Tuesday, 9 December 2014

कोई ये कैसे बताये कि वो तनहा क्यूँ है?

उम्मीद है सीए/इंजीनयर/डॉक्टर/लेखक/अध्यापक/साधारण व्यक्ति होने के नाते आपको मेडिकल साइंसअध्यात्ममनोविज्ञानफिजिक्स और केमिस्ट्री की अच्छी जानकारी जरूर होगी. (just kidding)

बात मेडिकल साइंस की करें तो सर्वविदित है कि शरीर में पैदा होने वाले सभी भाव,विचाररोग शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल स्त्राव से नियंत्रित होते हैं. हर व्यक्ति का व्यवहार उसके शरीर के अंदर के हार्मोन्स पर निर्भर करता है जिसे बाबा राजकुमार हिरानी जी ने केमिकल लोचा कहकर परिभाषित किया है (मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. अध्याय दूसरा श्लोक तीसरा). इस तरह इंसानी स्वभाव को समझते-समझते मेडिकल साइंसफिजिक्स और केमेस्ट्री में बदल जाती है क्योंकि जिस हार्मोन से इंसान का स्वभाव और व्यवहार नियंत्रित हो रहा है वह कम से कम दो रसायनों की एक निर्धारित वातावरण में तय नियमों के तहत हुई अन्तरक्रिया का उपोत्पाद है. इसका मतलब अगर हमारा नियंत्रण रसायनों और परिस्थितियों पर हो तो अधिकतर परिस्थितियों में इंसानी स्वभाव को नियंत्रित करना संभव है. लेकिन यह बात कहनी जितनी आसान है करनी उतनी ही मुश्किल है और यहीं से मेडिकल साइंस आध्यात्म और कॉस्मिक/प्लूटोनिक एनर्जी के सामने घुटने टेकती नजर आती है.

ज्योतिष/आध्यात्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय विभिन्न ग्रहों की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभावउसकी शारीरिक एवं मानसिक संरचना और क्षमता पर पड़ता हैइसी आधार पर कुंडली बनाई जाती है. (कुंडली विज्ञान कितना सही इस पर एक अलग बहस हो सकती है लेकिन आप चाहे तो विभिन्न क्षेत्रों में विख्यात/कुख्यात व्यक्तियों की कुंडली देख सकते हैं जो उनके कार्यक्षेत्र और उनकी प्रतिभा के आधार पर लगभग एक सी ही दिखाई देंगी,आप चाहें तो इसे भी संयोग मात्र कहकर ख़ारिज कर सकते हैं)



यानी व्यक्ति के विभिन्न परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने का क्रम उसके जन्म के समय से ही तय हो जाता है. इस तरह देखा जाए तो व्यक्ति के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाएँ पूर्व-निर्धारित होती हैं अर्थात व्यक्ति का स्वभावविचारप्रतिक्रियाएं उसके नियंत्रण से लगभग बाहर होती हैं. अगर यह सब पूर्व नियंत्रित है तो किसी व्यक्ति की मित्रताशत्रुता किन और कैसे लोगों से होगी यह भी एक साधारण व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर की चीज है. इस सारे घटनाक्रम में एक शक्ति काम करती है जिसे हम साधारण भाषा में फिजिकल एनर्जी कह सकते हैं. दो एक सी फिजिकल एनर्जी के लोग एक दुसरे को अधिक पसंद करते हैं और विपरीत एनर्जी के कम. यह बात साधु संतों से लेकर तथाकथित अंडरवर्ल्ड के लोगों पर समान रूप से लागू होती है.

अब शायद यह समझना आसान होगा कि क्यों कोई व्यक्ति हमे अचानक बिना किसी कारण अच्छा या बुरा लगता है. क्यों कोई हमे बिना कारण पसंद करता है तो कोई बिना कारण हमसे नाराज हो सकता है. निश्चित रूप से बाहरी परिस्थितियों का भी एक हद तक इसमें योगदान रहता है परंतु यह किसी भी रासायनिक क्रिया में एक उत्प्रेरक की सीमा से अधिक नहीं बढ़ पाता क्योंकि सामान परिस्थितियों में दो अलग अलग व्यक्तियों को अलग अलग तरीके से व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है.

अगला सवाल यह आता है कि क्या यह फिजिकल एनर्जी तभी काम करती है जब दो व्यक्ति एक दूसरे के आमने सामने एक निश्चित दूरी पर होंइसका जवाब आज के तकनीकी दौर में और भी आसान हो जाता है, जब हम किसी से फोन पर बात करते हैं या किसी का फेसबुक/ट्विटर प्रोफाइल देखते हैं क्या हम अचानक किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित या विकर्षित महसूस नहीं करते?



हाँ, और यह स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की फिजिकल एनर्जी से उसकी आवाज भी प्रभावित होती है इसीलिए केवल फोन पर बात करने भर से पसंदगी या नपसन्दगी का एक भाव आ जाता है. यही बात सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भी लागू होती है जहाँ हर व्यक्ति अपनी रूचि और आदतों के अनुसार ही अपना प्रोफाइल बनाता है और हम अपनी रुचियों के आधार पर उसे पसंद या नापंसंद करते हैं. इस पूरी क्रिया में फिजिकल एनर्जी का अपना महत्त्व है.

क्या इस नियम का कोई अपवाद नहींऐसा नहीं है. हर नियम/अवधारणा की तरह इसके भी अपवाद हैं और अन्य नियमों के मुकाबले इसके अपवाद ढूँढने आसान हैं क्योंकि इसके अपवाद केवल मानव की दृढ इच्छाशक्ति और उसकी निरंतरता के आधार पर बनते हैं. बहुत से लोगों को आपने देखा होगा जो खुद को पूरी तरह बदलने में कामयाब रहे हैं. यह मुमकिन है. बस जरूरत अंदर उठते भावों के विपरीत क्रिया करने की है जिसके लिए दृढ इच्छाशक्ति की जरूरत है और लगातार अभ्यास से इसे स्थायी आदत बनाना मुमकिन भी है. भारतीय समाज में संयुक्त परिवारों की सफलता या असफलता इसी अपवाद की सफलता पर निर्भर करती है जहाँ स्व-रूचि को तिलांजलि देते हुए परिवार के हित में अपने मनोभावों की अनदेखी करनी पड़ती है.
इसका एक और उदाहरण आप किसी बच्चे और बड़े से बात करते हुए भी देख सकते हैं. बच्चे की बातचीत में उसके भाव साफ़ चमकते हैं. स्कूल का काम पूरा करने की बात हो या खेलने की बच्चा अपनी भावनाओं के आधार पर ही जवाब देता है'पढ़ने का मन नहीं है' 'अभी थोडा और खेलने का मन है' (यक़ीनन जवाब इसके उलट भी हो सकता है पर भावनाएं उसमे भी शामिल होंगी) जबकि वयस्क व्यक्ति से बात करते हुए 'काम करने का मन हैबजाय आपके द्वारा 'आज यह काम करना पड़ेगासुनने की सम्भावना अधिक है. दोनों वाक्यों में फर्क इच्छा और बाध्यता का है. वयस्कता के साथ स्वेच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता मौजूदा सामजिक ताने बाने में किसी भी व्यक्ति को घेर लेती है. इसे एक शायर ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया है

जैसे जैसे हम बड़े होते गए,
झूठ कहने में खरे होते गए.

भावनाओं से बाध्यता की यह यात्रा ही आज के तथाकथित रूप से सफल व्यक्तियों की अंदरूनी बेचैनी का रहस्य है. स्व का रूपांतरण किये बिना अपने क्रियाकलापों को बदलना किसी भी व्यक्ति को कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक स्तर पर द्विविभाजित कर जाता है. इस समस्या के एक हद से अधिक बढ़ जाने पर यह स्प्लिट-पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जाता है जो लगभग पागलपन की स्थिति है लेकिन एक सीमा तक यह स्प्लिट पर्सनैलिटी डिसऑडर पूरे समाज में देखा जा सकता है.



कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अगर हर व्यक्ति को अपने मन के भावों के आधार पर कृत्य करने की छूट मिल जाए तो यह समाज में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो जायेगी. मैं उनसे सहमत हूँ और समाज में अराजकता का विरोधी भी हूँ लेकिन मौजूदा समय में सामाजिक/आर्थिक रूप से सफल होने का दबाव एक सीमा से अधिक है और यही अधिकतर युवाओं के उनके केंद्र से विचलित होने का कारण है. आने वाले समाय में इसके दुष्परिणामों को बढ़ते मानसिक रोगियों और शारीरिक रूप से कमजोर समाज के रूप में देखा जा सकता है.(यक़ीनन हम भी अपने पूर्वजों के मुकाबले शरीरिक रूप से दुर्बल हैं.)

तो ऐसे में रास्ता क्या हैक्या अपनी स्वाभाविक आदतों के विपरीत व्यवहार करने के मानसिक दबाव में जीता समाज स्वयं से किसी स्तर पर जुड़ाव भी महसूस कर सकता है? क्या कोई तरीका है जिस से दोहरे मानसिक स्तर पर जीने की बाध्यता में भी कोई साधारण इंसान अपने अंदर कहीं गहरे में शांति महसूस कर सकता हैक्या सामजिक बंधनों के इस मायाजाल से मुक्ति का कोई रास्ता है?



इस विषय पर बाकी चर्चा अगले लेख में.......
आपके सवाल और विचार आमंत्रित हैं. यह आगे की विचार यात्रा को दिशा देने में सहायक होंगे....... 


9 comments:

  1. कया इस का मतलब यह हुआ कि जो मानसिक रूप से कमजोर होता है वह अकेला होता है??

    ReplyDelete
    Replies
    1. अकेला रहना किसी भी तरह मानसिक कमजोरी का लक्षण नहीं है. किसी भी व्यक्ति के तनहा रहने के पीछे दो कारण हो सकते हैं:-
      १. अक्सर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति अपने समान प्रतिभा या अपने जैसी फिजिकल एनर्जी के लोगों को नहीं ढूंढ पाते क्योंकि ऐसी विलक्षण प्रतिभाएं बहुत कम होती हैं. इसका एक उदाहरण बेहतरीन राजनेताओं(चाणक्य,रूजवेल्ट,नरेंद्र मोदी), कलाकारों (वन गॉग, शेक्सपियर, रस्किन बांड), संगीतकारों (बीथोवन से लेकर ए,आर.रहमान, तमाम शास्त्रीय संगीत के कलाकार) के दोस्तों की संख्या कम होना है. इस पूरी श्रेणी के लोग समाज के एक बड़े हिस्से से जुड़े होते हैं लेकिन यह जुड़ाव उनकी प्रतिभा के प्रदर्शन तक ही सीमित होता है, आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करने के स्तर पर वे अक्सर अकेले पाए जाते हैं. (आपको याद होगा हिटलर तमाम उम्र अपनी प्रेमिका से प्यार का इजहार नहीं कर पाया क्योंकि किसी भी व्यक्ति को आपने करीब आने देने से डरता था, लेकिन वही हिटलर मौत की निश्चितता के साए में अपनी प्रेमिका से प्यार का इजहार करता है, मरने से केवल कुछ घंटे पहले.) इस तरह का अकेलापन विलक्षणता की नियति होती है जो पूरी तरह सहज है. किसी ख़ास लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कभी कभी कोई व्यक्ति एक निश्चित समय के लिए खुद को एकांत में रखने का फैसला करता है. यह भी पूरी तरह स्वाभाविक है और अक्सर विशेष प्रतिभा के धनि लोगों में पाया जाता है.

      २. अकेला रहने का दूसरा कारण मानसिक असंतुलन का कारण हो सकता है. लेकिन इसे भी मानसिक कमजोरी कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि मानसिक असंतुलन का कारण शरीर में किसी ख़ास रसायन(हारमोन) का अत्यधिक स्त्राव और उस स्त्राव के कारण विशेष प्रकार का व्यवहार होता है. यानी यह मानसिक कमजोरी नहीं बल्कि किसी ख़ास रसायन को बनाने में शरीर की अति-सक्रियता के कारण होता है. इसे मानसिक असंतुलन तो कहा जा सकता है, मानसिक कमजोरी नहीं. दरअसल मानसिक या शारीरिक कमजोरी जैसी कोई चीज दुनिया में होती नहीं यह केवल बहुसंख्यक आबादी का दंभ भर है जो किसी ख़ास श्रेणी के लोगों के लिए अलग नाम रखता है अन्यथा एक किताब न पढने वाले व्यक्ति को शारीरिक रूप से अक्षम कहा जाता है जबकि एक ब्रेल लिपि न पढ़ पाने वाले व्यक्ति के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा जाता.
      उम्मीद है मैं अपनी बात ठीक से रख पाया हूँ.

      Delete
  2. Nice to see ur new style of pen on paper...

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया देवी जी!

      Delete
  3. आपका लेख प्रमाण है आपके गहन अध्य्यन का | बहुत ही अच्छे से explain किया है |

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया बंधुवर

      Delete
  4. नया विषय उठाया बधाई, उर्जा की भौतिक रासायनिक परिकल्पना को व्यक्ति के व्यवहार से संलिप्त करना तर्कसंगत है तर्कसम्मत है, इसके अतिरिक्त भी कुछ है जो जीवन के परिणाम निर्धारित करता है .....उसकी गति भी .व्यक्ति और व्यक्तित्व के निर्माण में एकरसता जो समाज में दीख पड़ती है उसका उद्गम समाज में ही है .क्यों सामाजिक व्यवहार और राष्ट्रिय व्यवहार एक से होने लगे हैं .क्यों कोई देश वेश्याओं और दलालों के देश में परिवर्तित हो रहा है क्यों सामाजिक व्यवहार और सामूहिक व्यवाहर अर्थशास्त्र के सपाट अध्ययन से विकसित हो गये हैं .लेखक से कम से कम मैं इन उत्तरों की अपेक्षा करता हूँ . जानता हूँ आगे किसी लेख में मिलेगा . दूसरी ओर व्यक्ति के पराभौतिक जीवन का प्रश्न उठता है .यह विषय रहस्यों की गूढता में चलता जाता है ....उलझाव भरा किन्तु रहस्यात्मक होने के कारण रोचक . एक बड़ी चेतना से छोटी चेतनाओं के उद्भव के कारण अनेक आत्माएं एक दूसरे का अलग हुआ भाग हैं वही जन्म दर जन्म मिलते हैं या जन्म दर जन्म भटकाव का कारण बनते हैं . अधिकांश मानव जीवन नये हैं लेकिन बहुत हैं जो अपने साथ हजारों वर्षों के जुड़ाव या भटकाव लिए हैं . एक ही चेतना से उद्गम स्रोत मिलने के कारण भी फिज़िकल और केमिकल एनर्जी मैच करती है . अब सिलसिला आपने शुरू किया है तो बढ़ाना भी आपको है . मैं सौ दो सौ सालों के जीवन की बात नहीं कर रहा बल्कि उनकी बात कर रहा हूँ जो हजारों वर्ष पूर्व नियति के फंसाए वृहत चेतना से अलग हो आत्मा और जीवन में भटकते आये हैं और नियति ने उनकी मुक्ति के लिए तिलिस्म सा बांध दिया है . जब जीवन पराजीवन की बात उठ ही गयी है तो गूढ़ता के कुछ बढ़ते तारों के जाल पर चल लेना भी प्रासंगिक होगा . विषय की भूमिका आपने तैयार कर दी है इसके लिए साधुवाद . लेख की दृष्टि से पूर्णता है किंतु विषय अब लंबा खुल गया है .....बधाई ....अपेक्षा करता हूँ अब सिरे दूर तक नापने के प्रयास में कसर बाकी न रहेगी .....इस लेख के लिए बधाई के साथ आगामी दिशा में बढ़ने के लिए शुभकामनाएँ ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया अनुज भाई। आपने एक नए रास्ते की ओर इशारा किया है। उम्मीद है आपके मार्गदर्शन में यह विचार यात्रा किसी गंतव्य तक पहुंचेगी। आपके द्वारा कही गई बातें इस श्रृंखला के अगले लेखों के लिए प्रेरणा स्त्रोत होंगी।

      Delete
  5. बड़ा ही अच्छा लिख रहे हो भाई !
    Of course, मेरे भी मन में ऐसे सवाल आते आये हैं | आपने बड़ी अच्छी तरह इस मनोदशा को लिखा है |

    मैंने तो बस समझा है कि असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय | Seek the truth and the truth shall set you free. And this is a never ending quest.

    जो शांति कि आपने बात करी है , वो दरअसल अकेलेपन से ही आने वाली है | अकेलापन विकृति न हो कर , उस अशांति का उपचार है बशर्ते व्यक्ति तन्हाईयों में सत्य की तलाश में लगा रहे |

    तभी तो संतोषी और शांत संत अकेले ही पाए जाते हैं | :-)

    इस विषय पर आपके अगले लेख का इंतज़ार है ...

    ReplyDelete