Sunday, 18 January 2015

'आप' के कोहरे में आशा की 'किरन'.... क्या सचमुच?

दिल्ली में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच जुबानी और जमीनी जंग तेज हो गई है. इसमें पिछले हफ्ते तक आम आदमी पार्टी कुछ बढ़त लेती हुई इसलिए दिख रही थी क्योंकि भाजपा के पास अरविन्द केजरीवाल के कद का कोई नेता दिल्ली में मौजूद नहीं था. ऐसे में नेत्रत्वविहीन भाजपा अरविन्द केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले कर रही थी, जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपना योगदान केजरीवाल को नक्सलियों के साथ काम करने की सलाह देकर किया. यह अलग बात है कि इस तरह की बयानबाजी का फायदा भाजपा के बजाय खुद अरविन्द केजरीवाल को ज्यादा हो रहा था. यह अरविन्द केजरीवाल को 16 मई के पहले के नरेंद्र मोदी की स्थिति में खड़ा कर रहा था जहाँ यूपीए के मंत्री और नेता नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे थे और दूसरी ओर नरेंद्र मोदी उन हमलों का जवाब देने के साथ साथ भारत के भविष्य का खाका भी देश की जनता के सामने रख रहे थे. लगभग यही काम अरविन्द केजरीवाल दिल्ली को महिला सुरक्षा, फ्री वाई फाई, सस्ती बिजली पानी के सपने दिखा कर रहे थे.
इस लड़ाई में बड़ा मोड़ तब आया जब अन्ना आन्दोलन में अरविन्द केजरीवाल के साथ काम कर चुकी किरन बेदी भाजपा में शामिल हुई और भाजपा अरविन्द केजरीवाल के मुक़ाबिल अपना चेहरा किरण बेदी को बताने लगी. ऐसे में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के द्वारा किरन बेदी के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करना स्वाभाविक था. एक और जहाँ इस से किरन बेदी के पुराने बयानात को सामने लाने की जंग छिड़ पड़ी वहीँ किरन बेदी ने अरविन्द केजरीवाल पर कोई टिपण्णी न करके यह बताने की कोशिश की कि अरविन्द केजरीवाल उनके कद के बराबर नहीं है. ऐसे में एक नई बहस यह छिड़ पड़ी कि क्या किरण बेदी के आने से भाजपा को कोई फायदा होगा या यह केवल मीडिया में चर्चा का विषय बनने से आगे नहीं बढ़ पायगा. इसके फायदे या नुक्सान समझने के लिए हमें उन सभी चीजों पर गौर करना होगा जो आम आदमी पार्टी के नेता किरन बेदी के बारे में कह रहे हैं या कह सकते हैं.

इसमें पहला और सबसे अहम सवाल यही आता है कि क्या किरण बेदी का भाजपा के पाले में जाना अन्ना टीम और अन्ना के साथ धोखा है? गौरतलब है कि अन्ना आन्दोलन को राजनीति में बदलने की गुहार लगाने वालों में किरन बेदी, अनुपम खेर, वी. के. सिंह इत्यादि तमाम लोग थे. इनमे से जनरल वी. के. सिंह आज भाजपा सरकार में मंत्री हैं तो अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर भाजपा से सांसद हैं. अब किरन बेदी भी भाजपा में आ गई हैं. लेकिन यह शायद उतना बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं बन पायेगा क्योंकि किरन बेदी के एक साल पहले तक अराजनैतिक रहने के बयान का हवाला देने पर भाजपा पलटवार में अरविन्द केजरीवाल के 2012 से पहले के बयानों को सामने रख सकती है. वैसे भी बात से पलटने को मुद्दा बनाने पर आम आदमी पार्टी अधिक नुक्सान में रहेगी. उनके सामने सवाल ज्यादा बड़े होंगे जैसे लोकपाल को भूल जाना (जिसकी आज कहीं चर्चा नहीं हैं), बच्चों की कसम खाने के बाद कांग्रेस के साथ सरकार बना लेना, गाड़ी-बंगला लेना, केन्द्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की तलाश में दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ देना, वाराणसी और अमेठी के दुःख दर्द में साथ निभाने का वादा करके चुनाव के बाद वहां आज तक वापस न जाना. राजनीति में अपनी बात से पलट जाने में आम आदमी पार्टी का इतिहास छोटा भले ही हो लेकिन दाग गहरे उन्ही के दामन पर हैं.
दूसरा मुद्दा 'आप' यह बना सकती है कि कुछ समय पहले तक नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाली किरन बेदी लगभग एक साल पहले अचानक उनके गुण गाने लगी. तो यह तो अरविन्द केजरीवाल ने भी किया है. याद करें लोकसभा चुनाव से पहले अरविन्द केजरीवाल गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी के 10 साल के विकास की पोल 3 दिन में खोलने का दावा कर रहे थे, लेकिन आज वे नरेंद्र मोदी पर कोई भी सीधा हमला करने से बच रहे हैं क्योंकि तब और अब के नरेंद्र मोदी के कद में जमीन आसमान का फर्क है.
इसके अलावा किरन बेदी द्वारा अपने से जूनियर अधिकारी को प्रोन्नत किये जाने के विरोध में पुलिस सेवा से इस्तीफ़ा देना उन्हें पद का लालची घोषित करने का एक मौका तो देता है लेकिन बात राजनीति की हो या सामाजिक और पुलिस सेवा की, बड़े पद का मतलब बड़ी जिम्मेदारी, अधिक अधिकार के साथ साथ बड़े लक्ष्यों को पूरा करना भी होता है. ऐसे में बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में सरकार द्वारा अडंगा अडाने के कारण अगर किरण बेदी ने इस्तीफ़ा दे दिता तो यह उनकी नीयत पर कहीं से भी सवाल नहीं उठाता. वैसे भी देखा जाए तो यही कोशिश खुद अरविन्द केजरीवाल लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली से इस्तीफ़ा देकर कर चुके हैं. और देखा जाए तो अब भी अरविन्द केजरीवाल स्वयं मुख्यमंत्री पद की दौड़ में है तो क्या यह पद की लालसा है या बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कोशिश?
एक अन्य आक्षेप किरन के ऊपर तानाशाही रवैया होने का लग सकता है जो उनके जनसंबोधनों और मीडिया बहसों में अक्सर परिलक्षित हो जाता है. (अब तक तो भाजपा के कार्यकर्ता भी इसका स्वाद चख चुके होंगे) इस तरह के आरोप स्वयं अरविन्द पर भी लग चुके हैं. उनेक कई साथी इस तरह के आरोप लगाकर उन्हें छोड़ चुके हैं (विनोद कुमार बिन्नी, शाजिया इल्मी, शमून काजमी, उनके अपने विधायक भी) तो कई साथी पार्टी में रहकर उन पर यह आरोप लगा चुके हैं (योगेन्द्र यादव का ख़त याद कीजिये और आम आदमी पार्टी के ऑफिस में चलती बतकहियों पर ध्यान दीजिये.)इसके अलावा भी आम आदमी पार्टी के प्रदेश और जिला समितियां सदस्य अक्सर आम आदमी पार्टी की केंद्रीय समिति के कुछ सदस्यों पर पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड बनाने का आरोप लगाते रहे हैं, जिनमे से मैं स्वयं एक हूँ.
यानी कुल मिलकर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप की लड़ाई शुरू होने की दशा में अरविन्द के पास ऐसा कोई तीर नहीं होगा जिसका जवाब भाजपा के पास न हो बल्कि कई मामलों में अरविन्द किरन बेदी के सामने कमजोर पड़ते दिखाई पड़ते हैं. जैसे किरन के मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व के सामने अरविन्द का इनकम टैक्स अधिकारी के तौर पर फीका रिकॉर्ड और मुख्यमंत्री के तौर पर तमाम दाग (दागों का मतलब प्रशासनिक अक्षमता लिया जाए, जैसे समाधान न कर पाने की स्थिति में मैदान छोड़ देना, सोमनाथ भारती प्रकरण, धरना, असफल जनता दरबार इत्यादि). किरन की कड़क छवि अरविन्द के ढुलमुल रवैये के सामने उन्हें बड़ा साबित कर देती है. इसी ढुलमुल रवैये के कारण अरविन्द बार बार अपना स्टैंड भी बदलते रहे और उनके साथी भी लगातार बदलते रहे. (अन्ना आन्दोलन के गिने चुने कार्यकर्ता और सहयोगी आज उनके साथ हैं) किरन को इस छवि में और मजबूती सामान्य ज्ञान की उन किताबों से मिलती है जिसे भारत का आम नागरिक पढता रहा है और जिनमें किरन अपना नाम कई दशक पहले दर्ज करा चुकी हैं. यानी मनोवैज्ञानिक रूप से किरन बेदी अरविन्द केजरीवाल के ऊपर बढ़त बना चुकी हैं.
बात मुद्दों की करें तो भी अरविन्द केजरीवाल के हाथ किरन बेदी के आने के बाद लगभग खाली दिखाई देते हैं. किरन बेदी के आने से महिला सुरक्षा का मुद्दा उनके हाथ से फिसल चुका है. लोकपाल और राईट टू रिकाल वह खुद ही छोड़ चुके हैं. ऐसे में सस्ती बिजली और सस्ता पानी की योजना के दम पर वे कहाँ तक पहुँच पायेंगे जबकि सस्ती बिजली के वादे से ज्यादा आम जनता को 24 घंटे बिजली का वादा ज्यादा मजबूत लगता है. तो अरविन्द के हाथ मुद्दों से लगभग खाली होने के बाद उनके सामने रास्ता क्या बचता है? वही, जो पिछले हफ्ते तक भाजपा के पास था. यानी किरन बेदी की छवि को छोटा करना, लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर जहाँ आम आदमी पार्टी नेगेटिव कैम्पेन में उलझ कर रह जायेगी वहीँ किरन अन्ना आन्दोलन की सहयोगी होने के कारण बहुत सी ऐसी बातों को सामने ला सकती हैं जिससे अरविन्द के लिए स्थिति असहज हो जाएगी. यूँ तो इस तरह की बातों से अन्ना आन्दोलन के दिनों के लगभग सभी लोग परिचित हैं (स्वयं मैं भी) लेकिन कम से कम खुले मंच तक इन बातों का 1 प्रतिशत भी आज तक किसी ने नहीं रखा है.
तो क्या किरन बेदी को मैदान में उतार कर भाजपा ने चुनाव से पहले ही मोर्चा जीत लिया है? ये दिल्ली है जनाब! मामला इतना आसान नहीं है. समस्याएं किरन के सामने भी हैं. सड़क का नेता न होना, भाजपा कार्यकर्ताओं से जुड़ाव न होना, जुड़ाव के लिए किरन खुद को बदलने के लिए तैयार दिखती हों ऐसा भी नहीं है (नमूना आपने भाजपा में आने के अगले दिन देख लिया होगा जब किरन भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बीच में कार्यकर्ताओं को डपट रही थी, याद कीजिये वे शब्द "आपको एंटरटेनमेंट चाहिए? तो बाहर चले जाइए".) इसके अलावा मुख्यमंत्री पद के लिए आस लगाए बैठे भाजपा नेता क्या उन्हें स्वीकार कर पायेंगे? हालाँकि इसमें अमित शाह सर्कस के रिंग मास्टर की भूमिका निभा सकते हैं. तो देखते रहिये क्योंकि मुकाबला दिलचस्प होने वाला है."

2 comments:

  1. दरअसल संघर्ष कर पुनर्जीवित होने के लिए राख बन जाने की काबलियत केजरीवाल में है नहीं । एक ज्वाला के जिस धमाके ने केजरीवाल को उछाल कर शीर्ष पर डाल दिया था वह ज्वाला न केजरीवाल की थी न अन्ना की न ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन की थी बल्कि वह ज्वाला करोणों हिन्दुस्तानियों के हृदय की थी जो उस समय विशेष पर अन्ना आंदोलन में परिलक्षित हुई। केजरीवाल में बाकी खामियों से सब बखूबी वाकिफ हैँ लेकिन केजरीवाल और उनके साथियों में व्याप्त अज्ञात भय से कम ही लोग परिचित हैं। और यह भय इतना गहरा है कि इन लोगों ने प्रदेशों में पार्टी को इसलिए विकसित नहीं होने दिया क्योंकि वे जानते थे कि प्रदेशो से उन से बेहतर राजनेता पार्टी में आएंगे और इस दुश्चजरित्र असीमित महत्वाकांक्षाओं से ओतप्रोत चोकड़ी का नेतृत्व खतरे में पड़ जायेगा। ये भयभीत लोग पुनर्जीवित होने में अक्षम हैं इनका पतन निश्चित था सो हो गया और आगे और होगा। यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज़ की खामियों का केजरीवाल एन्ड कम्पनी सबसे नया उदाहरण है।

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    1. शत प्रतिशत सहमत हूँ।

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