Friday, 20 September 2013

क्या हमें संसद में एक रावण की जरूरत है? हाँ…..

बात सनातन धर्म के धर्मग्रंथों से शुरू करना चाहूँगा जिसमे देवताओं और राक्षसों का संघर्ष तो सब जानते हैं लेकिन इसका कारण बहुत कम लोग जानते हैं. रामायण के एक हिस्से में राम और रावण का संवाद इस पर रौशनी डालता है जहाँ रावण देव संस्कृति को धिक्कारते हुए उसे भोग संस्कृति करार देता है तो दूसरी तरफ खुद को रक्ष परम्परा का वाहक मानता है प्रकृति की रक्षा करने के लिए पैदा हुए हैं. राक्षस शब्द का जन्म रक्ष संस्कृति के लोगों के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है.
देवराज इंद्र और उनके दरबार में होने वाले भोग विलास की बात ना करते हुए आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आज यह सवाल वाकई महत्वपूर्ण है कि क्या यह प्रकृति संसाधन अंधाधुंध भोग के लिए है या हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे रक्षित रखना चाहिए. बात झारखंड या अन्य किसी इलाके में मिलने वाली कोयला खानों की हो या उत्तराखंड, हिमाचल में मिलने वाले जल संसाधनों की, अंधाधुंध दोहन जैसे हमारी आदत बन चुकी है. जिसके खतरनाक नतीजे पिछले कुछ दिनों में हमने उत्तराखंड में भुगते भी हैं. 5225 मृत लोगों की सरकारी सूची आने वाले कई दशकों के लिए जलप्रलय से होने वाले नुक्सान की मिसाल बनकर रहेगी.
आखिर इस अंधाधुंध दोहन के लिए जिम्मेदार कौन है? बात उत्तराखंड की करें तो अक्सर लखनऊ से पहाड़ ना दिखने की बात करते करते उत्तराखंड का निर्माण हुआ ताकि पहाड़ के विकास का मॉडल पहाड़ के हिसाब से बनाया जा सके. विकास के नाम पर मिला तो कंक्रीट का जंगल, बिना किसी योजना के अंधाधुंध लगे  औद्योगिक संयंत्र और वाहनों का शोर. वाहनों का शोर जहाँ खनिज सम्पदा को ख़त्म करने में लगा, औद्योगिक संयंत्रों ने उत्तराखंड के हिस्से में आने वाले चुनिन्दा खेती के इलाकों को ख़त्म किया, वहीँ कंक्रीट का जंगल खडा करने के लिए जीवनदायी नदियों में अवैध और अवैज्ञानिक खनन ने जोर पकड़ा. अवैध खनन को सरंक्षण मिला विधानसभाओं में बैठे माननीयों और उनके विशालकाय अंगूठे के नीचे काम करने वाले चींटी जैसे प्रशासकों का. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हुई तो प्राकृतिक न्याय की शुरुआत करते हुए प्रकृति ने इस बरसात में जो हाहाकार मचाया है वह सबके सामने है. यह सब उस राज्य में हुआ है जो खुद को गर्व से देवभूमि के नाम से प्रचारित करता है.
उत्तराखंड को उदाहरण के तौर पर लेते हुए पूरे देश को समझा जा सकता है और देश को उदाहरण मानते हुए पूरी दुनिया को. लेकिन बात केवल भारत को लेकर करें तो लगभग उत्तराखंड जैसा ही हाल झारखंड के उन इलाकों में भी है जहाँ खनिज पदार्थों के लिए वेदान्ता ग्रुप आदिवासियों पर गोलियां चलवाने से भी बाज नहीं आ रहा है. नतीजा है माओवाद का फैलता क्षेत्र, जो पूरे देश के 550 जिलों में से 278 में पाँव पसार चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि खुद को गर्व से देव संस्कृति का हिस्सा कहने वाले हम लोग क्या केवल प्रकृति का दोहन करने के लिए पैदा हुए हैं? यदि यही देव संस्कृति है तो क्या हमें जरूरत नहीं है कुछ राक्षसों की जो प्रकृति की रक्षा का वचन लेते हुए अपनी रक्ष संस्कृति कायम करें. क्या समय नहीं आ गया है कि देव संस्कृति को पुनर्परिभाषित किया जाए या पीढ़ियों पुरानी मान्यता को तोड़ते हुए गर्व से कहा जाए “हाँ, मैं राक्षस हूँ”. इसमे बुराई भी कुछ नहीं क्योंकि आज भी भारत के एक बड़े इलाके में दशहरा पर राम का पुतला जलाया जाता है और रावण को पूजा जाता है.
आखिर में उसी बुनियाद सवाल की तरफ लौटना चाहूँगा कि क्या एक व्यक्ति के प्रयासों से कोई सफलता इसमें मिल सकती है या नहीं? निराशावादी ना होते हुए कहना ठीक होगा कि सफलता मिलती तो है परन्तु यह सफलता बहुत छोटी होती है. इसके लिए संसद से उचित कानूनों का बनना और उनका पालन होना जरूरी है.तो क्या संसद से इन माननीयों (जो खुद को लोकतंत्र का देवता भी मानते हैं) को निकाल कर कुछ राक्षसों को भेजने की जरूरत है? शायद हाँ. परन्तु ध्यान रहे इस बार राक्षस असली हों देवताओं के भेष में लिपटे राक्षस तो यह लोकतंत्र पिछले ६७ सालों से देख ही रहा है.

मुजफ्फरनगर - क्या है परदे के पीछे के राजनैतिक समीकरण

मुजफ्फरनगर में जो हुआ उसकी समीक्षा सभी तरीके से की जा रही है. ऐसे में राजनैतिक पक्ष को नजरअंदाज करना गलत होगा. राजनैतिक दृष्टि से देखे तो यह दो समुदायों के बीच का मामला नहीं था. यह मामला था इलाके की उन 18 लोकसभा सीटों का जहाँ हिन्दू और मुस्लिम वोट अहम् भूमिका निभाते हैं. पिछली बार इनमे से 3-3 सीट सपा और भाजपा को तो 6 सीट बसपा, 5 राष्ट्रीय लोक दल को तो एक कांग्रेस को मिली थी.
इलाके के लोगों से बात करें तो पता लगता है सियासत को लहू का जायका कितना पसंद है. जहाँ एक ओर सत्ताधारी पार्टी सपा है तो दूसरी ओर केंद्र में सरकार की सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल. दोनों का वोट बैंक एक समुदाय विशेष से आता है. अपने अपने समुदाय विशेष को नाराज ना होने देने का दबाव होना स्वाभाविक है. लेकिन यह दबाव मुख्यमत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में चल रही सपा सरकार पर ज्यादा है.
ऐसे में अखिलेश सरकार पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने वोट बैंक के चक्कर में गुंडों की गुंडई को भी नजरअंदाज कर रही है. उत्तर प्रदेश के थानों में जाएँ तो हर वक्त एक दो गाड़ियों का सपा की झंडी लगाकर खड़े रहना यह बताता है कि प्रशासन के कामों में स्थानीय सरकारी चमचों का कितना दखल है. ये चमचे समुदाय विशेष से हों तो हत्या की रिपोर्ट सामने लाश होने पर भी पुलिस लिखने से डरती है.
यही सब तब हुआ जब कवाल गाँव में छोटी सी झड़प आपसी मारपीट में बदली और तीन जाने चली गई. यदि प्रशासन उसी वक्त कड़े कदम उठाता तो शायद बात इतनी न बढती. गाँव के ही एक व्यक्ति का कहना है यदि सरकार अपना काम करती तो राजनीति चमकाने का मौका कैसे मिलता? इसलिए पुलिस ने कुछ नहीं किया.
मजबूरन पहले पंचायत फिर महापंचायत हुई. यहाँ भी प्रशासन खामोश रहा. महापंचायत में आते लोगों पर हमला हुआ तो आने वाले वक्त की आहट किसी बहरे को भी सुनाई दे रही थी, पर सरकार को नहीं.
और अब जब बात गाँव गाँव में पहुँच गई है तो दंगों को रोकने के ढोंग किया जा रहा है. गौर से देखे तो ये दंगे ध्रुवीकरण की उसी कोशिश का एक हिस्सा थे जो पिछले एक साल से लगातार उत्तर प्रदेश में हो रही है.
क्षेत्र के राजनैतिक पंडितों की बात पर यकीन करें तो अल्पसंख्यक समुदाय के दिलों में अतिसुरक्षा की भावना बनाए रखना सपा की राजनैतिक मजबूरी है. इसी लिए कई मौकों पर तुष्टीकरण की नीति साफ़ दिखाई देती है. ऐसे में इन बिगड़ते हालात का गणित शुरुआत में सपा के पक्ष में था. ख़तरा होगा तो बचाव करने वाला हीरो भी कहलायगा. लेकिन ऐसी राजनीति करना अक्सर शेर की सवारी जैसा होता है, जिसमे सही समय पर शेर से उतरना जरूरी होता है. इसमे सपा नाकाम रही है. इलाके के राजनैतिक गणित को देखें तो जहाँ इन दंगो की शुरुआत से सपा को फायदा होने वाला था वहीँ इनके चलते रहने से अब फायदा अन्य पार्टियों को मिलता दिख रहा है. ऐसे में सपा लाख कोशिशें करें इस बिगड़ते माहौल का अभी सुधरना मुश्किल है. ऐसा भी संभव है पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही इन तनाव की चपेट में आ जाए.
इन दंगों के शिकार चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, लेकिन नुक्सान उसी का हुआ है जो दंगो से बचना चाहता है. दंगों की शुरुआत करने वाले और दंगों को संचालित करने वाले तो अब भी बचे हैं, महफूज हैं. इस देश में यदि आप ‘राजनैतिक’ हिन्दू या मुसलमान हैं तो आप के सब गुनाह इस समीकरण के आधार पर माफ़ कर दिए जाते हैं कि सरकार कौन सी है. बशीर बद्र की बात सही महसूस हो रही है…..
हिन्दू भी मजे में है मुसलमां भी मजे में,
इंसान परेशान यहाँ भी है वहां भी.
एक साथी पत्रकार के अनुसार लखनऊ के निवासी कैलकुलेटर लेकर बैठे हैं. जब तक दंगों के कारण खराब हुई छवि से खोये गए वोट, ध्रुवीकरण से मिलने वाले वोटों से कम होंगे यह खेल चलता रहेगा.

Wednesday, 18 September 2013

राजनीति के महाभारत में धृतराष्ट्र काल है ये

इतिहास लिखे जाते समय सदियाँ अक्सर पन्नों में सिमट जाती है और पूरे साम्राज्य का नाश कर देने वाले जयचंद केवल एक पंक्ति. लेकिन बात जब महाभारत की हो तो यह गौरव ध्रतराष्ट्र को प्राप्त नही होता. अभी हाल में ही हुए एक सर्वे में ध्रतराष्ट्र को महाभारत का सबसे घ्रणित पात्र बताया गया है. दुर्योधन से भी ज्यादा! आखिर ऐसा क्या है जो सौ कौरवों के पिता, एक-पत्निव्रता ध्रतराष्ट्र को उस दुर्योधन से अधिक घ्रणित बना देता है जिसने महाभारत की नींव रखी. सर्वे में जब यही सवाल पूछा गया तो अधिकतर जवाब एक से आये. महाभारत में भले ही ध्रतराष्ट्र ने किया कुछ न हो लेकिन हुआ सब उनकी देखरेख में. ऐसे में ध्रतराष्ट्र ने मौन रहते हुए उन सब गलत चीजों को समर्थन दिया जिसे रोकना उनका फर्ज था.
गौर से देखें तो भारतीय राजनीति का भी यह ध्रतराष्ट्र काल है. फर्क बस इतना है कि इस दौर में ध्रतराष्ट्र एक से ज्यादा है. ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौरवों की संख्या भी सौ से अधिक ही होगी. भारत में सरकार से लेकर हर पार्टी का अपना एक ध्रतराष्ट्र है. बात सबकी करेंगे शरुआत सरकार से:-
सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह शुचिता के ध्वजवाहक भी माने जाते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के पुरोधा भी. उनके द्वारा १९९१ में शुरू की गई वह पहल, जिसमे मुक्त बाजार को देश की तरक्की में साझेदार माना गया था, आज दम तोडती दिख रही है तो इसके लिए उन्ही के साथ रहने वाले कौरव जिम्मेदार हैं. आखिर क्या कारण हैं जिसने एक अच्छी शुरुआत के रूप में चले आर्थिक सुधारों के दौर को देश बेचने के लिए लगने वाली बोली में तब्दील कर दिया. क्यों मनमोहन सिंह उस भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रहे हैं जिसे रोकने की बात वह लाल किले से लगातार करते रहे हैं. क्या है ऐसा कि मनमोहन के दम पर कांग्रेस उसी शुचिता, इमानदारी और बेदाग़ छवि का दावा करते हुए चुनाव जीती जिसे उसके अपने मंत्रियों ने तार तार किया. क्यों मनमोहन सिंह ध्रतराष्ट्र बने देश को बिकते हुए देख रहे हैं जब कि बहुसंख्यक आबादी भुखमरी का शिकार है. इस पर बात रखने के लिए शायद लेखन की एक श्रंखला भी कम पड़े इसलिए अगले ध्रतराष्ट्र पर चलते हैं.
बात भाजपा की करें तो यही भूमिका संयुक्त रूप से नरेन्द्र मोदी और लाल कृष्ण आडवानी के पास है. आडवानी अपनी भूमिका से किनारा करने की कोशिश में खुद को भीष्म पितामह घोषित कर चुके हैं. ऐसे में मोदी पर सबकी निगाहे हैं और खुद मोदी की निगाह प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर है. नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री की कुर्सी कब्जाने की कोशिश में माया कोडनानी, बाबू बजरंगी, विट्ठल रादडीया, जस्टिस आर के मेहता की ओर से आँखें मूँद कर पूरी तरह ध्रतराष्ट्र की भूमिका में रम चुके हैं.
लेकिन बात यहीं नहीं थमती है. बात किसी भी पार्टी की कर लें. नाम लें या ना लें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहीं किसी परिवार के चार या पांच लोग पार्टी पर काबिज है तो कहीं परिवार के बजाय चार या पांच चेहरे पूरी पार्टी की राजनीति तय करते हैं. यही चार पांच लोगों का कोकस पार्टी संविधान और पार्टी कार्यकर्ताओं को नजर अंदाज करते हुए पार्टी की विचारधारा तय करता है. शायद भारतीय लोकतंत्र को पुरानी राजनैतिक कहावतों से पार जाने में अभी वक्त लगेगा जिनमे से एक कहावत “नेताजी रहें शासन में, कार्यकर्ता अनुशासन में” भी है. आम कार्यकर्ता की पार्टी नेतृत्व से यह दूरी लोकतंत्र के लिए घातक भी है और भविष्य के लिए जहर भी.
शायद ध्रतराष्ट्र युग की राजनीति अभी और चले. इन्तजार कीजिये लोकतंत्र की इस द्रौपदी के चीरहरण के आखिरी पल का जब कोई कृष्ण अवतरित हो. या शायद अट्ठारह दिनी महाभारत ही इसका इलाज हो, लेकिन लोकतंत्र में सत्ता बन्दूक की नली से आये तो नतीजे भी घातक ही होते हैं. इसलिए माओवाद से कहो कुछ धैर्य रखे. लोकतंत्र की शांतिवार्ता जारी है.

Thursday, 12 September 2013

मुजफ्फरनगर- जलते चौराहों, सुलगते अंधेरों का सच



मैं मुजफ्फरनगर हूँ. आप सभी पिछले कई दिनों से मेरी खोज खबर निकालने के लिए परेशान हैं तो मैं खुद भी अपने जलते बदन, सुलगते जख्मों को अनदेखा करते हुए आप के सामने पेश होने आया हूँ. इल्जाम तो कई हैं मुझ पर. जैसे मैंने पूरे प्रदेश को साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया है. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मुजफ्फरनगर के इतिहास में यह आम बात है. और भी न जाने कितने तरीके के इल्जाम मेरे ऊपर लग रहे हैं. काश! इल्जाम लगाने वाले यह भी सोच लेते कि बुरे वक्त की आग में जलता एक शहर उनके इल्जामों से और जलन महसूस करेगा. खैर अपना बयान देने आया हूँ. कोशिश करूंगा हर वो बात जो जानने लायक है आप तक पहुँचाऊं. आप के बीच आने का एक बड़ा कारण यह भी था कि सूचना क्रांति के दौर में आधी अधूरी जानकारी देने वालों की जबान पर लगाम लगा सकूँ.
मैं छोटा सा एक जिला हूँ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का. आबादी की बात करें मिली जुली आबादी है. कहीं मुस्लिम अधिक हैं तो कहीं हिन्दू. हिन्दुओं में भी जाट बहुत इलाका है. पहले कभी सोचा नहीं था कि मेरे बाशिंदों को उनके धर्म के नाम से गिना जायगा लेकिन खैर! अब तो कह रहे हैं जाति के आधार पर भी गणना चल रही है. हो भी क्यों न? बात धर्म और जाति की होगी तो राजनेताओं को काम करने की बजाय धर्म की चार बातें करने पर वोट जो मिल जाते हैं.
पिछले कुछ दिनों से जलते मकानों, जलती दुकानों के धुंए से परेशान हूँ. बीच बीच में चलती गोलियां भी सिरदर्द बढ़ा रही हैं. सेना आई तो है मगर गोलियों की गडगडाहट का स्थान अब बूटों की खडखडाहट ने ले लिया है और मैं न तब सो पाता था न अब सो पाता हूँ.
गौर से देखूं तो कारण समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू हुआ यह सब. अखबार तो यह कह रहे हैं कि मेरे एक गाँव के कुछ जवान लडको ने मेरी अपनी किसी बेटी से बदतमीजी की. पुलिस ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की तो लड़की के भाइयों ने आरोपी लड़के को उसी के मोहल्ले में जाकर धमकाया. बात आगे बढ़ी हाथापाई तक पहुंची तो लड़की के भाइयों ने उस लड़के को छुरा घोंप दिया. बाद में लड़की के भाइयों को भीड़ ने मार दिया. मेरे लिए यह कोई नई बात नही थी. यह तो ऐसे इलाकों में रोज होता है जहाँ के लोग आन बान शान के नाम पर जान देने को उतारू हों और प्रशासन निकम्मा हो. ऐसे में लोग अपने झगडे अक्सर सड़कों पर ही सुलझा लेते हैं. नतीजा मारपीट, गोलीबारी, ह्त्या में से कुछ भी हो सकता है. शायद इसीलिए अखबार कहते हैं कि एशिया में मुजफ्फरनगर का अपराध सूचकांक सबसे अधिक है. खैर!
यहाँ तक मामला पूरे तरीके से दो परिवारों के बीच में था यदि दो अलग अलग समुदायों के नेता दोनों परिवारों की तरफ से लड़ने के लिए ना आते. दो अलग समुदायों के परिवारों के पैरोकार दो अलग पार्टियों के नेता बने तो अनजान सी लड़की की छेड़छाड़ का मामला हिन्दू और मुस्लिम अस्मिता का मामला बना दिया गया. महापंचायत के बुलाने की बात हुई. प्रशासन एक बार फिर मौन था. सुरक्षा के इंतजाम नहीं किये गए. महापंचायत हुई. दो घरों की लड़ाई को सुलझाने पूरे प्रदेश से 70000 लोग आये. नहीं नहीं! वो दो घरो की लड़ाई सुलझाने नहीं आये थे वो तो अपने धर्म की अस्मिता बचाने आये थे. महापंचायत के बाद तनाव बढ़ा, जाते हुए काफिले पर पत्थरबाजी हुई. नतीजा आप सबके सामने है.
अखबार कह रहे हैं २५ लोग मरे हैं. टीवी कह रहा है ३० मरे हैं. यह कोई नही कह रहा कि जिन धर्मों को बचाने का दावा ये सियासती पैरोकार कर रहे थे वो दोनों धर्म भी मरणासन्न हालत में मेरे चौराहों पर पड़े हैं. कोई तो आये अब उन्हें बचाने. अब कोई नही आएगा. क्योंकि अन्दर की तस्वीर केवल मैं जानता हूँ.
सियासत की बुरी नजर लगी है मुझे. आधी आधी आबादी दो अलग अलग धर्मों की होने के कारण मेरी राजनीति जो कभी मुद्दों पर चला करती थी, अब ध्रुवीकरण की मोहताज बनकर रह गई है. इन दंगों का दोष तो महापंचायत को दिया जा रहा है लेकिन मुझे याद आते हैं वो दौर जब अग्रेज सरकार ने मेरे बाजार में स्थित एक मस्जिद को ढाने का फैसला लिया था तो ऐसी ही महापंचायत कर हिन्दुओं ने उस मस्जिद की रक्षा की कसम ली थी और २७ लोगो की शहादत के बाद अंग्रेज सरकार हार गई थी. आज भी वह मस्जिद अपनी जगह कायम है. ऐसे में वही लोग क्यों आपस में लड़ने लगे. तह में सियासत है.
बात अभी की करूँ तो सेना के बूटों तले सांस रोके पडा हूँ. जख्मों की जलन ना दिन को सोने देती है ना रात को. कर्फ्यू में घरों से रोते बच्चों की आवाजें कानों को परेशान कर रही है. आखिर घरों में राशन पानी जाने के लिए भी तो कर्फ्यू खुलना चाहिए. बस दुआ कीजिये कि सियासत के पेट की भूख मिट गई हो. ठीक हो जाऊँगा तो फिर आउंगा आप सब के बीच अभी तो इजाजत दीजिये. गोलियों की आवाज मेरा इन्तजार कर रही है.
-आपका अपना मुजफ्फरनगर