बात सनातन धर्म के धर्मग्रंथों से शुरू करना चाहूँगा
जिसमे देवताओं और राक्षसों का संघर्ष तो सब जानते हैं लेकिन इसका कारण
बहुत कम लोग जानते हैं. रामायण के एक हिस्से में राम और रावण का संवाद इस
पर रौशनी डालता है जहाँ रावण देव संस्कृति को धिक्कारते हुए उसे भोग
संस्कृति करार देता है तो दूसरी तरफ खुद को रक्ष परम्परा का वाहक मानता है
प्रकृति की रक्षा करने के लिए पैदा हुए हैं. राक्षस शब्द का जन्म रक्ष
संस्कृति के लोगों के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है.
देवराज इंद्र और उनके दरबार में होने वाले भोग विलास की बात ना करते हुए
आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आज यह सवाल वाकई महत्वपूर्ण है कि क्या
यह प्रकृति संसाधन अंधाधुंध भोग के लिए है या हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए
इसे रक्षित रखना चाहिए. बात झारखंड या अन्य किसी इलाके में मिलने वाली
कोयला खानों की हो या उत्तराखंड, हिमाचल में मिलने वाले जल संसाधनों की,
अंधाधुंध दोहन जैसे हमारी आदत बन चुकी है. जिसके खतरनाक नतीजे पिछले कुछ
दिनों में हमने उत्तराखंड में भुगते भी हैं. 5225 मृत लोगों की सरकारी सूची
आने वाले कई दशकों के लिए जलप्रलय से होने वाले नुक्सान की मिसाल बनकर
रहेगी.
आखिर इस अंधाधुंध दोहन के लिए जिम्मेदार कौन है? बात उत्तराखंड की करें
तो अक्सर लखनऊ से पहाड़ ना दिखने की बात करते करते उत्तराखंड का निर्माण हुआ
ताकि पहाड़ के विकास का मॉडल पहाड़ के हिसाब से बनाया जा सके. विकास के नाम
पर मिला तो कंक्रीट का जंगल, बिना किसी योजना के अंधाधुंध लगे औद्योगिक
संयंत्र और वाहनों का शोर. वाहनों का शोर जहाँ खनिज सम्पदा को ख़त्म करने
में लगा, औद्योगिक संयंत्रों ने उत्तराखंड के हिस्से में आने वाले चुनिन्दा
खेती के इलाकों को ख़त्म किया, वहीँ कंक्रीट का जंगल खडा करने के लिए
जीवनदायी नदियों में अवैध और अवैज्ञानिक खनन ने जोर पकड़ा. अवैध खनन को
सरंक्षण मिला विधानसभाओं में बैठे माननीयों और उनके विशालकाय अंगूठे के
नीचे काम करने वाले चींटी जैसे प्रशासकों का. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हुई तो
प्राकृतिक न्याय की शुरुआत करते हुए प्रकृति ने इस बरसात में जो हाहाकार
मचाया है वह सबके सामने है. यह सब उस राज्य में हुआ है जो खुद को गर्व से
देवभूमि के नाम से प्रचारित करता है.
उत्तराखंड को उदाहरण के तौर पर लेते हुए पूरे देश को समझा जा सकता है और
देश को उदाहरण मानते हुए पूरी दुनिया को. लेकिन बात केवल भारत को लेकर
करें तो लगभग उत्तराखंड जैसा ही हाल झारखंड के उन इलाकों में भी है जहाँ
खनिज पदार्थों के लिए वेदान्ता ग्रुप आदिवासियों पर गोलियां चलवाने से भी
बाज नहीं आ रहा है. नतीजा है माओवाद का फैलता क्षेत्र, जो पूरे देश के 550
जिलों में से 278 में पाँव पसार चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि खुद को
गर्व से देव संस्कृति का हिस्सा कहने वाले हम लोग क्या केवल प्रकृति का
दोहन करने के लिए पैदा हुए हैं? यदि यही देव संस्कृति है तो क्या हमें
जरूरत नहीं है कुछ राक्षसों की जो प्रकृति की रक्षा का वचन लेते हुए अपनी
रक्ष संस्कृति कायम करें. क्या समय नहीं आ गया है कि देव संस्कृति को
पुनर्परिभाषित किया जाए या पीढ़ियों पुरानी मान्यता को तोड़ते हुए गर्व से
कहा जाए “हाँ, मैं राक्षस हूँ”. इसमे बुराई भी कुछ नहीं क्योंकि आज भी भारत
के एक बड़े इलाके में दशहरा पर राम का पुतला जलाया जाता है और रावण को पूजा
जाता है.
आखिर में उसी बुनियाद सवाल की तरफ लौटना चाहूँगा कि क्या एक व्यक्ति के
प्रयासों से कोई सफलता इसमें मिल सकती है या नहीं? निराशावादी ना होते हुए
कहना ठीक होगा कि सफलता मिलती तो है परन्तु यह सफलता बहुत छोटी होती है.
इसके लिए संसद से उचित कानूनों का बनना और उनका पालन होना जरूरी है.तो क्या
संसद से इन माननीयों (जो खुद को लोकतंत्र का देवता भी मानते हैं) को निकाल
कर कुछ राक्षसों को भेजने की जरूरत है? शायद हाँ. परन्तु ध्यान रहे इस बार
राक्षस असली हों देवताओं के भेष में लिपटे राक्षस तो यह लोकतंत्र पिछले ६७
सालों से देख ही रहा है.