किसी भी अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला बोझ और अधिकाधिक मानवीय संसाधनों की जरूरत के बीच साधा गया संतुलन ही आर्थिक विकास की परिभाषा तय करता है. लेकिन बात मौजूदा लोकतंत्र की हो तो मानवीय संसाधन का मतलब वोट का जुगाड़ हो जाता है और प्राकृतिक संसाधनों का मतलब वोट के जुगाड़ को दिया जाने वाला लोलीपोप जो उन्हें किसी खास चुनाव चिन्ह से जोड़कर रखे. इन दोनों के मेलजोल से जो भी दल तीन किलोमीटर की परिधि वाले आलिशान बंगलों की दिल्ली पर काबिज होते हैं आर्थिक विकास की परिभाषा अपने आंकड़ों से वे खुद गढ़ लेते हैं. यानी सब कुछ उसी वोट के जुगाड़ के इर्द गिर्द घूमता है, जिसे संविधान के तहत भी और लोकतंत्र की भावना के तहत भी, मूल लोकतान्त्रिक अधिकार माना गया है.
ऐसे में देश की जनसँख्या को लेकर आये किसी भी बयान को राजनैतिक नजर से ना देखना गलत भी होगा और अदूरदर्शिता भी. गलत और अदूरदर्शी ना कहलाने की इसी होड़ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक उच्च पदाधिकारी के बयान की चीरफाड़ शुरू हुई जब उन्होंने कहा कि देश को राजनैतिक असंतुलन से बचाने के लिए जरूरी है कि हिन्दू परिवार ‘हम दो हमारे दो’ की अधिकृत सरकारी नीति को धता बताते हुए कम से कम तीन बच्चे पैदा करें. कहने का मतलब यह कि बाकी सम्प्रदायों के मुकाबले हिन्दुओं की घटती आबादी देश के लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन रही है. खतरा लोकतंत्र को है या वोट बैंक को यह तो साफ़ नहीं है लेकिन यह बयान इतना जता देने के लिए काफी है कि राजनैतिक दल देश में रहने वाले विभिन्न दलों के लोगों को ना केवल वोट बैंक की नजर से देखते हैं बल्कि दूसरे दलों के वोट बैंक पर लगते ब्याज के अनुसार अपने खाते में पड़े वोटों को बढाने का भी ख्याल करते हैं. गौर कीजिये ‘वोट को बढाने का ख्याल’. यानी गुणात्मक वृद्धि की इस दौड़ में गुणात्मक विकास के चिंतन के लिए ना कोई जगह है ना समय.
अब बात उस अधिकार की करें जिस के साए में यह जोड़ तोड़ रुपी मानसिकता हमारे राजनैतिक दलों की बन रही है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं वोट के अधिकार की. देश के तीन करोड़ लोग जो अलग अलग प्रदेशों की २६ राजधानियों में रोजी रोजी के लिए मेहनत मजदूरी करते हुए रह रहे हैं अभी तक वोट के इस अधिकार से वंचित हैं क्योंकि उनके पास रहने के लिए छत तो है लेकिन इस का कोई प्रमाण नहीं. यानी देश के नागरिक हैं, मनमोहिनी अर्थव्यवस्था में जीडीपी के पहिये को धकेलने वाले बैल भी हैं लेकिन लोकतंत्र के पहिये वे आज तक नहीं बन पाए.
इसके अलावा बड़े-बड़े राजनैतिक दलों के छोटे नेता अक्सर ऐसी मुहिम के हिस्सेदार बन जाते हैं जहाँ बिना किसी प्रमाण के वोटर कार्ड बनवाये जाते हैं जिनका आधार केवल यह सम्भावना होती है कि वोट किस दल को पड़ने वाला है. यहाँ वोटर आईडी कार्ड बनवाने का मतलब वोट खरीदना भी है और वोटर आईडी कार्ड बेचना भी. छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तरपूर्वी राज्यों में तो यह बाकायदा धंधा बन चुका है. इस सिंडिकेट को बांग्लादेश से घुसपैठ कर आये सवा करोड़ नागरिकों में से कम से कम ६५ लाख लोगों के वोटर आईडी कार्ड बन जाने के आंकड़े को देखकर समझा जा सकता है. इस धंधे में सेंध लगाने वाले समाजसेवियों से कभी मिलेंगे तो वे आपको बताएँगे कि निस्वार्थ भाव से वोटर आईडी कार्ड बनवाने और फर्जी वोटर कार्ड कैंसिल करवाने की मुहिम चलाने वाली संस्थाओं के प्रमुख चेहरों और कार्यकर्ताओं को किस प्रकार की धमकियां मिलती है. एक बानगी देखनी हो तो दिल्ली में ताजा चुनाव के मद्देनजर वोट की शक्ति नामक कैम्पेन चला रहे लोगों से मिल लीजियेगा.
बुनियादी सवाल अब भी वही है क्या लोकतंत्र में तंत्र के पीछे खड़े लोक को केवल पांच साल में एक बार वोट डालने के अधिकार से ही उसकी अहमियत का अंदाजा दिलाया जा सकता है? राजनैतिक असंतुलन वाली थ्योरी की छाया में भी इसे समझा जाए तो लोकतंत्र की यह लकीर भीड़तंत्र से आगे नहीं जा पाती है. खैर! जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना यह लोकतंत्र अभी अपने शैशव काल में है और बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब इसे ढूँढने हैं. एक और सही!
Friday, 1 November 2013
संघ के बयान का मतलब.....
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