली ऑफिस में रहने वाले कार्यकर्ताओं का पार्टी के फैसलों में सहभागी होना कहीं से भी गलत नहीं है. लेकिन यह समस्या तब बन जाता है जब दिल्ली के किसी कार्यकर्ता के गिरफ्तार होने पर पार्टी थाने का घेराव कर दे और सोशल मीडिया पर भी इसे राष्ट्रीय समस्या की तरह प्रचारित किया जाए. दूसरी भ्रष्टाचार के किसी मुद्दे को लेकर उत्तराखंड, मध्य प्रदेश या राजस्थान का कोई कार्यकर्ता अनशन पर बैठा हो और पार्टी नेतृत्व से एक समर्थन भरा बयान जारी करवाना भी विश्व युद्ध लड़ने जैसा हो जाए. आपकी पार्टी को यहाँ तक पहुन्चाने में दिल्ली के साथ साथ लगभग सभी प्रदेशों के कार्यकर्ताओं का योगदान है, इसे भूलें नहीं. इसे भूना इसलिए भी नुक्सानदायक हो सकता है क्योंकि यह कार्यकर्ता आपसे कोई व्यक्तिगत फायदा नहीं, मुद्दों पर समर्थन चाहता है जैसा कि वह आपको देता रहा है. दिल्ली ऑफिस की कोटरी के नियंत्रण से बाहर निकलें.

उम्मीद है आप इन मामलों पर ध्यान देंगे. मैं प्रशासन या अन्य बड़े मामलों में आपको कोई भी राय देने से चेष्टापूर्वक बच रहा हूँ क्योंकि बड़े मामलों पर राय देने वाले बहुत से लोग आपकी सरकार बनने के बाद आपके पास होंगे लेकिन अगर आप इन छोटे छोटे मामलों पर कुछ बेहतरी लाने वाला काम कर पाए तो यकीन मानिये वैकल्पिक राजनीती का सपना सच होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. मैं यह पत्र आपको भेजने के साथ-साथ सोशल मीडिया और अपने ब्लॉग पर भी डाल रहा हूँ ताकि सभी कार्यकर्ता इस पर राय दे सकें. हो सकता है उपरोक्त किसी भी मामले पर मेरी व्यक्तिगत राय गलत हो, ऐसे में मैं यह भूल सुधारने के लिए प्रस्तुत हूँ.  दिल्ली वासियों की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिए शुभकामनाएं.

- अन्ना आन्दोलन के आईने में वैकल्पिक राजनीति का सपना देखने वाला एक आम नागरिक